[दीवान]एकबारी बाटा से तो पूछ लेते ?
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Thu Aug 20 09:52:14 CDT 2015
दीवान के साथियों
ये बाटा नहीं बत्रा लिखा है और इस हिसाब से इस पोस्ट का अर्थ पूरी तरह बदल
जाता है.
सॉरी..
2015-08-20 19:49 GMT+05:30 vineet kumar <vineetdu at gmail.com>:
>
> <http://4.bp.blogspot.com/-Lwqxnh93iH4/VdXhhDsbmiI/AAAAAAAARoc/3lnQHLcTtTo/s1600/Screen%2BShot%2B2015-08-20%2Bat%2B12.53.10%2Bam.png>
>
> इरफान हवीब से लेकर विपिन चन्द्रा, रोमिला थामपर की किताबों को कूड़ा बताने
> के लिए भायजी ने बाटा के चप्पल को इन किताबों से उपर रखा है. वो शायद ये कहना
> चाह रहे हों कि इतिहास की ये किताबें इतनी बकवास है कि बाटा के चप्पल इनसे
> कहीं उपर है.
>
> राष्ट्रभक्ति की जिस प्रेरणा के तहत उन्होंने ये सब किया शायद विवेकानंद से
> साथ के प्रसंग से ठीक विपरीत है. छुटपन में पढ़ा था कि जब गीता को सबसे नीचे
> रखकर और बाईबिल और दूसरी धार्मिक पुस्तकों को उपर रखकर अंग्रेजों ने विवेकानंद
> से कहा कि आपके धर्मग्रंथ का यही स्थान है तो विवेकानंद का जवाब था कि दुनिया
> की सारी पुस्तकें इसी गीता पर टिकी हैं इसलिए आपने इसे नीचे रखा है और तब
> अंग्रेज चुप हो गए.
>
> इस आधार पर कहीं भायजी ये तो नहीं कहना चाह रहे कि हमारा आधुनिक, लोकतांत्रिक
> जीवन इन्हीं इतिहासकारों की किताबों पर टिकी है..अगर ऐसा भी है तो भी दोनों ही
> स्थिति में एकबारी बाटा से पूछ लेने की जरुरत है कि वो इतिहासकारों को इतना
> अपमानित या बैलेंस शीट के बजाय इतनी किताबों पर टिकना पसंद करेंगे भी या नहीं
> क्योंकि मामला ब्रांड हिकारत या सीएसआर का है.
>
--
Vineet Kumar
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