[दीवान]फूलपुर (1957 से 1962)
Abhay Tiwari
abhaytri at gmail.com
Tue Apr 15 07:30:30 CDT 2014
"ये थे पंडित नेहरू, जिनके पास देशभर का काम था। इसके बाद भी अपनी
कांस्टीट्युएंसी के वोटर और कांग्रेसी कार्यकर्ता को नहीं भूला पाए थे।
बार-बार पूछते- “मेरे क्षेत्र में क्या हो रहा है? कैसा हो रहा है?” -"
ये एक नज़रिया है देखने का.. कोई ऐसे भी देख सकता है कि पंडित जी जिन लोगों के
प्रतिनिधि थे, असल में उनके प्रतिनिधि थे ही नहीं.. १९६१ तक उन्हे अपने
क्षेत्र के बारे में कुछ नहीं मालूम था.. और जब अपने क्षेत्र के बारे में नहीं
मालूम तो दूसरे क्षेत्रों की तो बात ही छोड़ दीजिए.. और ये हाल आज़ादी के पूरे
आन्दोलन के बाद और आज़ादी के १४ सालों बाद.. हमारे महान चाचा नेहरू ने राजकाज
की ऐसी नींव रखी कि गाँव आज भी बेहाल हैं..
नेहरू जी अंग्रेजी पढ़े थे उनके दिलो दिमाग़ पर अंग्रेज़ियत छाई थी.. गाँव
क्या है और वो कैसे बदले, इसका उन्हे कोई आइडिया नहीं था.. इस संस्मरण से यह
बात और पुख़्ता हो जाती है..
2014-04-15 15:05 GMT+05:30 brajesh kumar jha <jha.brajeshkumar at gmail.com>:
> तुमने, मुझे रीयल कांस्टीट्युएंसी दिखलाई - जवाहरलाल नेहरू
>
>
> जिस फूलपुर लोकसभा क्षेत्र से देश के पहले प्रधानमंत्री चुनाव लड़ते थे, उसका
> भूगोल अब बदल गया है। पहले वह इलाहाबाद का ग्रामीण इलाका था। इलाहाबाद में ही
> वह अत्यंत गरीब और पिछड़ा हुआ क्षेत्र था। उसमें वह आनंद भवन भी नहीं आता था,
> जहां जवाहरलाल नेहरू रहते थे। उन्होंने क्यों चुनाव लड़ने के लिए फूलपुर को
> चुना? यह खोज का विषय है। वे चाहते तो इलाहाबाद को भी चुन सकते थे। उस
> फूलपुर लोकसभा क्षेत्र में अब इलाहाबाद शहर का बड़ा हिस्सा आ गया है। यह
> संस्मरण जवाहरलाल नेहरू के लोकसभा क्षेत्र का है, जिसे तीन मूर्ति भवन के
> मौखिक इतिहास संग्रह में इतिहासकार *बीआर.नंदा* से बातचीत में *जगपत दुबे*ने दर्ज कराया था। उन्होंने उमाशंकर दीक्षित के निर्देश पर जवाहरलाल नेहरू के
> प्रतिनिधि के रूप में फूलपुर क्षेत्र का काम काज 1962 के चुनाव से पहले देखना
> शुरू कर दिया था।
>
>
> *पंडित *जवाहरलाल नेहरू 1957 में बार-बार इच्छा जाहिर कर रहे थे कि उनकी
> कांस्टीट्युएंसी में निरंतर काम करने वाला कोई व्यक्ति होना चाहिए, ताकि वहां
> लोगों को यह महसूस न हो कि उनकी देख-भाल करने और उनकी दिक्कतों को दूर करने
> वाला कोई नहीं है। कुछ ही समय में चुनाव होने वाले थे। इस दिशा में जरूरी
> प्रयास भी शुरू किए गए। लेकिन, 1959 में पंडितजी ने इस विषय पर बहुत गंभीरता
> के साथ विचार किया। फिर श्री उमाशंकर दीक्षित से कहा, “किसी तरह भी हो, मेरी
> कांस्टीट्यंसी में काम होना चाहिए।” उसी महीने यह भी तय हुआ कि मैं उनके
> क्षेत्र में दीक्षितजी की सलाह से काम करुंगा।
>
> *हालांकि,* काम पहले ही शुरू हो चुका था, लेकिन इसके बाद गांव-गांव जाकर
> सुक्ष्म स्तर पर देख-परख कर काम किया जाने लगा। इसकी पहली रिपोर्ट जब हमने
> पंडितजी को भेजी तो उन्हें जो बतलाया गया था, उससे भिन्न रिपोर्ट थी। रिपोर्ट
> देखकर वे प्रभावित हुए। उन्होंने कहा, “यह दुखद है कि मेरे क्षेत्र में गांव
> वालों की देखभाल कोई ठीक से नहीं कर पाता है।” फिर पंडितजी की सलाह से हमने
> गांव-गांव जाना शुरू किया। उसी वर्ष पंडितजी इलाहाबाद आए तो अपनी
> कांस्टीट्युएंसी के बारे में आधे-आधे, एक-एक घंटे बातें करते रहे। मुझसे हर
> महीने उनकी कांस्टीट्युएंसी की एक रिपोर्ट भेजनी पड़ती थी। रिपोर्ट में इन
> बातों का विस्तार से जिक्र होता था कि इस महीने क्या काम किया गया? लोगों की
> क्या दिक्कतें हैं? उसे हम कितना दूर कर पाए और उनकी दिक्कतों के निदान के
> लिए हम कहां-कहां जा रहे हैं? आदि।
>
> *उन्हीं *दिनों मुझे बताया गया कि पंडितजी क्षेत्र में जाना चाहते हैं। इस
> सूचना के बाद मैं बहरिया ब्लॉक के करनाईपुर गांव का दौरा करने गया। वहां के
> लोगों की काफी शिकायतें थीं। उनका कहना था कि यहां कोई नहीं आता है। हमलोग
> बिल्कुल उपेक्षित हैं। इसके बाद मैंने पंडितजी को लिखा कि आपका वहां जाना बहुत
> जरूरी है। वह मई या जून का महीना था। दिल्ली से खबर आई कि पंडितजी आएंगे।
> लेकिन, कुछ अधिकारियों और प्रांतीय कांग्रेसी नेताओं ने कहा कि करनाईपुर में
> तो मीटिंग नहीं हो सकती है। फिर मैंने कहा कि करनाईपुर में नहीं हो सकती है तो
> उसके आस-पास हो। खैर, धीनपुर में पंडितजी की जनसभा हुई। जब हम वहां पहुंचे तो
> पूरा प्रतापगढ़, जौनपुर, फूलपुर और आस-पास के लोग उन्हें देखने आया हुए थे। उस
> सभा के बाद मैंने वहां के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं से पंडितजी को मिलवाया,
> जिन्हें बड़े प्रांतीय नेताओं से मिलने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होता था। वे
> सभी से मिले। उनके कंधे पर हाथ रखते और हाल-चाल पूछते रहे। उनसे ऐसे मिले जैसे
> कि जन्म-जन्मांतर का संबंध चला आ रहा हो।
>
> *जब *हमलोग धीनपुर से लौट रहे थे तो हरिसैनगंज के पास एक कार्यकर्ता ने हाथ
> उठाया तो पंडितजी ने कानून को दरकिनार कर गाड़ी रुकवाई। फिर उससे पूछा– “कहो
> क्या हाल है?” उस कार्यकर्ता ने रोते हुए कहा कि मेरे दो लड़के पढ़ रहे हैं
> और कोई मदद नहीं है। यह सुनकर पंडितजी ने कहा- “तुमने यहां के कांग्रेस
> वालों से नहीं कहा?” इसपर उसने कहा कि मैंने सब कुछ कहा, लेकिन किसी ने मेरी
> नहीं सुनी। उसी समय उसका नाम लिखा गया। फिर पंडितजी ने कहा- “अच्छा। हम कुछ
> न कुछ करेंगे।” हमलोग आनंद भवन आए तो उन्होंने मुझसे कहा कि उस आदमी के
> बच्चों को ऐसा करना चाहिए कि उनकी पढ़ाई किसी तरह भी बंद नहीं हो।
>
> फिर उन्होंने पूछा- “क्या यही एक इंटीरियर गांव है या और हैं, इसी तरह के।”जवाब देते हुए मैंने कहा- यह तो कम इंटीरियर गांव है। यहां आपको पक्की सड़क
> ज्यादा मिली। कच्ची कम मिली। अभी तो इंटीरियर गांव इतने हैं कि जहां 15-20 मील
> जीप भी मुश्किल से जा पाती है। इस पर उन्होंने कहा- “मैं वहीं पर अपने
> क्षेत्र को देखना चाहता हूं। मुझको इन लोगों ने कुछ और ही सब्ज-बाग दिखाए
> थे, लेकिन आज कुछ ऐसा मालूम हो रहा है कि मेरे क्षेत्र में क्या है?” फिर हम
> पंडितजी के आदेशानुसार महीने में 20 दिन गांवों में जाते रहे। फिर उसकी
> रिपोर्ट तैयार करते रहे। मुझे याद है कि 1961 में जब एक बार पंडितजी इलाहाबाद
> आए थे तो किसी कारणवाश उस महीने की रिपोर्ट मैंने नहीं भेजी थी। इसपर उन्होंने
> कहा- “क्या कारण है कि इस महीने की रिपोर्ट नहीं आई?” मैंने पंडितजी को
> बताया कि जब इतने दौरे हो चुके हैं और इतनी समस्याएं वगैरह भी हैं, तो उनको
> ठीक करने के बाद ही मैं वह रिपोर्ट भेजना चाहता था। इसपर पंडितजी ने कहा- “नहीं।
> यह कांस्टीट्युएंसी की रिपोर्ट हर महीने मेरे पास आनी चाहिए।”
>
> *इससे *पहले 1960 में भी पंडितजी का आना तय हुआ तो लोग सतर्क हो गए थे। वे
> नहीं चाहते थे कि पंडितजी गांवों के भीतर जाएं, क्योंकि उन्हें बताया गया था
> कि उनके क्षेत्र में बड़ा काम हो रहा है। किसी तरह हम उनकी मीटिंग फूलपुर से
> आगे पूरेमियां, धनूपुर में रख पाए। पूरेमियां शायद पहली बार पंडितजी आए थे।
> वहां अथाह जनसमूह चारों तरफ था। इनमें औरतों की इतनी संख्या थी कि कहा नहीं जा
> सकता है। पंडितजी मंच से नीचे उतर आए और लोगों को बुल-बुलाकर मिलने लगे।
> प्रतापगढ़ के पास से एक बुढ़ा किसान वहां आया था। बिल्कुल छोटे कद का था। जाति
> से शायद कुर्मी था। पंडितजी ने जब उसे देखा तो बुलाकर गले से लिपट गए। फिर
> कहा, “कहो, हमारी भौजी का क्या हाल है।” हम दंग रह गए कि पंडितजी ऐसे कैसे
> पूछ रहे हैं। बाद में पंडितजी ने उससे कहा- “यह कैसे कपड़े-वपड़े पहने हो।
> क्या तुम्हारे पास कुछ नहीं है?” इस पर उसने कहा कि नहीं, हमारे पास कुछ
> नहीं है। तब पंडितजी ने कहा- “तुम्हारे लिए हम कुछ न कुछ इंतजाम करते हैं।”
>
> *दूसरी* मीटिंग धनूपुर ब्लॉक में थी। पूरेमिया, धनूपुर ब्लॉक कच्ची सड़क पर
> है। मीटिंग खत्म होने के बाद चाय पीते समय मैंने बताया कि यह धनूपुर ब्लॉक है
> और यह उसकी बिल्डिंग बन रही है। इसपर उन्होंने पूछा- “यह धनूपुर ब्लॉक कैसे
> हुआ?” इसके बाद वहां के बीडीओ को बुलाया गया। पंडितजी ने बीडीओ से पूछा- “यह
> बिल्डिंग कैसे बन गई? यहां सड़क तो है नहीं। यह बहुत महंगी बनी होगी।” इसके
> बाद बीडीओ ने कहा कि बहुत से ब्लॉक इसी तरह बने हैं। सड़क न होने के बावजूद
> बिल्डिंग बनी है। इसकी वजह से खर्च बहुत ज्यादा हो गया है। इसपर पंडितजी ने
> अफसोस जताया। उस समय चंद्रभानु गुप्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। दिल्ली
> जाने के बाद मुख्यमंत्री को पत्र लिखा कि इस तरह की ब्लॉक बिल्डिंग नहीं बनानी
> चाहिए, क्योंकि इससे राष्ट्र का खर्च बहुत बढ़ता है। बिल्डिंग भी ठीक से नहीं
> बन पाती है।
>
> *1961* की बात है। चुनाव का महीना आने वाला था। पंडितजी ने कहा कि मैं अपनी
> कांस्टीट्युएंसी एक बार घूम लूं। फिर एक योजना बनी। उस योजना के अनुसार उन्हें
> सोराम प्रॉपर से लेकर सिकन्दर और फूलपुर होते हुए सैदाबाद जाना था। सैदाबाद से
> पक्की सड़क मिलती है, जिससे इलाहाबाद आना पड़ता है। पंडितजी दिल्ली से
> प्रतापगढ़ आए। वहां की मीटिंग के बाद मोइमा के पास एक जगह दिन का भोजन किया।
> फिर सोराम की ओर चले। वहां भी एक छोटी जनसभा थी। उस जनसभा के बाद सिकन्दरा
> चले। वहां भी जनसभा हुई। फिर फूलपुर पहुंचे। वहां चाय की व्यवस्था थी। चाय
> पीने के बाद पार्टी के कार्यकर्ता उमाशंकर वैद्य से पंडितजी ने अचानक ही पूछ
> लिया- “तुमने चाय पी या नहीं।” इत्तफाक से उनको चाय नहीं मिल पाई थी।
> उन्होंने कहा कि अभी नहीं पी है। पी लेता हूं। इसपर पंडितजी ने कहा- “यह गलत
> बात है। कार्यकर्ता को पहले चाय पीनी चाहिए।” इसके बाद उमाशंकरजी ने जबतक
> चाय नहीं पी ली, पंडितजी वहीं खड़े रहे। जब वे गाड़ी में बैठने लगे तो ड्राइवर
> से भी यही पूछा। उसे भी चाय नहीं मिली थी। इसके बाद पंडितजी तब तक वहीं रुके
> रहे, जबतक सभी ने चाय नहीं पी ली।
>
> *खैर,* हमलोग फूलपुर से आगे बढ़े तो शाम हो चुकी थी। थोड़ी बारिश भी होने
> लगी थी, लेकिन जगह-जगह लोग लालटेन लिए रास्ते पर खड़े थे। इनमें बच्चे और
> बुढ़ी महिलाएं भी शामिल थीं। लोगों का हुजूम जहां होता, वहीं पंडितजी गाड़ी से
> उतरकर उनके पास जाते और हाल-चाल पूछते थे। सैदाबाद तक यही नजारा था। सैदाबाद
> से हम हनुमानगंज पहुंचे तो वहां विरोधियों का एक बड़ा जमघट था। पुलिस के कई
> अधिकारी हनुमानगंज में मौजूद थे। तनाव बना हुआ था, लेकिन पंडितजी पहुंचे तो
> सभी शांत हो गए। यह मालूम ही नहीं हो पाया कि ये लोग लाल झंडे लिए हुए हैं और
> इनको नारेबाजी भी करनी है। वहां से दारागंज आए तो वहां तनावा अधिक था। संकरा
> रास्ता था। भीड़ काफी थी। विरोधी भी थे। हमलोग पंडितजी को गाड़ी से बाहर आने
> से मना कर रहे थे। उस समय इंदिरा भी साथ थीं। उन्होंने भी रोका, पर वे नहीं
> माने। गाड़ी की गेट के सहारे एक पांव पर खड़े हो गए। जबतक लोग शांत नहीं हो
> गए, तबतक पंडितजी गाड़ी के भीतर नहीं आए। ताज्जुब की बात है कि जो लोग वहां
> गाली देने वाले थे, वे भी शांत हो गए।
>
> *इसके *बाद जब हमलोग *आनंद भवन आए तो पंडितजी ने कहा-* “जगपत, तुमने मुझे आज
> मेरी रीयल कांस्टीट्युएंसी दिखलाई। मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी कि मेरी
> कांस्टीट्युएंसी इतनी नेग्लेक्टेड है। मुझे अबतक जो भी बताया गया, वह सब धोखा
> था।” जब देर रात हमारी बातचीत शुरू हुई तो वे पूछने लगे- सड़कें कितनी हैं? कितनी
> पक्की हैं? कितनी कच्ची हैं? ट्यूबवेल कितनी हैं? खेती के क्या साधन हैं?स्कूल कितने हैं
> ? ये थे पंडित नेहरू, जिनके पास देशभर का काम था। इसके बाद भी अपनी
> कांस्टीट्युएंसी के वोटर और कांग्रेसी कार्यकर्ता को नहीं भूला पाए थे।
> बार-बार पूछते- “मेरे क्षेत्र में क्या हो रहा है? कैसा हो रहा है?”
>
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