[दीवान]एक किताब जिसे आपने बहुत प्यार दिया
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Thu Jul 23 10:05:01 CDT 2015
एक किताब जिसे आप सबने बहुत प्यार दिया
शहर के उदास मंजर के बीच एक खुशखबरी ये भी है कि आपने मीडिया की जिस किताब को
बिना मीडिया-महंतों के अच्छा-अच्छा कहे जाने का इंतजार किए, लोकार्पण और पीआर
राइटिंग से प्रभावित हुए बिना सराहा, लगातार अपनी प्रतिक्रिया दीं और
दोस्ती-यारी में मुफ्त की कॉपी की उम्मीद किए बिना खरीदकर पढ़ना पसंद किया..
जिस किताब की भूमिका इन्डस्ट्री के किसी भी चमकीले चेहरे ने नहीं लिखी और न ही
किसी बड़े मीडिया घराने की रिव्यू पंक्तियों के जरिए मार्केटिंग की गई. ये
किताब अब दिल्ली विश्वविद्यालय के पत्रकारिता पाठ्यक्रम में संदर्भ पुस्तक के
तौर पर शामिल कर लिया गया है. बीए, हिन्दी पत्रकारिता( आनर्स) के नए पाठ्यक्रम
में मीडिया प्रबंधन का अलग से एक पर्चा है, मंडी में मीडिया को इस पर्चे के
प्रति समझ बनाने के लिए संदर्भ पुस्तक के तौर पर रखा गया है.
<http://3.bp.blogspot.com/-KiwcOmvWKGg/VbECaeCr9rI/AAAAAAAARiU/nV1zCMob0Nc/s1600/Screen%2BShot%2B1937-05-01%2Bat%2B8.28.49%2B%25E0%25A4%2585.png>
इस किताब के लिखे जाने से लेकर अब तक के दर्जनों किस्से हैं, यादें हैं,
संदर्भ हैं जिस पर लिखना शुरु करुं तो दर्जनों पन्ने भर जाएं..लेकिन सबकी बात
न भी करुं तो इसे खरीदकर पढ़ने के एक-दो संदर्भ अक्सर याद आते हैं.
गैंग्स ऑफ बासेपुर को लेकर एनडीटीवी इंडिया की पैनल डिस्कशन में अनुराग कश्यप
से मेरी ठीकठाक गहमागहमी बहस हो चुकी थी..अर्चना कॉम्प्लेक्स के बाहर मैंने
कहा भी- सॉरी अनुराग, मैं कुछ ज्यादा ही तंज हो गया..वो खुश थे कि माहौल बन
गया था. कहा- अरे नहीं, बड़ा मजा आया..अच्छा लगा मुझे तो काफी.
वहां से हम अलग-अलग कैब में ओशियान फिल्म फेस्टिबल के लिए सिरी फोर्ट चले आए.
वहां फिर मुलाकात हो गयी. वाणी प्रकाशन की स्टॉल लगी थी जहां अनुराग ये किताब
पलटने लगे. मैंने आकर कहा- प्लीज आप खरीदिए मत, मैं आपको उपहार में देना चाहता
हूं. उनका जवाब था- देखो, मुझे लग रहा है कि किताब अच्छी है, खरीद लेने दो.
अच्छी नहीं लगती मुझे तो फ्री में भी साथ नहीं ले जाता.
एस पी सिंह स्मृति समारोह में मीडिया दिग्गजों से जबरदस्त असहमति होने और ये
सब देखने-सुनने के बाद जब सुप्रिया प्रसाद( मैनेजिंग एडिटर,आजतक) की नजर इस
किताब पर पड़ी तो एकदम से कहा- अरे, तो तुमने किताब भी लिख दिया. चलो इस पर
ऑटोग्राफ दो. मैं एकदम से सकपका गया..नहीं सर, रुकिए न. मैं आपको देता हूं.
पांच सौ की कडक नोट सेल्समैन के आगे बढ़ाया और मुझसे कहा- अरे, मैं वैसे भी
किताबें खरीदकर पढ़ना पसंद करता हूं और फिर ये तो मेरे काम की किताब लग रही
है..पता नहीं, इसमे आपको काफी कुछ वही सब मिलेगा तो मैं बाबा लोग से कह रहा
था. अच्छा, तो तब तो और हो गया है जरूरी खरीदना.
वर्ल्ड बुक फेयर में इरशाद के गानों को लेकर उनसे मेरी बातचीत थी. कार्यक्रम
खत्म होने के बाद वो वाणी प्रकाशन की स्टॉल में घूमने लगे. कविता-शायरी की ढेर
सारी किताबें खरीदीं और इसे भी उठा लिया. मुझे पता था कि उन्होंने ये किताब
अपने काम से कहीं ज्यादा हमारी दोस्ती की वजह से ली है. मैंने अतुल( वाणी
प्रकाशन) से कहा- इसका बिल अलग से बनाना. कविता की किताबों के साथ मत जोड़ना.
पीछे से इरशाद कामिल ने जो हाथ पकड़ा वो पैसे देने के बाद ही मुक्त किया. आपका
काम है ऑटोग्राफ देना, पैसे देने का काम मेरा है.
ये वो प्रसंग है जिन्हें किताब के तीन साल हो जाने के बाद भी कवर देखते ही याद
आने लगते हैं. बिना बहुत ज्यादा प्रशंसा और चौतरफा रिव्यू के मुझे लगता रहा है
कि इसे आपने भरपूर प्यार दिया है..लेकिन अब थोड़ा इसलिए भी ज्यादा अच्छा लग
रहा है कि हमने जिनके लिए ये किताब लिखी, उन तक अब ये और ज्यादा बेहतर तरीके
से जा सकेगी..एक लेखक आखिर चाहता भी तो यही है कि उसकी किताब को इतना प्यार
मिले कि उसे लगे कि लोग उसे भी प्यार करते हैं..तमाम चीजों के साथ-साथ उसका
ऐसा लगना ही दूसरी किताब की पृष्ठभूमि तैयारी करता है.
-------------- next part --------------
An HTML attachment was scrubbed...
URL: <http://mail.mail.sarai.net/pipermail/deewan_mail.sarai.net/attachments/20150723/dfc1b7e2/attachment-0001.html>
More information about the Deewan
mailing list