[दीवान]तो भी हम साथ तो देंगे ही, #यूपीएससीवाली हिन्दी
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Wed Jul 9 02:39:43 CDT 2014
हमें पता है कि हिन्दी माध्यम से जो यूपीएससी या पीसीएस की परीक्षा पास करेंगे
और करते आए हैं, उनमे से न केवल अधिकांश दोबारा पलटकर इस दुनिया को ताकने भी
नहीं आएंगे. उल्टे साहित्य के प्रति जो थोड़ा-बहुत लगाव बना भी रह गया तो
उन्हें हिन्दी पब्लिक स्फीयर पर रौब-गांठने और अधिकारी होने की थोड़ी सुविधा
नामवरों को मुहैया कराकर अपने संगे-संबंधियों के लिए लेखन और अकादमिक दुनिया
के लिए जगह बनाने में लगेंगे. तब हम उनके लिए हिन्दी की गटर में रेंगनेवाले
जीव से ज्यादा कुछ भी नहीं होंगे.
माफ कीजिएगा जिस बाबा नागार्जुन,मुक्तिबोध,निराला,राग दरबारी को सेलबस के तहत
पढ़कर वो सामंतवाद, शोषण और व्यवस्था के झोल के प्रति समझ बनाते हैं, वो सब एक
वैलिडिटी पीरियड की चीज हो जाती है और हो भी जाएगी. प्रतियोगिता परीक्षा क्या
अब तो बाकायदा अकादमिक दुनिया में भी साहित्य का छंटाक भी जीवन में उतर नहीं
पाता. ऐसे में जिस हिन्दी को आप अस्मिता और सामूहिकता का पर्याय के रूप में
देखते हैं, वो उसी व्यवस्था में रहकर आमफहम को चूसने का जरिया भर बनकर रह जाता
है, जिसके खिलाफ ये भाषा और इसमे व्यक्त चीजें खड़ी दिखाई देती है. तब वो ये
"फ्यूडल थर्स्ट" को पूरी करने का माध्यम बन जाती है.. लेकिन
इन सबके बावजूद सीमित उद्देश्य के लिए ही सही, यूपीएससी के बहाने हिन्दी को
लेकर सड़कों पर उतरे मैं उन तमाम प्रतिभागियों के साथ हूं जो इस भाषा के जरिए
एक मुकाम हासिल करना चाहते हैं..बस इस उम्मीद से भी कि इसी परीक्षा के जरिए गर
कोई वहां पहुंचता है और "राग दरबारी" जैसा कुछ दे जाता है या कुछ नहीं तो अपने
ऑफिस में ही संवेदना की इतनी जमीन बचा ले जाता है कि अपने अधीनस्थ लोग उन्हें
मातहत नहीं इंसान दिखाई देते हैं तो भाषा आखिर में कुछ तो बचा ही ले जाएगी.
दूसरा कि वो सिस्टम के कल-पुर्जे जब बनेंगे तब बनेंगे, अभी तो इस भाषा के
बहाने उन्हें भी होरी महतो और चंदू जैसा ही देखा-समझा जा रहा है..एक भाषा के
बहाने इस तरह मौके से बेदखल किया जाना किसी भी हाल में सही तो नहीं ही है.
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