[दीवान]आपका चुत्सपा एक्सक्लूसिव नहीं है सरजी ऑब्लिक मैडमजी

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Sun Mar 1 01:39:47 CST 2015


ये कृश्नचंदर की किताब फ़िल्मी फुलझड़ियां के पन्ने हैं. वही कृश्नचंदर जिनके एक
गधे की आत्मकथा और एक बाइलिन समंदर किनारे उपन्यास को लेकर हम-आप वक़्त-वेवक्त
अभिभूत होते रहे हैं.
इस किताब में चंदर ने हिंदी वर्णमाला के अनुसार फ़िल्मी दुनिया को बड़े ही
दिलचस्प अंदाज़ में परिभाषित किया है. आप एक पन्ने को पढ़कर अंदाजा लगा सकते
हैं. आप तब हैरान भी होंगे कि कृश्नचंदर ने हिन्द पॉकेट बुक्स के लिए ऐसी भी
किताब लिखी है.!

रविकांत सर की लाइब्रेरी में जब भी जाना होता है, ऐसी कुछ न कुछ चीजें ज़रूर निकल
आती है जो हमें चौकाती है. आप विकिपीड़िया पन्ने पर देखेंगे तो इस किताब का
जिक्र नहीं होगा. इस तरह का लेखन मंटो से लेकर हिंदी-उर्दू के कई दूसरे लेखकों
ने किया है और जब आप उनके इस काम से गुजरेंगे तो संभवतः इस नतीजे पर पहुंचे कि

लेखक ने कई बार पाठक,प्रकाशक और जीवकोपार्जन के लिए पॉपुलर लेखन किया और ऐसा
करते हुए वो अपने को हल्का,सतही, उथले कहलाये जाने से बिल्कुल मुक्त रहे लेकिन
आलोचकों-समीक्षकों ने न केवल उनकी गंभीर और क्लासिक छवि बनाने की कड़ी में इन
रचनाओं की चर्चा नहीं की बल्कि उन तमाम पॉपुलर लेखन को ख़ारिज कर दिया जो
साहित्य के भीतर लोकरंजक विधा बनकर उभरे.

ऐसे में जब भी इस अंदाज़ में कोई रचना आती है और लोगबाग समीक्षा के नाम पर पिल
पड़ते हैं, रचना से छिटककर लेखक के प्रति अतिपर्सनल होकर कमेंट करने लग जाते
हैं तो एक तरह से अपने पूर्वज आलोचक-समीक्षक की ही परंपरा और एजेंडे का
निर्वाह कर रहे होते हैं भले ही उन्हें लगे कि उनकी लबड़धो-धो एक्सक्लूसिव है
जबकि खुद लेखक गंभीर और सरोकारी लेखन के दावे से मुक्त लेखन कर रहा होता है.

वैसे तो किसी भी इतिहासकार की लाइब्रेरी से गुजरने पर एक से एक हैरतअंगेज तथ्य
हाथ लगते हैं लेकिन रविकांत सर की लाइब्रेरी की खास बात है कि ये पॉपुलर
संस्कृति की आर्काइव है. यहाँ जब आप इस समझ के साथ जाएंगें कि
मीडिया,सिनेमा,प्रकाशन,साहित्य में ये सब अभी हो रहा है, आपको
1930,50,70,80,90 की ऐसी सामग्री मिल जाएगी कि आप उनसे गुजरकर कहें- ये तो 40
साल पहले का चुत्स्पा है..वो सामग्री पॉपुलर संस्कृति के पक्ष में भी तर्क दे
सकती है, विपक्ष में भी.

बात साफ है, अगर आपको लगता है कि समीक्षक में इतनी ताकत होती है कि लिखकर
महीने-दो महीने में आपकी किताब को आउट ऑफ़ स्टॉक करा देंगे तो पड़े रहिए इस
मुगालते में. 500 प्रति के फार्मूले पर टिकी प्रकाशन की दुनिया में अगर 500
समीक्षक भी आपकी किताब पर लिख दे तो आपकी किताब इस गणित को नहीं लांघ
सकती...नहीं तो गौर कर लीजिए, आपको ऐसे-ऐसे कवि-कथाकार मिलेंगे जिन पर हर खेमे
के समीक्षक ने तारीफ़ में लिखा है लेकिन वो भी इसी 500 के फॉर्मूले के फूफा
बनकर घूम रहे हैं.
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