[दीवान]सिनेमा के साथ सपने

Pankaj K Mishra pankajmishra013 at gmail.com
Tue Oct 14 12:55:41 CDT 2014


सपने देखना कुछ और होने का साथ(यानि कि फ्रायड के अलावा) आदमी की यादों और
चाहतों का एक अव्यय संकलन भी है। और इसीलिए सपने बहुत हद तक सिनेमा का
तत्वमीमांसीय(दिमाग पे न लें) आधार बनाते हैं( हम सब जानते हैं कि ज्ञान से
ज्यादा तत्व जरूरी है औऱ तत्व न मिले तो द्रव्य से काम चल जायेगा, खुद ही देख
लीजिए फिल्म जैसे ही पर्दे पर आती है उसके बारे में हम क्या पढ़ते- सुनते हैं
100 करोड़, नहीं!)। तो इस बात का कि सपनों का सिनेमा से क्या रिश्ता है किसी
से क्या लेना-देना। खैर मुझे भी लगता है कि यह एक बकवास है। और बकवास
करने-सुनने में हमें मजा आता है। वैसे तो हम हिंदी वालो के लिए बकवास ही बेहतर
है। हमारी फिल्में बकवास। हमारे अभिनेता तो खैर..। तो हमारे यहां सिनेमा हमारे
सपनों का प्रतिबिम्ब मात्र है। नहीं? अच्छा। एक फिल्म, हिन्दी फिल्म आयी थी।
जिसमें ग्रेट इंडियन सरकस नाम के एक सरकस का मालिक एक चोर, नहीं, बड़ा चोर
होता है। अब जरा रुकिए ज़नाब। सरकस!! चोर!! क्या बकवास है अब और क्या कहूं।

औसत भारतीय गुस्से में है वह दिन रात फूटबाल खेलने के सपने देखता है(अब यह मत
कहिए कि गुस्से का फूटबाल से कोई रिश्ता नहीं है)। नहीं, सच में। ‘ किक’,
गुन्डे, बैंग-बैंग, कुछ भी देखिए यहां तक कि सिंघम वाले को देखिए। हां! संवाद
भी ऐसे ही। खाप पंचायत वाले राज्य में एक मासूम लड़की(जरा सिनेमा से हट के भी
देखिए) को जो सपना आयेगा, वो तो यही बोलेगी न- थप्पड़ से डर नहीं लगता साब
प्यार से लगता है। हद है।

भारतीयों में उद्दमशीलता को देखिए(सिनेमा की ही बात कर रहां हूं)। किस्मत खराब
चलो किसी को लूट लेते हैं। कोई धंधा-पानी कर लो। हर आदमी यही सपना देख रहा है।
हद है न।

अभी बहुत कुछ है लेकिन ज़रा ठहरिये थोड़े-बहुत सपने(या सिनेमा) देख कर आते हैं
तब।

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