[दीवान]यायावर दंपत्ति से एक मुलाकात
brajesh kumar jha
jha.brajeshkumar at gmail.com
Fri May 8 04:17:31 CDT 2015
*कला दीर्घा के पार भी एक बड़ी दुनिया है**: **मीनाक्षी-जे.सुशील*
*ब्रजेश कुमार झा*
मीनाक्षी-जे.सुशील की यायावरी व उनकी पेंटिंग के बीच विचित्र रिश्ता है। एक के
बगैर दूसरा पूरा ही नहीं होता। वे रंग और कूची के साथ यायावरी पर निकलते हैं।
वे मानते हैं कि कला दीर्घा के पार भी एक बड़ी दुनिया है, जो पेंटिंग्स की
बारीकियों को समझती है। पढ़ें उनसे हुई बातचीत के खास अंश।
*सवाल- आप दोनों के काम को अलग-अलग नजरिए से देखा-समझा जा रहा है। आपकी ही बात
करुं तो आपने कहा कि **‘**समझ लीजिए कि यह हमारा पागलपन है।**’** आखिर यह
पागलपन क्यों है**?*
जवाब- आप इसे एक किस्म का जुनून कह सकते हैं। वैसे भी इस शब्द की परिभाषा
संदर्भ के अनुसार बदल जाती है। एक संदर्भ तो यही है कि आम आदमी की समझ से जो
चीज परे है, उसके लिए वही पागलपन है। हमारे ऊपर यही बात लागू होती है। मसलन-
जब मैंने लंदन में पीएचडी करने का अवसर छोड़ दिया और कहा कि पेंटिंग करुंगी,
तब लोगों ने कहा कि तुम पागल हो। यहां तक कि मेरे पिताजी ने भी यही बात कही।
दरअसल, हमलोग एक प्रचलित अवधारणा से हटकर कुछ कर रहे हैं, तो लोग उसे अलग
नजरिए से देखते हैं। हमारे लिए इस शब्द का इससे अधिक महत्व नहीं है।
*सवाल- मीनाक्षी आपने आर्ट की पढ़ाई की है। पेंटिंग की दुनिया में आगे बढ़ने
के आपके पास कई सरल रास्ते थे। जबकि जे. सुशील स्थापित पत्रकार हैं। अच्छा
वेतन पाते हैं। आप दोनों बड़े आराम से पर्यटन के शौक को पूरा कर सकते थे। इसके
बावजूद रंगों के साथ ऐसी यायावरी क्यों**?*
जवाब- यह सच है कि हमारे पास आगे बढ़ने के सरल विकल्प थे, लेकिन वह हमारा शौक
नहीं था। आर्ट की पढ़ाई करते हुए मैंने पाया कि चीजों को जटिल और गुंफित बनाकर
प्रस्तुत करना लोगों को खूब भाता था, ताकि वे इस तथ्य को स्थापित कर सकें कि
उनकी कला विशेष है। आम आदमी की समझ से परे कुछेक चुनिंदा लोगों के लिए है।
हालांकि, भारत में कला आम लोगों के बीच से ही निकली है, लेकिन उसी लोक कला और
कलाकार को हीन भावना से देखा जाने लगा है। यहां एक अलग किस्म का वातावरण बनाया
गया है। वह यह कि पेंटिंग्स आर्ट संग्रहालयों में ही रहेंगे। वह बड़े-बड़े
स्टूडियो में ही सजेंगे। आम आदमी इस समझ के साथ इससे दूर रहेगा कि यह तो उसकी
समझ के बाहर की चीज है। सुपर एलीट क्लास के लिए है।
लेकिन हमलोगों ने इस धारणा को तोड़ने की कोशिश की है। हमारा प्रयास है कि आर्ट
को आम लोगों के बीच लेकर जाएं और अपनी पेंटिंग के माध्यम से इसे सरलतम रूप में
रखें।
*सवाल- कई बार ऐसा मालूम होता है कि आप लोग मधुबनी पेंटिंग कर रहे हैं। क्या
यह सही है**?*
जवाब- यह सच नहीं है। हमलोग मधुबनी पेंटिंग नहीं कर रहे हैं। बेशक कहीं-कहीं
आपको उसके कुछेक तत्व दिखाई देंगे, लेकिन बारीकी से देखेंगे तो अनुभव करेंगे
कि यह मधुबनी पेंटिंग से बिल्कुल भिन्न है। शायद यही वजह रही होगी कि मेरे
पहले पेंटिंग शौ में लोगों ने कहा कि आप मधुबनी कला को बिगड़े स्वरूप में पेश
कर रही हैं। खैर, यह उनका विचार था।
*सवाल- फिर यह पेंटिंग का कौन सा रूप और रंग है**?*
जवाब- आप यूं समझ लीजिए कि अपने-आप में यह उनमुक्त है। इसका कोई एक रूप-रंग,
आकार-प्रकार नहीं है। हमलोगों ने अपनी यात्रा के दौरान कुंडापुर में समुद्री
जीवन पर पेंटिंग की। एक जगह बुद्ध बनाया। महाभारत के चित्र भी उकेरने की कोशिश
की। दरअसल, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमलोग उनके घर पेंटिग कर रहे हैं,
वे क्या चाहते हैं और उनकी पसंद क्या है?
हमारी पूरी कोशिश इस बात को लेकर होती है कि पेंटिंग से लोगों को सीधे-सीधे
जोड़ा जाए। हालांकि, हम उन्हें पेंटिंग सिखाना या इसकी शिक्षा देना नहीं
चाहते, बल्कि उनके और पेंटिंग के बीच सेतू का काम करने की कोशिश करते हैं।
हमारा लक्ष्य होता है कि हम जिनके घर जाएं, वहां उनकी इच्छा और भावना को ध्यान
में रखकर ऐसी पेंटिंग करें, जिसमें उनकी हिस्सेदारी अपनी इच्छा से हो। आपको
जानकार आश्चर्य होगा कि हमलोगों ने अब तक जिन घरों में पेंटिंग बनाई है,
उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं थी। लेकिन जब हम पेंटिंग बना रहे होते थे, तो वे
उसमें अपनी कल्पना के रंग भरते जाते थे। राय देते थे। बारीक से बारीक चीजों पर
उनकी नजर टिकती थी। यह देखकर हमारी धारणा पक्की हुई कि आम आदमी को भी कला और
रंग की अच्छी समझ होती है। हमने केवल उनकी झिझक को तोड़ने का काम किया।
*सवाल- क्या यह समझा जाए कि कला-दीर्धा को घर-घर पहुंचाने की कोशिश है**?*
जवाब- आज पेंटिंग की दुनिया में अलग-अलग प्रयोग हो रहे हैं। हमारी कोशिश केवल
इतनी है कि आम आदमी को यह बता समझा सकें कि उसके भीतर भी एक कलाकार छुपा है।
हमारा मानना है कि एक महिला जो स्वादिष्ट भोजन बनाती है, वह बेहतरीन कलाकार
है। उसे रंग, गंध और स्वाद की अच्छी समझ होती है। घर को करीने से रखना भी एक
बड़ी कला है। इस दृष्टि से देखें तो हर घर कला-दीर्धा है। दरअसल, पेंटिंग को
लेकर जो मिथक फैला हुआ है, हम उसे तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
*सवाल- क्या पेंटिंग की ये शैली किसी लोक कला के करीब है**?*
जवाब- हम इसे लोक कला तो नहीं कह सकते। हां, यह जरूर है कि हमलोग एक प्रयोग कर
रहे हैं।
*सवाल- आपने कई लोगों के घर गए, उन्हें पेंटिंग के लिए प्रेरित किया। यह अच्छी
बात है। लेकिन, हर चीज का अपना तौर-तरीका होता है। पेंटिंग में लकीर खींचने या
रंग भरने का महत्व है।* *क्या कोई ऐसा मिला जो इसके व्याकरण को समझता हो**?*
जवाब- हमलोगों ने पेंटिंग्स को सही या गलत के खांचे में डालकर कभी देखा ही
नहीं। यह हमारा उद्देश्य भी नहीं था। इन यात्राओं के दौरान पेंटिंग हमारे लिए
उनके भीतर छुपी रचनात्मकता को बाहर लाने का मध्यम रही और हमलोग यही काम करते
गए।
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