[दीवान]नरेन्द्र मोदी के भाषणों की टीवी टूल्स से व्याख्या हो

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Fri Oct 25 09:56:24 CDT 2013


1. आज तो नरेन्द्र मोदी ने झांसी रैली में इतनी बार भाईयों और बहनों बोला
जितना कि हमारे नूझ लैलन के एंकर्स भी "कहीं न कहीं", "देखना होगा", "खुलासा"
आदि नहीं बोलते..अगर उनके भाईयों-बहनों की बोलने की बारंबरता की गिनती की जाए
तो अंतम रैली तक इसकी संख्या शायद उतनी हो जाएगी जितनी कि देश में भाईयों और
बहनों की संख्या भी नहीं है.

2. नरेन्द्र मोदी की रैली ऑब्लिक उनसे जुड़े कार्यक्रमों की जो टीआरपी आती है,
उसके बरक्स केबीसी,सास-बहू सीरियल और रियलिटी शो की भी टीआरपी सार्वजनिक की
जानी चाहिए क्योंकि न्यूज चैनल ये रैलियां सिर्फ विज्ञापन पैकेज की शर्तों के
तहत नहीं दिखाते बल्कि सीरीयल और रियलिटी शो जैसा मजा पैदा करने के लिए भी
चलाते हैं. ऐसे में हम देखना चाहते हैं कि टीआरपी के लिहाज से इन रैलियों की
सेहत कैसी है ?

3. ये हमलोगों के साथ भी होता है कि लगातार चार क्लास लेनी पड़ जाती है तो
आखिर में आते-आते लरपताने लग जाते हैं. नरेन्द्र मोदी के भाषण में लरपताना
शुरु हो गया है. शब्द चयन, भाषा चमत्कार और वाक्य विन्यास में तेजी से बंजरता
पैदा हो रही है जो उन्हें एक बेहतरीन ओरेटर होने के दावे से बहुत पीछे धकेल दे
रहा है. यही हाल रहा तो वैचारिक और व्यावसायिक स्तर के लगाव और फायदे के
बावजूद लोग इन भाषणों में दिलचस्पी लेना कम कर देंगे और हम जैसे लोग जो इन
भाषणों को टीवी मसाला के तहत देखते हैं, देखना तक छोड़ देंगे. मोदी के
लगुए-भगुए को इनके भाषण पर खास मेहनत करने की जरुरत है. जब ये जगजाहिर है कि
उनके किसी भी भाषण से कुछ बदलने और पलटने वाला नहीं है, ऐसे में कम से कम
लोगों के मनोरंजन का ख्याल तो रखा ही जाना चाहिए.

( डिस्क्लेमरः ये नरेन्द्र मोदी के भाषण और रैलियों की मीडिया टूल्स के हिसाब
से व्याख्या है. ऐसे में संभव है कि कुछ बाते मोदी के पक्ष या सहानुभूति में
नजर आएंगे..आपको इसे लेकर ज्यादा परेशान न हों, टीवी कंटेंट व्याख्या में ऐसा
होता है)
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