[दीवान]चुनावी समय में देहाती बातें
Girindra Nath
girindranath at gmail.com
Sun Apr 6 02:00:19 CDT 2014
यह मुल्क का चुनावी काल है। हर जगह चुनावी बकैती चल रही है, ऐसे में मुझे
देहाती बातें करना का मन कर रहा है। आप कहेंगे सठिया गया है, लेकिन क्या
करिएगा बात करने का मन है तो बात करेंगे ही। देहाती शब्दों पर, बोली-बानी पर
लंबी बातचीत करने की इच्छा है।
बैलगाड़ी, संपनी, पटुआ-संठी, टप्पर, कचिया-खुरपी, बखारी या फिर भैंसवार के मुख
से भोरे-भोर (सुबह) गाने वाली प्रातकी को लेकर लिखते रहने का मन कर रहा है।
दरअसल अंचल की डाइरेक्टरी में ऐसे शब्दों का बड़ा महत्व है। किसानी करते हुए
ऐसे शब्दों से अपनापा बढ़ गया है। वैसे बैलगाड़ी हो या फिर बखारी, अब अंचल से
ये सब गायब होने के कगार पर है, तो भी अंचल की आंचलिकता इसके बिना अधूरी ही
मानी जाएगी।
गांव के बारे में जब भी लिखने बैठता हूं तो पहली याद बैलगाड़ी की आती है, वो
भी टप्पर वाली। मेरे जान-पहचान में ऐसे कई लोग हैं जो बैलगाड़ी को लिखते और
पढ़ते हैं लेकिन इसे कभी देखा नहीं है। एक ने मुझसे सवाल पूछा कि क्या तुमने
बैलगाड़ी देखी है (पर्दे पर नहीं सच्ची में)...? मैंने कहा कि सवारी भी की है
और वो भी टप्पर लगे बैलगाड़ी पे।
अब आप भी पूछेंगे कि टप्पर क्या होता है? दरअसल टप्पर बैलगाड़ी की सवारी करने
वालों को धूप-पानी से बचाने के लिए होता है। आप इसे बड़ी सी छतरी के रूप में
जान सकते हैं। आपकी बैलगाड़ी की टप्पर कैसी है, इससे आपकी स्थिती का पता लगाया
जाता है। (मसन आप अपने इलाके के कितने बड़े किसान हैं.)
मुझे याद आता है रंगीन टप्पर। उसे बांस से बानाया जाता था और उसे खूबसूरत
रंगों से रंगा जाता था। उसमें पेंटिंग से कलाकृतियां उकेरी जाती थी। आपको एक
ही नजर में बैलगाड़ी का टप्पर रोमांचित कर सकता है।
हाल ही में फणीश्वर नाथ रेणु के घर जाना हुआ था। हम उनके बैठक-खाने में गपिया
रहे थे। हमारी नजर अचानक बैठक-खाने के सीलिंग पर गई। वह फूस का बना हुआ था
लेकिन बांस की बत्तियों को रंग-रौनक कर जिस तरह सजाया गया था, मुझे टप्पर की
याद आने लगी थी। बाद में जब रेणु जी के छोटे बेटे से पूछा तो उन्होंने बताया
कि टप्पर की रुपरेखा को ध्यान में रखकर ही बैठकखाने को तैयार किया गया है।
कोसी क्षेत्र में 80 के दशक तक इन टप्परों का बोलबाला था। बड़े भूपति आदिवासी
कारीगरों से टप्पर बनवाया करते थे। बाद में ये टप्पर ट्रेक्टरों के ट्रेलर पर
भी लगाया जाने लगा। खराब सड़कों पर कार के स्थान पर बड़े भूपतियों के घर की
महिलाएं ट्रेलर से शहर जाती थीं, उनके लिए टप्पर लगाया जाता था।
टप्पर के पीछे पर्दे भी लगाए जाते थे। ये पर्दे सुंदर साड़ियों से बनाई जाती
थी। मेला आदि में लोगबाग सपरिवार इन्हीं गाड़ियों से आया-जाया करते थे। मुझे
बैलगाड़ी से पीछे की एक और सवारी संपनी गाड़ी की याद आ रही । संपनी गाड़ी को
एक भैंसा के कंधे के सहारे चलाया जाता था। संपनी सखुआ की लकड़ी से बनता था।
यदि आप दार्जलिंग गए हुए हैं तो वहां आपने लकड़ियों से बने कुछ घर भी देखे
होंगे, बस उसी स्टाइल का होता था संपनी गाड़ी। इसमें बैठने और आराम से लेटने
की व्यवस्था के साथ-साथ छोटा टेबल भी रखा होता था, ताकि उसमें सवार लोग कुछ
लिखाई-पढ़ाई कर सकें।
देखिए न ऐसी यादें अब केवल जुबानी ही रह गई है, हमारी कोशिश है कि इसे वैसे
लोगों तक पहुंचाया जाए, जो इससे अनजान हैं लेकिन उनके घर के बुजुर्गों का इसे
नाता रहा है। देहात की बातों में रसों का भंडार है, बस उसे समझने की जरुरत है।
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Girindra Nath Jha
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