[दीवान] On Dibakar's 'Star'
Mihir Pandya
miyaamihir at gmail.com
Wed Jan 1 06:30:11 CST 2014
संशोधित अंश यहाँ प्रकाशित —
http://moifightclub.wordpress.com/2013/12/30/2013-rewind-16-film-buffs-on-16-most-memorable-movie-scenes-of-the-year/
हिन्दुस्तान की ही नहीं, शायद विश्व की सबसे प्रामाणिक ग्रामीण फिल्मों में से
एक बनाने वाले निर्देशक सत्यजित राय मूलत: एक शहरी फिल्मकार थे। हमारे वर्तमान
महानगर के चितेरे। उसकी अाकांक्षाअों के, उसके अपमानों के। मुझे श्याम बेनेगल
के उन पर बनाये उस प्रामाणिक वृत्तचित्र का अंतिम दृश्य याद अाता है। राय अपने
घर में अपने घर में, अपने कमरे में अपनी वर्किंग डेस्क पर बैठे हैं अौर अपना
वही मशहूर सिगार पी रहे हैं। अौर फिर कैमरा ज़ूम-अाउट होता है। एक ही सिंगल
शॉट में हम देखते हैं कि कैमरा पैन-अाउट होता हुअा खिड़की से बाहर निकलता है,
अौर हालांकि राय अब भी हमारे सामने हैं लेकिन उनके साथ अब अन्य बहुत कुछ इस
फ्रेम में है। एक पूरा शहर इस एक सिंगल शॉट में जैसे राय के साथ चला अाता है।
एक ही फ्रेम में हम बीच में उनका घर देख रहे हैं जिसकी बीचोंबीच खिड़की में अब
भी राय बैठे दिखाई दे रहे हैं, वही सिगार के साथ। लेकिन अब इस वाइड एंगल में
चारों अोर से कलकत्ता की बहुमंजिला इमारतें अौर बाज़ार भी चले अाये हैं। यह एक
दृश्य फिल्मकार को उसके सबजेक्ट के ठीक बीचोंबीच स्थापित करता है अौर शायद
हमें यह भी बताता है कि किसी भी रचना को जैसे उसके समय से निरपेक्ष नहीं पढ़ा
जा सकता, ठीक वैसे ही किसी भी रचना को उसके स्थान से निरपेक्ष रख के पढ़ना भी
मुश्किल है।
दिबाकर की* 'स्टार' *के उस अंतिम पोर-पोर जादू से भरे दृश्य में जहाँ पुरंदर
(नवाजुद्दीन सिद्दीक़ी) अपनी बेटी को अपने जीवन का एक दिन पुन:रचकर सुना रहे
हैं, दिखा रहे हैं, ठीक ऐसे ही एक पैन-अाउट होते हुए कैमरे के साथ पूरा शहर
उनके दृश्य की सीमा के भीतर चला अाता है। यहाँ वो नायकत्व है जिसका दायरा अपनी
चाल की बालकनी से अागे नहीं बढ़ पाया। यहाँ वो पिता है जो अपनी बेटी के लिए
रची कहानियों में भी कभी नायक नहीं हो पाया अौर उसे कल्पना की दुनिया में भी
सदा किसी 'िहृतिक' का सहारा लेना पड़ा। यहाँ वो इंसान है जिसकी असफलता अगर गौर
से देखें तो हमारे वर्तमान शहर की वो बची-कुची ईमानदारी अौर असलीपना है जिसके
होने के चलते ही पुरंदर अाज भी इस शहर में मिसफिट है। 'स्टार' सही मायनों में
बम्बई की कथा है। उस बम्बई की जिसके लिए सिनेमा उद्योग सपनों की नगरिया नहीं,
अपने दिहाड़ी रोज़ी-रोटी कमाने अौर खाने का एक ज़रिया भर है। उन रिक्शाठेला
चलानेवालों अौर चाैकीदारी में सदा हाज़िरी बजानेवालों की कथा जिनके लिए किसी
बड़े फिल्मस्टार के अचानक न अाने पर हुए पैकअप का अर्थ रात को बिना खाना खाये
सो जाना है। उन दर्ज़ियों की अौर लाइटवालों की कथा है जिनके सिले परिधानों अौर
खड़े किये प्रकाश स्तंभो के चलते किसी अौर की दुनिया इठलाती है, जगमगाती है।
उन कोरस में गानेवालों की कथा है जिनके नाम कभी किसी रिकार्ड कम्पनी के लेबल
पर नहीं अाते। उन 'एक्सट्रा' कहे जानेवाले कलाकारों की कथा है जिनके लिए किसी
सिनेमा के क्रेडिट्स में जगह नहीं। मुझे अाद अाता है ज़ोया अख़्तर की बेहतरीन
'लक बाए चांस' का वो अारंभिक दृश्य जो इस 'सपनों की दुनिया' कहे गए शहर में
थोड़े असलियत के रंग भरता है। मुझे याद अाता है हमारी दोस्त देबाश्री मुखर्जी
का सराय के लिए किया वो शोधकार्य जिसके सिलसिले में वो इन्हीं 'एक्सट्रा' कहे
जानेवाले कलाकारों की ज़िन्दगी कुरेदती 'जूनियर अार्टिस्ट एसोसिएशन' के दफ्तर
पहुँच गई थीं अौर जाना था कि किस तरह एक्सट्रा कलाकारों में भी 'डीसेंट'
दिखनेवालों की अलग कैटिगरी होती है, जिन्हें गंवार दिखनेवालों से ज़्यादा पैसा
मिला करता है। अौर याद अाती है सुदामा पाण्डे 'धूमिल' की कविता मोचीराम, "बाबू
जी सच कहूँ - मेरी निगाह में / न कोई छोटा है / न कोई बड़ा है / मेरे लिए, हर
आदमी एक जोड़ी जूता है / जो मेरे सामने / मरम्मत के लिए खड़ा है।"
यहाँ मुम्बई की बन्द हुई मिलें हैं अौर बेरोज़गार हुए मजदूरों के घरों का ठंडा
चूल्हा है। तमाम सिनेमा की पृष्ठभूमि पर ऊँची चिमनियाँ है उन मिलों की जिनका
धुअाँ जीवन की अग्नि की तरह कब का बुझ चुका है। यहाँ कुछ सर्वश्रेष्ठ अदाकार
हैं जो विदर्भ से मुम्बई तक कुछ सौ किलोमीटर की दूरी अपने जीवनकाल में कभी
पाट नहीं पाये। फाकों पर होता थियेटर है अौर उसमें फिर बराबरी का स्वप्न है।
यहाँ अपने बाप की पेंशन पर जीता अौर समाज की नज़रों में एक असफ़ल इंसान है,
अौर फिर एक निर्णायक क्षण है जब वह खुद पिता हो जाता है। सिनेमा के दायरों से
परे एक अौर दुनिया है जिसमें अाज संतुष्टि को असफलता अौर असफलता को अयोग्यता
का मूल मान लिया गया है। ऐसे समय में जहाँ अापके होने से ज़्यादा दिखाई देने
का महत्व हो, 'स्टार' इशारा करती है कि सफल-असफल के खांचों के परे भी एक संसार
होगा जिसमें योग्यता प्रदर्शन की मोहताज नहीं होगी। 'स्टार' उस जीवन के बारे
में है जिसे अपने दायरे की पहचान करनी है, अौर जानना है कि उसका 'स्टार' होना,
न होना दुनिया की स्वीकार्यता पर नहीं, सिर्फ एक बच्ची की हंसी पर निर्भर है।
अौर इसके साथ ही यह हमें समझना है कि महत्वाकांक्षा का जयगान गानेवाले इस
दुर्दांत समय में 'संतुष्टि' एक दुर्लभ मूल्य है।
--
Mihir Pandya
New Delhi
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