[दीवान]आम चुनाव

brajesh kumar jha jha.brajeshkumar at gmail.com
Tue Apr 1 03:57:38 CDT 2014


आम चुनाव-2014: दिल्ली का कौन अपना, कौन पराया


डीटीसी (दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन) की पुरानी खटारा बस और यहां की राजनीति
से एक तरह की आवाज निकलती है। उस शोर में कुछ साफ सुनाई नहीं देता है।
हालांकि, दिल्ली की लो-फ्लोर बसों ने तो उस आवाज पर कुछ काबू पा लिया है।
देखें, अब इस राजनीति का क्या होता है?

वैसे पिछले 10 सालों में इस महानगर ने भारी कीमत चुकाकर अपना आवरण बदला है, जो
एकबारगी कहीं-कहीं खूबसूरत तो दिखलाई देता है, पर इसके गर्भ में कई दर्द छिपे
हैं। एक दुखद पहलू यह है कि दिल्ली की इस खूबसूरती पर राष्ट्रमंडल खेल घोटाले
ने जो कालिख पोत दी है, उसे मिटाना मुश्किल है। केवल इतना ही नहीं है, बल्कि
मिर्जा गालिब के इस शहर को कई दाग दिए गए। इससे वह आहत है। बीते दो-एक सालों
में कई मर्तबा लड़कियां तख्त लिए सड़कों पर उतर आईं। जब-जब ऐसा हुआ तो दिल्ली
के लोगों ने उनका पूरा साथ दिया है। इसी अंतराल में आम आदमी के बीच एक उम्मीद
जगी थी, लेकिन वहां भी दगाबाजी हुई। खैर, इसी आबो-हवा में लोगों को अपनी
लोकसभा के लिए प्रतिनिधि चुनना है।

गालिब की दिल्ली (चांदनी चौक) से कपिल सिब्बल उम्मीदवार है। यहां वे उसी
कांग्रेस पार्टी की नुमाइंदगी कर रहे हैं, जिसकी सरकार में भ्रष्टाचार के कई
नए कीर्तिमान बने हैं। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी का हर्ष वर्धन कार्ड
विपक्षियों पर बीस साबित हुआ है। चांदनी चौक लोकसभा सीट में घूमते हुए हवा का
रुख सहज ही भांपा जा सकता है। काफी मशक्कत और खोज-बीन के बाद भाजपा ने हर्ष
वर्धन को यहां से अपना उम्मीदवार बनाया है। कांग्रेस पार्टी के कद्दावर नेता
कपिल सिब्बल 14वीं (2004) और 15वीं (2009) लोकसभा में यहां की जनता का
प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। तीसरी बार पार्टी ने उन्हें बड़ी उम्मीद से टिकट
दिया है। पर, 2014 की चुनावी हवा बदली हुई है। ऐसे में यकीनन, अपनी सीट को
बचाए रखना उनके लिए बड़ी बात होगी। पत्रकार से नेता बने आशुतोष आम आदमी पार्टी
के उम्मीदवार हैं। हालांकि, इलाके के लोगों की राय है कि वे एक कमजोर
उम्मीदवार हैं। प्रचार अभियान के दौरान कई स्थानों पर लोग आशुतोष का विरोध भी
करते दिख रहे हैं। वैसे भी ‘आप’ का खुमार राजधानी दिल्ली में तेजी से नीचे आया
है। ऐसी स्थिति में उनके पास कुछ अधिक करने-कहने को नहीं है। वे एक चमत्कार के
इंतजार में हैं।

पश्चिमी दिल्ली ऐसी दूसरी सीट है, जहां से भारतीय जनता पार्टी को सफलता की
उम्मीद है। यहां से भाजपा ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के
बेटे और विधायक प्रवेश वर्मा को मैदान में उतारा है। काफी संघर्ष के बाद
प्रवेश वर्मा को पार्टी ने महत्व दिया है। इससे बाहरी दिल्ली की ग्रामीण आबादी
के रुख में बदलाव आ रहा है। भाजपा के नहले पर दहला के लिए कांग्रेस पार्टी
लोकप्रिय क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग मैदान में उतारना चाह रही थी, लेकिन मनाही
के बाद कांग्रेस ने महाबल मिश्र पर भरोसा जताया है। इसके पीछे की मजबूरी एक
मात्र यही है कि पूर्वांचलियों के बीच उनकी एक पहचान है। दिल्ली में वे स्वयं
को पूर्वांचलियों के प्रतिनिधित्व के रूप में गत डेढ़ दशक से पेश करते आ रहे
हैं। द्वारका क्षेत्र में रहने वाले अजय चौधरी कहते हैं, “यहां के
पूर्वांचलियों ने भी अपना मन बदला है।”

‘आप’ ने पत्रकार जरनैल सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया है। हालांकि, जरनैल सिंह
की एक पहचान केंद्रीय मंत्री पी.चिदंबरम के ऊपर जूता फेंकने वाले पत्रकार के
रूप में ही अधिक रही है। पश्चिमी दिल्ली के विकासपुरी, तिलक नगर, हरिनगर और
मादीपुर विधानसभा सीटों पर ‘आप’ का कब्जा है। इन इलाकों में सिख वोटर अधिक
हैं। जरनैल सिंह उन्हें रिझाने में सफल हो गए तो बात बन सकती है। इसी रणनीति
के तहत अरविंद केजरीवाल ने उन्हें यहां का टिकट दिया है।

वैसे चुनावी गणित का हिसाब कगज-कलम से लगाना असंभव काम है। हां, इतना सच है कि
पश्चिमी दिल्ली में जो हवा है, उससे प्रवेश वर्मा को गति मिल रही है। सत्ता
में रहते हुए कांग्रेस पार्टी ने जो साख खोई है, उसके बाद यहां महाबल के पास
केवल पूरवियों का बल है। 2009 के चुनाव में महाबल मिश्रा ने भाजपा के
प्रो.जगदीश मुखी को सवा लाख से भी अधिक वोटों से पराजित किया था, लेकिन गत
पांच सालों में काफी कुछ बदल चुका है। दिल्ली के इस क्षेत्र में विकास की
रफ्तार सबसे धीमी है। इसका खामियाजा भी महाबल मिश्र को ही भुगतना होगा।

दिल्ली में करोल बाग और सदर जैसी सीटों का अस्तित्व नहीं रहा है। यहां नए नाम
और नए चेहरे हैं। परिसीमन में बदलाव के बाद करोल बाग की जगह उत्तर-पश्चिमी
दिल्ली सीट अस्तित्व में आया है। यह दिल्ली की एक मात्र आरक्षित सीट है। पहले
करोल बाग थी। भाजपा ने इस सीट से उदित राय को टिकट दिया है। वे अभी-अभी भाजपा
में शामिल हुए हैं। पार्टी के इस फैसले को कार्यकर्ताओं ने उचित नहीं माना है।
इसका असर चुनाव परिणाम पर भी आ सकता है। उदित राय पूर्व आईआरअस अधिकारी हैं।
वे स्वभाव से संघर्षशील हैं। इसके बावजूद मोदी लहर ही उनकी नैया पार लगा सकती
है। यहां से बेहतर विकल्प नहीं ढूंढ़ पाने की वजह से कांग्रेस पार्टी ने एक
बार फिर कृष्णा तीरथ को अपना उम्मीदवार बनाया है। इस पर क्षेत्र के लोगों की
अलग-अलग राय है। फिलहाल वे अपना मन नहीं बना पाए हैं। मुंडका के विवेक गुप्त
कहते हैं, “हम तो विकास चाहते हैं, जो विकास करेगा हम उसका साथ देंगे” 2014 आम
चुनाव के मद्देनजर ‘आप’ की राखी बिड़ला को यहां से मजबूत उम्मीदवार समझा जा
रहा है। दिल्ली का यह इलाका विकास के तमाम दावों के बावजूद सड़क, बिजली, पानी
जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे में विकास का मुद्दा यहां अहम साबित होने
वाला है। लेकिन, यदि इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी अच्छा परिणाम लाना चाहती है
तो उसे भीतरघात से निपटना होगा।

पूर्वी दिल्ली से नामचीन लोग चुनाव मैदान में हैं। आम आदमी पार्टी ने यहां से
राजमोहन गांधी को मैदान में उतारा है। वे महात्मा गांधी के पोते हैं। वे
पार्टी के बुजुर्ग उम्मीदवार हैं। पार्टी उनकी ईमानदार और साफ छवि के साथ-साथ
महात्मा गांधी को  भुनाने की जुगत में लगी है। वहीं भाजपा ने महेश गिरी को
उम्मीदवार बनाया है। वे ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ के क्रिया-कलापों में डूबे रहे हैं।
पार्टी के कार्यकर्ता उन्हें थोपा गया उम्मीदवार मान रहे हैं। इस भाव के पैदा
होने से भाजपा की चुनौती अपेक्षाकृत बढ़ गई है। वहीं पूर्वी दिल्ली के वर्तमान
सांसद संदीप दीक्षित दूसरी पार्टियों के उम्मीदवारों को बाहरी बातकर स्थानीय
होने का फायदा उठाना चाहते हैं। विवेक विहार के अजय मिश्र ने कहा, “ मुझे याद
है 2004 में वे स्वयं बाहरी थे।” दरअसल, 2004 के आम चुनाव में लाल बिहारी
तिवारी को पराजित करने में वे सफल हुए थे, जबकि 2009 में उन्होंने क्रिकेटर
चेतन चौहान को करीब ढाई लाख वोटों से हराया था। तब पूर्वी दिल्ली की जनता ने
उन्हें बाहरी नहीं माना था। इस बार भी लोगों के बीच यह कोई मुद्दा नहीं है।
अजय कहते हैं, “दिल्ली का कौन अपना और कौन पराया है? यहां के गांवों की आबादी
को छोड़ दें तो किसी के पापा या किसी के दादा यहां आए थे और वे यहीं के होकर
रह गए।” पर राजनीति में ये सवाल बेशक उठते रहे हैं और दिल्ली के मतदाता इस
सवाल को दरकिनार करते रहेंगे। पूर्वी दिल्ली के कड़े त्रिकोणीय मुकाबले में
यदि बाहरी और स्थानीयता के मुद्दे को हवा देकर कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार
संदीप दीक्षित बाजी मारना चाहते हैं तो यह उनका भ्रम है।

उत्तर पूर्वी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से मनोज तिवारी को उतारकर भाजपा लड़ाई में
बनी हुई है। कांग्रेस पार्टी की ओर से जय प्रकाश अग्रवाल चुनाव मैदान में हैं।
दिल्ली की राजनीति में अग्रवाल की अपनी पहचान है। लोगों के बीच भी उनकी गहरी
पैठ है। वे 1984, 1989 और 1996 में दिल्ली की चांदनी चौक लोकसभा सीट का
प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। 2009 में वे उत्तर पूर्वी दिल्ली से जीत दर्ज की
थी। ऐसी स्थिति में भाजपा के सामने कोई चेहरा नहीं था। आखिरकार पार्टी ने मनोज
तिवारी पर दाव खेला है। पार्टी अपने इस फैसले से मैदान में बनी हुई है।
‘आप’के आनंद कुमार चुनाव मैदान में हैं। यह देखने वाली बात होगी कि वे
अपने नाम को
और ऊंचा उठा पाते हैं या नहीं।

नई दिल्ली सीट से कांग्रेस के अजय माकन मैदान में हैं। वे यहां के वर्तमान
सांसद हैं। भाजपा ने मीनाक्षी लेखी को उनके मुकाबले मैदान में उतारा है। एक
समय था जब पार्टी जगमोहन जैसे लोगों को यहां से टिकट देती थी। इस बार विकल्प
के तौर पर बड़ा नाम था, लेकिन महिला उम्मीदवार के नाम पर पार्टी ने मीनाक्षी
लेखी को टिकट दिया है। इससे दूसरी पार्टी के लोग भी चकित हैं। खैर, नौंवी
लोकसभा (1989) से लेकर 14वीं (2004) लोकसभा तक दक्षिण दिल्ली की सीट भाजपा के
पास थी। 2009 में वह उसके हाथ से खिसक गई थी। इस बार रमेश विधूड़ी पर भाजपा ने
भरोसा जताया है। कांग्रेस के वर्तामान सांसद रमेश कुमार से उन्हें पार पाना
है। राजधानी दिल्ली की सातों सीट पर 10 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे। भाजपा के
प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी
की चुनावी सभाएं यहां हो चुकी हैं। अब जनता को अपना फैसला सुनाना है।
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