[दीवान]अतीत का पुच्छल्ला चुभता है; पालिका बाजार, कनॉट प्लेस
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Mon Jun 9 00:55:02 CDT 2014
[image: Photo: पालिका बाजार( कनॉट प्लेस) में अगर आप दूकानों के नाम के हिसाब
से चीजों की उम्मीद करेंगे और खोजेंगे तो आपकी ढिबरी का पूरा तेल फुंक जाएगा
लेकिन कभी आप सफल न हो सकेंगे..देख ही रहे हैं, दूकान का नाम मीडिया से जुड़ा
है और बिक क्या रहा है-मट्टीमार जींस पैंट और छिंटदार टीशर्ट और लौंड़ों की
हसरतें..तो ऐसी एक नहीं दर्जनों दूकानें हैं जिनके नाम से आपको लगेगा कि ये
मीडिया से जुड़ी चीजें, गेजेट या इलेक्ट्रॉनिक की दूकानें हैं लेकिन अंदर माल
बिक रहे हैं रेडिमेट गार्मेट्स और रोजमर्रा के चालू आइटम. हम जैसे लोग जो
पालिका बाजार फैशन की एबीसी नहीं जानते और इसके लिए कभी जाना भी नहीं होता
बल्कि मीडिया औऱ उसकी खुराफाती से नाता है तो कुछ न कुछ उनसे जुड़ी चीजे
खरीदने जाते हैं तो भारी दिक्कत होती है. खूब छक्का-पंजा करके दूकान का नाम और
नंबर पता कर भी लें तो पता चलता है कि यहां मॉजरवियर की सीडी नहीं, लॉग्जरे,
बिलाउज पेटीकोट मिलते हैं..लेकिन पहले तो.. ये वाक्य आपने इस्तेमाल किया नहीं
कि वो उपर से नीचे तक आपको देखेंगे- लगता है आप चार साल बाद यहां आ रहे हैं ?
मतलब बाप के जमाने में जहां बाजा बिकता था, अब वहां पाजामा बिक रहा है. पूरी
मार्केट पर पड़ोसी दूकानों का दवाब आपको साफ दिख जाएगा. जिससे एक कैटेगरी और
बनती है कि दूकान के एक हिस्से में शर्ट बिक रही है तो दूसरे हिस्से में टार्च
और उधर टेलीफोन का चोंगा. इन तीनों धंधे का आपस में कोई संबंध नहीं है फिर
भी..मतलब दूकान नंबर और नाम का आपकी जरूरत से कोई संबंध नहीं रह जाता. ऐसे में
एक स्थिति ये बनती है कि आप दूकान का नाम के बजाय उसके पुराने मालिक का नाम
पता करें. मसलन ये जो त्रिपाठीजी की माइक की दूकान थी, वो कहां है. ध्यान रहे,
ये सवाल चालीस पार से करें नहीं तो इससे कम उम्रवाले आपको लिए-दिए अपनी दूकान
में अंदार घुसा देंगे..अब आगे आपको सुई चाहिए या रिलायंस के ट्रांसपांडर, सब
उपलब्ध कराने के दावे करने लगेंगे. मतलब इन बड़े-बड़े साइनबोर्ड के झूठे पड़
जाने के बीच एक टुकड़ा सच ये बचा है कि अभी भी पालिका बाजार की कई दूकानें
उनके पुराने मालिक के नाम से जानी जाती है. बीच-बीच में एकाध बुजुर्ग ऐसे भी
मिल जाएंगे कि जैसे ही आप पूछेंगे ये सिंघल साहब की ट्रायपॉड की दूकान कौन सी
है. वो इत्मिनान से काउंटर से बाहर निकलेंगे और कहेंगे- चलिए हमारे साथ. गोया
आप सिंघल साहब के छोटे दामाद हों. लो भई सिंघल..आपके पुराने कद्रदान आए हैं,
भटक रहे थे तो सोचा पहुंचा दूं सही जगह पर और तुमसे भी दुआ-सलाम हो जाएगी. इस
वक्त आपकी चीजें मिलने की उत्सुकता कम जाएगी और आप दोनों की केमेस्ट्री से बंध
जाएंगे. साफ लग जाएगा कि दूकानदारी और यारी के बीच इनका गाढ़ा रिश्ता रहा
है..इसी दौरान जब आप उनके बीच ये एक लाइन सुनेंगे कि- हां, चड्ढा, 34 साल से
तो हम यही कर रहे हैं, तुम्हारे कद्रदान उपर भटकते हैं और मेरे कद्रदान नीचे
जबकि उन्हें पता ही नहीं, उपर-नीचेवाला दोनों एक ही हैं तो समझ आ जाएगा दूकान
के नाम,नंबर और होर्डिग बस ऐवें टाइप से लगे हैं, जिसका कोई खास मतलब नहीं है.
मंडी की दूकानें जहां कि एकमुश्त एक ही चीज की कई दूकानें होती हैं, उन पर चलन
का दवाब हमेशा काम करता है और जहां कोई एक धंधा हिट हुआ नहीं कि बाकी उसके
पीछे लग जाते हैं. पालिका बाजार में घूमते हुआ आपको सहज ही अंदाजा लग जाएगा कि
फिल्मों की कैसेट, सीडी, मीडिया के काम आनेवाली चीजें, इलेक्ट्रॉनिक गेजेट्स
आदि का पर्याय ये बाजार अब तेजी से टैंक रोड और गांधीनगर क डिस्प्ले यूनिट में
तब्दील होता जा रहा है. हम जैसे का मन थोड़ा उदास हो जाता है. कितनी चड्डी,
बनियान, ब्रा, कैप्री पहनोगे यार, थोड़ी तो पुरानी फिल्में,किताबें, गाने पर
भी काम कर लो..इत्ता भी नहीं कर सकते तो नाम तो हटा तो..नजरों में इतिहास का
ये पुच्छल्ला बुरी तरह चुभता है...#दरबदरदिल्ली]
पालिका बाजार( कनॉट प्लेस) में अगर आप दूकानों के नाम के हिसाब से चीजों की
उम्मीद करेंगे और खोजेंगे तो आपकी ढिबरी का पूरा तेल फुंक जाएगा लेकिन कभी आप
सफल न हो सकेंगे..देख ही रहे हैं, दूकान का नाम मीडिया से जुड़ा है और बिक
क्या रहा है-मट्टीमार जींस पैंट और छिंटदार टीशर्ट और लौंड़ों की हसरतें..तो
ऐसी एक नहीं दर्जनों दूकानें हैं जिनके नाम से आपको लगेगा कि ये मीडिया से
जुड़ी चीजें, गेजेट या इलेक्ट्रॉनिक की दूकानें हैं लेकिन अंदर माल बिक रहे
हैं रेडिमेट गार्मेट्स और रोजमर्रा के चालू आइटम.
हम जैसे लोग जो पालिका बाजार फैशन की एबीसी नहीं जानते और इसके लिए कभी जाना
भी नहीं होता बल्कि मीडिया औऱ उसकी खुराफाती से नाता है तो कुछ न कुछ उनसे
जुड़ी चीजे खरीदने जाते हैं तो भारी दिक्कत होती है. खूब छक्का-पंजा करके
दूकान का नाम और नंबर पता कर भी लें तो पता चलता है कि यहां मॉजरवियर की सीडी
नहीं, लॉग्जरे, बिलाउज पेटीकोट मिलते हैं..लेकिन पहले तो.. ये वाक्य आपने
इस्तेमाल किया नहीं कि वो उपर से नीचे तक आपको देखेंगे- लगता है आप चार साल
बाद यहां आ रहे हैं ? मतलब बाप के जमाने में जहां बाजा बिकता था, अब वहां
पाजामा बिक रहा है.
पूरी मार्केट पर पड़ोसी दूकानों का दवाब आपको साफ दिख जाएगा. जिससे एक कैटेगरी
और बनती है कि दूकान के एक हिस्से में शर्ट बिक रही है तो दूसरे हिस्से में
टार्च और उधर टेलीफोन का चोंगा. इन तीनों धंधे का आपस में कोई संबंध नहीं है
फिर भी..मतलब दूकान नंबर और नाम का आपकी जरूरत से कोई संबंध नहीं रह जाता.
ऐसे में एक स्थिति ये बनती है कि आप दूकान का नाम के बजाय उसके पुराने मालिक
का नाम पता करें. मसलन ये जो त्रिपाठीजी की माइक की दूकान थी, वो कहां है.
ध्यान रहे, ये सवाल चालीस पार से करें नहीं तो इससे कम उम्रवाले आपको लिए-दिए
अपनी दूकान में अंदार घुसा देंगे..अब आगे आपको सुई चाहिए या रिलायंस के
ट्रांसपांडर, सब उपलब्ध कराने के दावे करने लगेंगे.
मतलब इन बड़े-बड़े साइनबोर्ड के झूठे पड़ जाने के बीच एक टुकड़ा सच ये बचा है
कि अभी भी पालिका बाजार की कई दूकानें उनके पुराने मालिक के नाम से जानी जाती
है. बीच-बीच में एकाध बुजुर्ग ऐसे भी मिल जाएंगे कि जैसे ही आप पूछेंगे ये
सिंघल साहब की ट्रायपॉड की दूकान कौन सी है. वो इत्मिनान से काउंटर से बाहर
निकलेंगे और कहेंगे- चलिए हमारे साथ. गोया आप सिंघल साहब के छोटे दामाद हों.
लो भई सिंघल..आपके पुराने कद्रदान आए हैं, भटक रहे थे तो सोचा पहुंचा दूं सही
जगह पर और तुमसे भी दुआ-सलाम हो जाएगी. इस वक्त आपकी चीजें मिलने की उत्सुकता
कम जाएगी और आप दोनों की केमेस्ट्री से बंध जाएंगे. साफ लग जाएगा कि दूकानदारी
और यारी के बीच इनका गाढ़ा रिश्ता रहा है..इसी दौरान जब आप उनके बीच ये एक
लाइन सुनेंगे कि- हां, चड्ढा, 34 साल से तो हम यही कर रहे हैं, तुम्हारे
कद्रदान उपर भटकते हैं और मेरे कद्रदान नीचे जबकि उन्हें पता ही नहीं,
उपर-नीचेवाला दोनों एक ही हैं तो समझ आ जाएगा दूकान के नाम,नंबर और होर्डिग बस
ऐवें टाइप से लगे हैं, जिसका कोई खास मतलब नहीं है.
मंडी की दूकानें जहां कि एकमुश्त एक ही चीज की कई दूकानें होती हैं, उन पर चलन
का दवाब हमेशा काम करता है और जहां कोई एक धंधा हिट हुआ नहीं कि बाकी उसके
पीछे लग जाते हैं. पालिका बाजार में घूमते हुआ आपको सहज ही अंदाजा लग जाएगा कि
फिल्मों की कैसेट, सीडी, मीडिया के काम आनेवाली चीजें, इलेक्ट्रॉनिक गेजेट्स
आदि का पर्याय ये बाजार अब तेजी से टैंक रोड और गांधीनगर क डिस्प्ले यूनिट में
तब्दील होता जा रहा है. हम जैसे का मन थोड़ा उदास हो जाता है. कितनी चड्डी,
बनियान, ब्रा, कैप्री पहनोगे यार, थोड़ी तो पुरानी फिल्में,किताबें, गाने पर
भी काम कर लो..इत्ता भी नहीं कर सकते तो नाम तो हटा तो..नजरों में इतिहास का
ये पुच्छल्ला बुरी तरह चुभता है...#दरबदरदिल्ली
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