[दीवान]लो बजट का प्यार #लप्रेक

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Tue Nov 25 01:01:19 CST 2014


तुई तकदीर का सांड है जोगिंदर..ब्याहकर लाया है कमली को और मस्ती कर रहा है
मेरे साथ. एक मेरा बेचारा बिरजू आंख गड़ाकर घड़ी मरम्मत कर रहा होगा, न किसी
से बोलना-न किसी से चालना.

मंगला की दूकान से पोलिथीन में लायी चाय को जोगिंदर दो अलग-अलग प्लास्टिक की
कप में ढारने में इतना रमा था कि माधुरी ने क्या कहा, पूरी बात ठीक से सुन भी
न पाया लेकिन हां मस्ती शब्द इतनी साफ और जोर से सुनाई दी कि चाय की प्याली
उसकी तरह बढ़ाते हुए एकदम से पूछ बैठा- क्या मस्ती, मतलब मैं तेरे साथ मस्ती
कर रहा हूं. क्या बक रही है माधुरी..स्साली, एक तो गेट पर की डूटी छोड़कर,
रिस्क लेकर चाय लाने गया औ उपर से तू मेरे उपर तोहमत लगा रही है.

तुझे कमली कैसे झेलती होगी रे ? बेचारी पर तरस आती है, एक मस्ती शब्द से खौलने
लग गया. तुझे क्या लगता है-मस्ती मतलब सिर्फ ओही होता है, बच्चे पैदा करनेवाला
खेल. इ जो हमदोनों रोज पूसा एग्गिकलचर की मेन गेट पर खुलेआम साथ चाय पीते हैं
न- इसके लिए बड़का-बड़का घर का आदमी-औरत तरस जाता है रे पगला..मस्ती माने
दुख-सुख के बीच अपना मन का कुछ कर लेना. तुही बता इ जो एतना सीसीडी, बोरीस्ता
सब खुला है दिल्ली शहरमा में, वहां सब क्या बच्चा ही पैदा करनेवाला खेल खेलने
जात हैं..हम-तुम जो गेट पर बैठ के चाय-चुक्कड पीते हैं, दुख-सुख बतियाते हैं,
वोही सब तो बड़का लोग भी करते होंगे औ उसके खातिर हजारों रुपिया फूंकते हैं.
उनका पास पैसा है त बैठे के पैसा देते हैं, हमलोग गाड का ड्यूटी खड़े बजाते
हैं त बस दस मिनिट के लिए बैठ लेते हैं, खुल्ला में...बाकी बात तो ओही करते
हैं.

बात तो ठीक है माधुरी लेकिन इ मस्ती शब्द बाकी के सामने मत बोला कर. तू समझती
नहीं है ऐका क्या मतलब निकालेंगे लोग. तुमसे हंस-बोल लेते हैं लेकिन परान तो
कमली पर ही अटका रहता है. एकाध-बार बोले भी कि तू घर का झाड़ू-पोछा का काम
छो़ड़ के गाड का काम काहे नहीं पकड़ लेती है. कुछ नहीं तो साथे-साथ रहेंगे.
ठेकेदारजी से कोर्शिश करके देखेंगे. नय मानती है. कहती है- का गरान्टी है कि
दुन्हू को एक ही जगह डूटी मिले. तुम रहोगे मेन गेट पर और हमको पिछुआनी लगा
दिया तो कौन फैदा. फिर तुम कभी पानी भरे खातिर आवोगे, कभी पर-पेसाब के
बहाने..डूटी से धियान बटेगा. रहने दो..इ काम में कम से कम इ संतोख तो है कि
जेतना समय घर में रहोगे, हमरे लिए रहोगे..गाडवाला काम में तो न तीन में न तेरह
में.

माधुरी, ए माधुरी..कहां गुम होय गयी रे..देख चाय पर छाली जम गई. हम कहेगी- जा
जाके तिकना तोड़ के ला हटाने के लिए..चार साल से यही करा रही है हमरे
से..माधुरी..माधुरी..लगता है तू भी हियां रहके भी अपने घड़ीसाज के पास चली
गयी. यही दिक्कत है हमरे साथ, जब भी तू हमका पर प्यार बरसाती है, हम तुमसे
छिटकके कमली के पास चले जाते हैं औ तू अपने घड़ीसाज के पास. #लप्रेक
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