[दीवान]बेगम अख्तर
brajesh kumar jha
jha.brajeshkumar at gmail.com
Sat Nov 1 08:30:20 CDT 2014
ठुमरी की रानी, गजल की मलिका
वे मलिकाए-गजल थीं, तो ठुमरी की रानी भी। जब पैदा हुईं तो बड़े लाड़ से नाम
रखा गया- बिब्बी। थोड़ी बड़ी हुईं तो अख्तरी हो गईं। गायकी में नामवरी फैली तो
अख्तरी बाई फैजाबाद बनीं। फिर बेगम अख्तर के नाम से आमलगीर शोहरत की मालकिन।
इसी बेगम अख्तर के बारे में उस जमाने के लोग बताते हैं कि जब वे गाती थीं तो
लगता था कि काइनात उन्हें सुन रही है। उनकी आवाज मोहब्बत की आवाज थी। शांति
हीरानंद तो कहती हैं, “अम्मी का अंदाजे-बयां ठेठ लखनवी-फैजाबादी था। उनकी
गायकी में गजब की नजाकत थी, जो बनारस की शैली से बिल्कुल अलग थी।”
मसला केवल गजल का नहीं था, बल्कि हकीकत है कि बेगम अख्तर ने गजल गायकी को जो
सम्मान और पायेदारी बख्शी, लोक गायकी को भी वही ऊंचाइयां दीं। एक तरफ उन्होंने
‘शाम-ए-गम कुछ उस निगाहें नाज की बातें करो, बेखुदी चली है राज की बातें करो’,
‘इब्ने मरियम हुआ करे कोई’ जैसी रूहदार गजलें गाईं, तो दूसरी तरफ ‘मितवा माने
ना’, ‘ना जा बलम परदेश’ जैसी ठुमरियां गाईं, जिसका कोई जवाब नहीं है। केवल
इतनी ही बात नहीं है, बल्कि होरी, कजरी, चैती, दादरा में भी उनका कोई जोड़
नहीं रहा। देश क्या! परदेश में भी उन्होंने आंचलिक गीत मसलन- ठुमरी, चैती,
दादरा को लोकप्रिय बना दिया था। लोग बताते हैं कि बेगम अख्तर ने अवधी दादरों
को कलकत्ते से लेकर कराची तक मशहूर कर दिया था। वे आगे लिखते हैं- साठ के दशक
में जब बेगम कराची गईं तो गजल प्रेमियों के जलसे में आवाज उठ रही थी कि- बेगम
साहिबा, दाग, गालिब, मीर बहुत हो गया। हमें तो वही सुना दो- ‘हमरी अटरिया पर
आओ संवरिया देखा-देखी बलम हुई जाए।’
आज बेगम अख्तर होतीं तो पूरे सौ साल की होतीं। पर साठ की उम्र में ही वे इस
दुनिया को छोड़ गईं। शांति हीरानंद ने 1952 में बेगम अख्तर की शागिर्दी ली थी।
फिर उनके आखिरी वक्त तक साथ रहीं। अपनी यादों की पोटली टटोलते हुए वे कहती
हैं, “तब में 18 साल की थी, जब पहली बार अम्मी के घर गई। मैंने उनसे बहुत
सीखा। फिर कार्यक्रम के लिए उनके साथ न जाने कहां-कहां गई।” बातचीत आगे बढ़ी
तो वे कहती हैं, “मेरी तबियत सूफियाना थी। मैं शाकाहारी भोजन करती थी, लेकिन
एक बार अम्मी ने मांस का टुकड़ा खिलाते हुए कहा- ‘यह खावो। प्रसाद है।’ फिर
मैं मांस खाने लगी। जब अम्मी चली गईं तो मैंने मांसा खाना भी छोड़ दिया।”
बेगम अख्तर जिस समय की आवाज है, उस जमाने में कम गायिकाएं हुईं जो शास्त्रीय
संगीत से अलग मशहूर हुईं। हालांकि, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में वे पारंगत
थीं। उनकी शागिर्द रही रीता गांगुली ने मंजरी सिन्हा से बातचीत मं कहा है-
“बेगम गाते-गाते यमन या भैरवी में इत्मीनान से आती-जाती और किसी को पता भी
नहीं चलता।” सवालिया अंदाज में वे कहती हैं कि बिना शास्त्रीय संगीत की पुख्ता
नींव के ऐसा करिश्मा संभव हो सकता है क्या? उनकी यह बातचीत जनसत्ता ने बीते
पांच अक्टूबर को छापी है। खैर, गजल की दुनिया में बेगम अख्तर ने ऐसी जगह बनाई,
जहां अबतक कोई गजल पैकार नहीं पहुंच सका है। संगीत की बारीक समझ रखने वालों की
राय है कि पाटदार और रियाजी आवाज के साथ-साथ वे ‘आर्ट ऑफ कम्युनिकेशन’ यानी
संप्रेषणीयता की कला को भी खूब जानती-समझती थीं। जब वे गाती थीं तो सुनने
वालों में हर एक को लगता कि बेगम उसी के लिए गा रही हैं। अपने समय की वे ऐसी
अकेली गायिका थीं। यह उनकी आवाज का ही असर था कि मेवाती घराने के महान गायक
पंडित जसराज ने स्वीकार किया है कि वे जब छह साल के थे तो ‘दीवाना बनाना’ का
रिकार्ड सुना था और मन में यह बात बिठा ली थी कि बस ऐसे ही गाना है। बेगम
अख्तर के बारे में जानकारी इकट्ठा करते हुए गाजियाबाद ‘वैशाली’ स्थित प्रमोद
द्विवेदी के घर जाना हुआ तो उन्होंने अपने म्यूजिक-प्लेयर पर पूरी गजल सुनाई।
आखिर क्या बात थी उनकी आवाज में? अपने एक लेख का हवाला देते हुए उन्होंने
बताया कि गले में संक्रमण के कारण बाद में उनकी आवाज ऊपर जाकर चटक जाती थी।
शास्त्रीय गायन के हिसाब से यह ऐब था, लेकिन आवाज के इस टूटने को बेगम की
‘सितमगर पत्ती’ कहा गया। बेगम अख्तर ने इसे सुधारने की कोई कोशिश भी नहीं की।
वह पत्ती बेगम अख्तर की गजलों की फूलदान पत्ती बनी। खुद एक साक्षात्कार में
बेगम अख्तर ने दूसरी बात कही थी। बेगम ने बताया था, “उस्ताद जी (अता मोहम्मद
खां) खरज भरने का अभ्यास इतना ज्यादा कराते थे कि जी ऊब जाता। पर उनका कहना था
कि आवाज इसी से बनेगी। मैं ऐसी विकट सुर साधना से पल्ला छुड़ाने के चक्कर में
थी, लेकिन एक दिन राग गुणकली उनसे सुनकर मुझे इस सुर-अभ्यास का महत्व समझ में
आया। इसके बाद कभी मैंने कोताही नहीं की। मैं अहसानमंद हूं अपने उस्ताद की,
जिन्होंने मुझे इस लायक बनाया।”
हालांकि उनकी गायकी में असल में रंग तब चढ़ा, जब बेगम ने उस्ताद वहीद खां की
शागिर्दी ली। इस दौरान उन्होंने किराना घराने की गायकी के काफी गुर सीखे। शायद
यही वजह थी कि वे समय और पहर के हिसाब से गजल, दादरा और ठुमरी के राग बदल-बदल
कर सुनाती थीं। प्रचलित रागों के अलावा वे कलावती, देशकाल, नारायणी जैसे रागों
में अपनी गायकी बखूबी पेश करती थीं। एक तरफ ‘ए मोहब्बत तेरे अंदाज पर रोना
आया’ को इत्मीनान से गाती थीं तो वहीं ‘निहुरे-निहुरे बुहारे अंगनवा’ गाते
वक्त गजब रंग घोलती थीं। लोग बताते हैं कि उस जमाने की लोकगायिका प्रेमा बाई
का असर उनके दादरा में दिखता है, जबकि नरगिस की मां जद्दनबाई का उनकी ठुमरियों
पर काफी असर था। इतना ही नहीं, बल्कि मलकाजान गौहरजान की गायन शैली से भी वे
काफी कुछ सीखती रहीं।
एक और बात है, जिसके लिए बेगम अख्तर हमेशा याद आती रहेंगी। वह यह कि जब गजल
इश्के-मिजाजी में ही उलझी थी, तब बेगम ने उसमें बहाव पैदा किया। गजल जो कोठे
की जीनत बनकर रह गई थी, उसे जन साधारण तक पहुंचाने का बड़ा काम किया। बेगम की
मशहूर गजल ‘ए मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया’ के पीछे एक दिलचस्प किस्सा है।
इसकी गवाह रहीं, उनकी शिष्या शांति हीरानंद ने बताया, “यह मेरे सामने की बात
है। इसे मैं सभी को बताती रहती हूं।” वह किस्सा कुछ इस तरह है। मुंबई के एक
जलसे में शिरकत करने के बाद जब बेगम मुंबई सेंट्रल स्टेशन से लखनऊ के लिए
रवाना हो रही थीं तो शकील बदायूंनी ने उनके हाथ में एक कागज दिया, जिसे बेगम
ने अपने बटुए में रख लिया। लेकिन सफर के दौरान कैप्सटन सिगरेट फूंकने के दौरान
अचानक उन्हें कागज की याद आई। फिर क्या था! फर्स्ट क्लास के उस कूपे में
उन्होंने अपना हारमोनियम निकाला और धुन गुनगुनाने लगीं। जल्द ही धुन पूरी हो
गई। फिर उन्होंने कागज बटुए में रख लिया। लखनऊ पहुंचने के सप्ताह भर बाद बेगम
ने ऑल इंडिया रेडियो के लिए खासतौर पर यह गजल गई, जिसे श्रोताओं ने बेइंतहा
पसंद किया। जब बेगम ने आखिरी पंक्ति गई- ‘जब हुआ जिक्र जमाने में मोहब्बत का
शकील’ तब लोगों ने जाना कि यह गजल शकील बदायूंनी की है। उस दौर के ऐसे कई शायर
जिसे दुनिया नहीं जानती थी, बेगम अख्तर को आवाज जब उनकी गजल को मिलती तो वे
रातों-रात मशहूर हो जाते थे।
बेगम काफी सिगरेट फूंकती थीं। इससे उन्हें कहीं कोई पहरेजदारी नहीं थी। 80 पार
कर चुकीं शांतिजी बताती हैं कि उन्हें सिगरेट की पुरानी आदत थी। रेहान फजल ने
अपने एक लेख में लिखा है कि सिगरेट पीने की वजह से उन्हें फिल्म ‘पाकीजा’ छह
बार देखनी पड़ी थी। हर बार वे सिगरेट पीने के लिए हॉल से बाहर आती और जबतक
भीतर लौटती, फिल्म का कुछ हिस्सा निकल जाता था। अगले दिन वे उस हिस्से को
देखने दोबारा आती। इस तरह छह बार में उन्होंने पूरी फिल्म देखी। वैसे इस ऐब के
बावजूद बेगम नेक दिल और बेहद उदार महिला थी। जिसने जो मांगा, उसे वो चीज दे दी।
1989 में ‘सरगम के सफर’ नाम से प्रकाशित हुई पत्रिका ने कहा था कि फिल्मों से
बाहर बेगम अख्तर को जो शोहरत, इज्जत और दौलत मिली, उसे देखकर यह अंदाजा लगाना
मुश्किल है कि कभी वे फिल्मों में गाती तथा अभिनय भी करती थीं। पत्रिका के
अनुसार- ईस्ट इंडिया कंपनी कलकत्ता की फिल्म ‘नल-दमयंती’ और ‘एक दिन का
बादशाह’ में पहली बार वे रूपहले परदे पर आईं। अमीना, मुमताज बेगम, जवानी का
नशा जैसी फिल्मों में भी उन्होंने काम किया, लेकिन इन फिल्मों के ग्रामोफोन
रिकॉर्ड जारी नहीं हुए थे।
उस जमाने के प्रसिद्ध तबलावादक मुन्ने खां के हवाले से प्रमोद द्विवेदी बताते
हैं कि 1942 में जब महबूब खां ने फिल्म ‘रोटी’ बनाई तो उसमें बेगम ने छह गीत
गाए थे, लेकिन बाद में सभी गीत निकाल दिए गए। वजह आज तक किसी को मालूम नहीं।
लेकिन, एक प्रसिद्ध संगीतकार ने बताया कि महबूब खां ने बेगम से कुछ समझौता
करने को कहा था। इसपर वे भड़क उठीं। महबूब हीरोइनों से बेअदबी के मामले में
पहले से ही बदनाम थे। बेगम से चिढ़ने के कारण उनके गाए गीत फिल्म से निकाल दिए
गए। इस घटना के बाद बेगम लखनऊ लौट आई थीं। आखिरी बार उन्होंने सत्यजीत रे की
बांग्ला फिल्म ‘जल सागर’ में काम किया था। इसके लिए वे कोलकाता गई थीं, जहां
उन्होंने ठुमरी गई थी। यह बात 1958 की है।
अहमदाबाद में 30 अक्टूबर, 1974 की रात नौ बजे उनका देहांत हो गया। वे अपने
आखिरी समय तक जलसे में गाती रहीं। शांति हीरानंद बताती हैं कि अम्मी की कोई
औलाद नहीं थी। वे ऐसा हरगिज नहीं चाहती थीं कि बिस्तर पर पड़ जाएं और चारो पहर
उनकी देख-भाल की नौबत आ आए। हुआ भी यही। 15 अक्टूबर, 1974 को दिल्ली में हुए
एक जलसे में उन्होंने गाया था। यह बताया जाता है कि बेगम अख्तर अहमदाबाद एक
जलसे में शामिल होने गई थी। वहां क्रिकेटर मंसूर अली खां पटौदी की फरमाइश पर
एक गजल भी गई थी।
इस कहानी का दुखद पहलू यह है कि लखनऊ से फैजाबाद तक उनके नाम पर फख्र करने
वाले तो बहुत हैं, लेकिन ऐसी कोई जगह नहीं है, जहां अख्तरी बाई या बेगम अख्तर
को याद किया जा सके। बरसों तक लखनऊ के ठाकुरगंज थाने के करीब बसंत बाग में
बेगम अख्तर की कब्र पर ताला लगा रहा। बेपनाह शोहरत हासिल करने वाली बेगम अख्तर
की मजार के आस-पास रहने वालों में कुछ लोग ही जानते थे कि इस खाक के नीचे कौन
सोया पड़ा है। खैर, देर से ही सही, उनके चाहने वाले तमाम कोशिशों के बाद ताला
खुलवाने में सफल हुए। शांति हीरानंद ने कहा, “आगरे से पत्थर लाए गए। फिर अम्मी
की मजार 2012 में तैयार हुई। अम्मी के प्रति लोगों के मन में इतनी श्रद्धा है
कि इस काम के लिए किसी ने कोई रुपए नहीं लिए।” अब बेगम अख्तर को उनके जन्मदिवस
पर याद करने का सिलसिला शुरू हो गया है। इस बार शुभा मुद्गल ने उनकी याद में
गजलें गाईं।
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