[दीवान]रवीश सर और नीलेश सर को सुनकर लप्रेक की याद आती है

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Thu Sep 5 22:52:17 CDT 2013


मुकर्जीनगर हम इसलिए शिफ्ट हुए थे रघु कि यहां से दुनिया के लिए अपनी उड़ान भर
सकें, इसलिए नहीं कि तू जिंदगीभर यहां की गलियों में, इमारतों में ऐसे गुम हो
जाओ कि मैं तुम्हें वहां आकर भी न खोज पाउं ?
तुम कहना क्या चाहती हो रागिनी ? क्या किसी के उड़ान भरने का फैसला अपना हो
सकता है तो दूसरे के गुम हो जाने का फैसला अपना नहीं हो सकता ? फिर सबकी उड़ान
भी तो अपने-अपने तरीके की हो सकती है !
बिल्कुल हो सकती है लेकिन यार रघु मैं अब भी तुमसे बात करती हुई सोच रही हूं
कि क्या मैं उसी रघु से इसी दिल्ली शहर में होते हुए फोन पर बात कर रही हूं जो
मुझसे बमुश्किल डेढ़ से दो किलोमीटर की दूरी पर है..पता है ये नौवीं बार की
कॉल है जब तुमने पिक किया है. इससे पहले आठ बार फोन काटकर- विल कॉल यू लेटर की
ऑटो मेसेज भेजे हैं न, उसमे न जाने मेरे कितने सारे उत्साह,सवाल और बहुत कुछ
शेयर करने के अरमान दफन हो गए..मेरे को तो अब भी यकीन नहीं हो रहा कि जब मैं
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरी थी तो मुझे एटेंडेंट ने गेस्ट हाउस तक
पहुंचाया था. मुझे दिल्ली आए दो दिन हो गए और मैं बस इस सवाल से परेशान हूं कि
मेरे रघु के पास इतना भी समय नहीं है कि एक बार राजपुर रोड़ तक आ सके..मैं जब
मोतिहारी से दिल्ली के लिए चली थी तो अपने कुछ जूनियर कूलीग को बताया था कि
दिल्ली जा रही हूं और तुम्हारे रघु सर से मिलूंगी. पता है, किसी ने तुम्हारे
लिए घर की घी, घर में मां के हाथ के बनाए सत्तू, किसी ने बुआ के हाथ के बनाए
अचार पैक करके भेजा है. एक लड़की तो इतनी बावली निकली कि तुम्हारे लिए एक
टीशर्ट खरीदकर मुक्तिबोध की कविता लिखकर भेजा है कि रघु सर को दीजिएगा मैम,खुश
हो जाएंगे. इन गिफ्ट के साथ ढेर सारे कार्ड्स.
तुम्हें जानकर ये लगेगा कि मैं कितनी मीन हो गई हूं अब लेकिन उस लड़की ने इस
टीशर्ट के साथ जो कार्ड दिए,उसे बिना पढ़े रहा नहीं गया,पढ़ लिया- पता है क्या
लिखा है ?
रघु सर, स्टूडेंट्स से पैसे चूसने और अपना धंधा चमकाने के लिए बदनाम सिविल
सर्विसेज की कोचिंग में आपसे पढ़ते हुए कभी नहीं लगा कि मैं किसी कोचिंग में
पढ़ रही हूं, मुझे हमेशा हिन्दू कॉलेज की उन्हीं क्लासेज की याद आती रही,
जिनमे हमें ग्रेड और पर्सेंटेज से बेफिक्र शिक्षकों ने लिटरेचर पढ़ाया, आपकी
बहुत याद आती है सर, मिस्सिंग यू ए लॉट..लव यू..दिल्ली जब भी आयी, जरुरी
मिलूंगी आपसे.ये जानते हुए कि आप कहेंगे- आपने हमे पैसे दिए, हमने आपको
पढ़ाया, बाकी सब बकवास है.

रघु, मैं तुमसे जानना चाहती थी कि तू इन स्टूडेंट्स के साथ ऐसा क्या कर देता
है यार कि वो जब भी मिलते हैं रघु सर, रघु सर करने लगते हैं, तू कैसे इन सबों
को हिप्नेटाइज कर देता है,लगा मिलने पर ये सारी चीजें तुम्हें देकर तुझमे वो
नमक खोजने की कोशिश करुंगी जो हमारे आइएस अधिकारी बन जाते ही जिंदगी के बीच से
गायब हो गए हैं..उस शक्कर का पता पूछूंगी जो हमारे बस एक दिन बिरजू की चाय के
बदले सीसीडी जाने से खत्म हो गई. हैलो,हैलो,रघु तू सुन तो रहा है न.

हां, सुन रहा हूं रागिनी. तो कुछ बोलता क्यों नहीं, मिल नहीं सकता राजपुर रोड
आकर मेरे से ? अच्छा बता, ये तेरे इन अचार,अनरसा,सत्तू, संदेशों को क्या करुं
जिसे जिप्सी में लादते समय मेरी मेड ने कहा था- बीबीजी, ऐसा लग रहा है कि आप
मोतिहारी से दिल्ली मीटिन में नहीं, मायके से विदा होकर ससुराल जा रही
हैं..सरकारी मीटिन में एतना लगिज थोड़े होता है ?

क्या बोलूं रागिनी, हम इन मुकर्जीनगर की गलियों में, इमारतों में गुम हो
जानेवाले लोग हैं. गुम शख्सियत भला क्या और कब-कब बोलेगा ? तुम लौटकर जाना तो
अपने जूनियर कूलिग से कहना- एक प्रोफेशनल कोचिंग चलानेवाले के लिए इस तरह से
इमोशन मास्टरवेशन न करे. वो मेहनती थे इसलिए सफल हो गए, मैंने कुछ भी नहीं
किया.

और इन संदेशों का क्या करुं ?..और वो मुक्तिबोध की पंक्तियां लिखी टीशर्ट- अब
अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे..

इसे वापस उस लड़की को लौटा देना- कहना, तुम्हारे रघु काफी हेल्दी हो गए हैं,
अब उन्हें एम नहीं, डबल एक्सेल साइज आते हैं.( लप्रेक दैट इज लघु प्रेम कथा)

( प्यारी स्वाति के लिए, जो नीलेश( Neelesh
Misra<https://www.facebook.com/neeleshmisra?directed_target_id=0>)
)का याद शहर और रवीश( Ravish
Kumar<https://www.facebook.com/ravish.kumar.359?directed_target_id=0>)
का शो देखते हुए अक्सर फोन करके कहती है- रवीश सर और आप लप्रेक लिखते थे न, अब
नहीं लिखते..मुझे नीलेश सर को सुनते हुए, रवीश सर की प्राइम टाइम देखते हुए
लप्रेक की याद आ जाती है)
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