[दीवान]ओम थानवी के लिए रिटायर्ड शब्द इस्तेमाल करना गुनाह ही समझिएः
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Fri Jul 31 09:08:28 CDT 2015
ओम थानवी के लिए रिटायर्ड शब्द इस्तेमाल करना गुनाह ही समझिएः
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अगस्त की चिपचिपी,सड़ी सी गर्मी की दुपहरी थी..बेचैनी से शरीर तो जैसे
प्लास्टिक की खाली बोतल की तरह हिल-डुल रहा था..तभी मोबाईल की घंटी बजी. झटके
मे फोन उठाते ही उधर से आवाज आई- विनीतजी, मैं जनसत्ता से ओम थानवी बोल रहा
हूं...ओम थानवी, नाम सुनते ही हथेली से नोकिया २६०० फिसलने लगा जैसे घिघिया
रहा हो- किस भारी-भरकम आदमी की कॉल पिक कर लेते हो मेरे पर..खैर,
आपने जनकवि गिरदा को लेकर मोहल्लालाइव पर जो लिखा है, आप उसे और चीजें जोड़कर,
बेहतर करके हमें भेज सकते हैं, जनसत्ता, रविवार में छापूंगा ?
जी सर, जरुर..जैसे-तैसे मैने जवाब दिया और फिर एकदम से दवाब में आ गया. उधर से
जैसे ही उन्होंने ओम थानवी कहा था मुझे लगा शायद वो मेरी उन पोस्टों की याद
दिलाएंगे जिसमे मैंने इस अखबार को लेकर बहुत बुरा-भला लिखा था. लेकिन जब आशंका
से मुक्त हुआ तो लगा- जनसत्ता के लिए मैं लिख पाउंगा ? दरअसल उन दिनों
ब्लॉगिंग में अतिसक्रिय रहने के कारण दुत्कारे जाने की हद तक जेएनयू के
दोस्तों ने जिस तरह की नसीहतें देते हुए कहा था कि तुम पॉपुलर राइटिंग में फंस
गए हो, गंभीर और सार्थक लिख ही नहीं सकते..मेरे भीतर जाने-अनजाने ये बात घर कर
गई थी कि मैं शायद उन पत्रिकाओं, शोध एवं विशेषांकों के लिए कभी लिख नहीं सकता
जिसे कि सालों बाद पोंछ-पोंछकर आलमारी में रखी जाने लायक होती है. अखबार में
सिर्फ जनसत्ता को वो इस लायक मानते थे. एक-दो बार उत्साह में हिन्दुस्तान, अमर
उजाला की कतरनें दिखाई भी तो कहा- इसमे छपने से क्या होता है, कभी जनसत्ता में
छपे तब न. बहरहाल
गिरदा की मौत पर लिखे को दोबारा लिखने में मुझे पूरे दिन लग गए. पहली बार
जनसत्ता में छपने जा रहा था, उसका इतना ज्यादा मेरे उपर दवाब था कि एक ही
वाक्य को कई बार दुरुस्त करता..लेकिन जब आपकी भाषा समझ ही दुरुस्त न हो तो
कितनी सुधार कर लोगे. आखिरकार मैंने कई बार सुधार और कांट-छांट के बाद लेख
थानवीजी को भेज दिया और वो गिरदा की तस्वीर के साथ छप गया. ये मेरा जनसत्ता
में छपा पहला लेख और थानवीजी से पहली बातचीत थी. लोगों ने सराहा..जेएनयू में
एम फिल् कर रहे मेरे छुटपन के दोस्त राहुल ने फोन करके कहा- ये हुई न बात.
मित्र अंजनी ने सराहा. प्रभातजी( Prabhat Ranjan) ने हौसला आफजाही की..फिर
बात आई-गई हो गई.
कोई तीन-चार महीने बाद वो मोहल्लालाइव के कार्यक्रम बहसतलब में मिले और देखते
ही कहा- आप तो एक लेख लिखकर चुप मार गए. आगे भी लिखिए. मैंने दोहराया- मैंने
वो तो बस संस्मरण सा लिख दिया लेकिन मूलतः लिखता तो मीडिया पर ही हूं. उनका
जवाब था- तो मीडिया पर ही लिखिए.
मुझे उम्मीद नहीं थी कि जिस अखबार में पहले से एक से एक दिग्गज मीडिया पर लिख
रहे हों, वहां वो मुझे इतनी सहजता से लिखना ऑफर करेंगे. लिखना शुरु
किया..एक-दो-चार-दस-बीस- तीस...संख्या बढ़ती गई..लेकिन जनसत्ता के लिए लिख रहा
हूं, ये दवाब अभी-अभी तक कम न हुआ. लिहाजा बुधवार को बात होती कि इस विषय पर
लिखना चाहता हूं और शुक्रवार तक दिमागी तौर पर पूरी तरह उस लेख को लेकर इंगेज
रहता. आधी-आधी रात निकल जाती इसके तर्क और तथ्य जुटाने में.
जनसत्ता के लिए लिखने के दौरान मेरी दो बहुत ही खराब आदत रही. एक तो हमेशा
थानवीजी लाख समझाने पर शब्द सीमा से थोड़ा ज्यादा लिख देना और दूसरा कि
बार-बार कुछ जोड़कर कई बार लेख भेजना. एक बार तो ऐसी हद कर दी कि करीब साढ़े
दस बजे रात अखबार की जब पीडीएएफ कॉपी मेरे पास आ गई यानी कि अगले सुबह अखबार
में सबकुछ वैसा ही आता तो मैंने करीब ग्यारह बजे रात थानवीजी को फोन किया.
सॉरी सर, एक चीज गड़बड़ हो गई है. वो कोलकाता के किसी कार्यक्रम से लौटकर
एयरपोर्ट की तरफ जा रहे थे. फोन पर ही पूछा- पैराग्राफ पूछा और वो भी मैं ठीक
से बता नहीं पाया..उन्होंने कहा- बताइए, आप एकदम ऐन वक्त पर ऐसा कहते हैं. अब
क्या कर सकता हूं..आवाज में थोड़ी नाराजगी थी. मुझे अफसोस हो रहा था. मैंने
माफी सहित दो-तीन मैसेज कर दिए.
जनसत्ता के लिए मीडिया पर मैंने जितने भी लेख लिखे, सबमे संबंधित मीडियाकर्मी
और मीडिया संस्थान का नाम लिया. लेख पढ़ने के बाद वो एक बार जरूर पूछते- आपके
पास तथ्य हैं न, जरुरत पड़ने पर आप दिखा सकते हैं न ? ज्यादातर तथ्य अंग्रेजी
अखबारों,किताबों या पत्रिकाओं से होते तो उसे कई बार अनुवाद के बाद भी सावधानी
से देखना पड़ता..लेकिन तथ्य के स्तर पर आश्वस्त हो जाने के बाद वो बिना किसी
नाम या संस्थान का नाम कांट-छांट किए जाने देते. एक-दो बार मामला फंसा भी तो
मैंने बाकायदा ज्वांयटर लिखा.
भाषा के प्रति हम जैसे लापरवाह और व्याकरण के लिहाज से गलत लिखनेवाले
टिप्पणीकार के लिए ओम थानवी का संपादन एक तरह से ऑनलाइन ट्यूटोरियल की तरह
होता. मैं दिनभर लगकर जब लेख भेजने के बाद मोमोज खाने समाचार अपार्टमेंट की
तरफ जाता, उनका फोन आ जाता. फोन पर वो पंक्तियां पढ़कर सुनाते और फिर
पूछते-अच्छा, आप कहना क्या चाहते हैं ? मैं बताता, फिर वो आगे की पैराग्राफ की
तरफ बढ़ते और इस तरह कई बार मैं या तो बिना मोमोज खाए या फिर खरीदकर बाउंड्री
वॉल पर ठंडा होने के लिए रखता और बताते-बताते आगे घर की तरफ बढ़ जाता. रात जब
सूर्यनाथजी उस पन्ने की पीडीएफ कॉपी भेजते और जब दोबारा अपने ही लिखे को
पढ़ता तो अपराध बोध होता. लगता, मैं हिन्दी के नाम पर क्या कूड़ा लिखता हूं और
ये इसके छांट-फटककर कितना बेहतर बना देते हैं. लिखे का मानदेय मुझे उसी वक्त
मिल जाता. फोन पर वो जहां-जहां यहां क्या कहना चाहते हैं पूछते, संपादित लेख
से मिलान करता.
छपे लेख को आप जो पढ़ते रहे हैं, उसे बिना थानवीजी के संपादन का पढ़ते तो मुंह
पर मार देते. एक बेहतरीन, मेहनतकश और बेबाक संपादक एक नए टिप्पणीकार को भाषा
की तमीज और बेखौफ लिखने का साहस देता है, ये मैंने पिछले पांच साल से थानवीजी
के संपादन के जरिए खूब सीखा, सुधारने की कोशिश की..मिला मिले, फोन,एसएमएस और
मेल के जरिए. दब्बू और अखबार को किराना दूकान बना देनेवाला संपादक न केवल
मीडिया को कॉर्पोरेट और राजनीतिक दलों के लिए अनार गोली बनाकर छोड़ देता है
बल्कि कई लेखकों, टिप्पणीकारों को घासलेट बनाता चला जाता है. शायद यही वजह रही
कि जनसत्ता से तीन-चार गुना ज्यादा पैसे देने के बावजूद किसी और अखबार के लिए
लिखने का कभी मन नहीं किया. हम जनसत्ता से मिली रकम को इस तरह देखते कि आधी
रकम हमने ऑनलाइन ट्यूटोरियल की दे दी है.
आज ओम थानवी जनसत्ता से रिटायर हो रहे हैं. अव्वल उनके लिए रिटायर शब्द
इस्तेमाल करने का मन नहीं करता और टेक्नीकली कर भी नहीं सकते. पिछले तीन-चार
सालों से सोशल मीडिया और टेलीविजन चैनलों की परिचर्च्ा में वो जिस दम-खम के
साथ सक्रिय हुए हैं, वो एक मीडिया संस्थान से मुक्त होकर पत्रकारिता की एक नई
दुनिया में और अतिरिक्त समय के साथ सक्रिय होने जा रहे हैं जहां अब उन्हें हम
जैसे हड़बड़िया और लापरवाह टिप्पणीकारों के आड़ी-तिरछी लिखे को दुरुस्त करने
की जरूरत नहीं पड़ेगी..
आज हम उन्हें विदाई की नहीं, सोशल मीडिया के इस अखाड़े में समय की एक्सट्र्ा
पैक लेकर आने का स्वागत करते हैं..बाकी हम लौंड़े-लफाड़े के साथ दोस्ती-यारी
के किस्से फिर कभी..
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