[दीवान]अंतर्राष्ट्रीय बुद्ध पूर्णिमा दिवस समारोह में "प्रधान- सेवक" को सुनते हुए
kamal mishra
kissakhwar at gmail.com
Mon May 18 10:33:18 CDT 2015
धन्यवाद रविकान्त ! पोस्ट लिखने के बाद बद्री नारायण की "फासिनेटिंग
हिन्दुत्व", जो अब अनुवाद के रूप में 'हिंदुत्व का मोहिनी मंत्र ' शीर्षक के
साथ उपलब्ध है, पर नजर पड़ी । अपनी किताब में बद्री नारायण एक महत्वपूर्ण सवाल
उठाते हुए मिलते हैं : "दलित द्वारा बौद्ध और ईसाई धर्म अपनाने का बढ़ता चलन
क्या सचमुच उन्हें उनके परंपरागत बंधनों से मुक्त कर रहा है और उन्हें अधिक
धर्मनिरपेक्ष या यथार्थवादी बना रहा है ?" फिर नारायण इस दिलचस्प तथ्य की ओर
भी पाठकों का ध्यान खींचते हैं कि " बौद्ध धर्म अपनाने वाले दलितों के घरों
में उनके परंपरागत रीति -रिवाजों के साथ अब बौद्ध रीति -रिवाज भी जुड़ गए हैं
और एक नए तरह का धार्मिक पूजा -पाठ विकसित हो रहा है। दलितों के वैवाहिक
निमंत्रण -पत्रों पर बुद्ध और अंबेडकर के चित्रों के साथ गणेश का चित्र भी
दिखाई देता है।" अतः दमितों के राजनीतिकरण में वर्चस्ववादी मेटा -नैरेटिव का
बढ़ता प्रभाव बे -सबब नहीं है।
2015-05-06 15:06 GMT+05:30 Ravikant <ravikant at sarai.net>:
> शुक्रिया, कमल: पुरातत्त्व, इतिहास, वैश्विक और स्थानीय राजनीति की तुरंता
> बौद्धिक कीमियागिरी की ज़बर्दस्त दास्तान. बधाई!
>
> रविकान्त
>
> 2015-05-06 14:28 GMT+05:30 kamal mishra <kissakhwar at gmail.com>:
>
>> दोस्तों, मुझे सोमवार को नई दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में अंतर्राष्ट्रीय
>> बुद्ध पूर्णिमा दिवस समारोह में भागीदारी करने का मौका मिला। वैसे तो पिछले
>> सप्ताह से इसके आयोजन से जुडी खबरे अख़बारों के जरिये पढ़ रहा था। हिन्दी अख़बार
>> बता रहे थे कि उदित राज दलित बौद्धों के इस आयोजन में संलग्न हैं। लेकिन बाद
>> में एक दोस्त के जरिये यह पता चला कि लामा लोब्जांग जो अंतर्राष्ट्रीय
>> बुद्धिस्ट कनफेडरेशन के महासचिव हैं दरअसल वो इसके आयोजन में जुटे हैं। लामा
>> लोब्जांग के परिवार की ही एक सदस्य पद्मा साल्दों से अपनी भी गहरी दोस्ती है।
>> और कार्यक्रम में भागीदारी के लिए जब उन्होंने एक विशेष पास का इंतजाम कर दिया
>> तो हम भी इस सरकारी कार्यक्रम का जायज़ा ले आये। बहरहाल सरकार की तरफ से इस
>> कार्यक्रम के लिए प्रमुख रूप से केंद्रीय पर्यटन राज्य मंत्री महेश शर्मा और
>> बौद्ध गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ही उत्तरदायी थे, इस बात का पता कार्यक्रम
>> में शिरकत के बाद हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को हुए इस
>> कार्यक्रम में मुख्य अतिथि की भूमिका निभायी। यह तीसरा मौक़ा है जब बुद्ध
>> पूर्णिमा पर सरकार ने किसी बड़े कार्यक्रम का आयोजन किया है। इसके पहले
>> जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने 2500वीं बुद्ध जयंती पर बोधगया में बड़े सरकारी
>> कार्यक्रम का आयोजन किया था। और उसके बाद कुशीनगर में 2007 में महात्मा बुद्ध
>> के 2550वें परिनिर्वाण दिवस पर भी सरकार ने एक बड़े कार्यक्रम का आयोजन किया
>> था। एक सामाजिक अध्येता के बतौर जैसे ही मैंने इस आयोजन की (और विशेष कर
>> हमारे "प्रधान -सेवक" के इस आयोजन में भागीदारी की) खबरें सुनी तो मेरी
>> उत्सुकता बेहद बढ़ गयी। अपनी दिलचस्पी मूलतः यह जानने में ही थी कि नरेंद्र
>> मोदी भला किस मुहँ से अपना जुड़ाव बौद्ध परंपरा से बताएंगे! हालाँकि, अहिंसावाद
>> और बौद्ध परंपरा का जो अनिवार्य नाता स्कूली किताबों ने हमें पढ़ाया है, उसकी
>> उलटी मिसाल पडोसी बौद्ध देश श्रीलंका में हुए व्यापक जनसंहार के तौर पर अभी
>> हाल फ़िलहाल ही हम सभी अच्छे से देख चुके हैं। लेकिन ये तो आप सब जानते ही हैं
>> कि, विशेष रूप से आक्रामक हिंदुत्व के पक्ष पोषक संगठनों से जुड़े सिद्धांतकार
>> एक ज़माने से अहिंसावादी बौद्ध विचारों को भारत की गुलामी (जो पूरे हजार साल तक
>> लगातार जारी रही !) के लिए प्रत्यक्षतः जिम्मेवार ठहराते रहे हैं।
>>
>> दोस्तों आप सभी के लिए यह जानना भी शायद दिलचस्प हो कि कार्यक्रम में रामदास
>> अठावले ही एकमात्र ऐसे वक्ता रहे जिन्होंने बौद्ध दर्शन में निहित ''समता''के
>> विचार की तरफ श्रोताओं का कुछ ध्यान आकर्षण किया। और साथ ही अठावले जी प्रधान
>> मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक ज्यादा समतापूर्ण समाज बनाने की दिशा
>> में आगे बढ़ने को ले कर भी पूर्णतः आश्वस्त दिखे। वहीँ उदित राज अपने संक्षिप्त
>> संबोधन में बाबा साहेब अंबेडकर को रस्मी तौर से याद करने के आलावा बौद्ध स्थल
>> केंद्रित पर्यटन के विकास की संभावनाओं से उलझते दिखाई दिए। महेश शर्मा ने
>> प्रधान मंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के प्रतिनिधिओं को
>> दावतनामा भेजने की याद ताजा करने के बाद मोदी जी को भगवान बुद्ध के सन्देश को
>> दुनिया भर में पहुँचाने के लिए सबसे उपयुक्त बताया। किरण रिजिजू ने मुख्य
>> अतिथि के स्वागत क्रम में मोदी जी को बुद्ध प्रतिमा भेंट करने के आलावा एक
>> पुस्तक भी भेंट की। साथ ही बुद्ध पूर्णिमा कैसे गौतम बुद्ध के जीवन से जुडी
>> तीन महत्वपूर्ण घटनाओं- मतलब उनके जन्म, बुद्धत्व प्राप्ति, और परिनिर्वाण से
>> सम्बद्ध है- इसका भी जिक्र किया। रिजिजू ने प्रधान मंत्री के समक्ष यह आशा भी
>> व्यक्त की कि आगे से हर वर्ष बुद्ध पूर्णिमा का उत्सव सामूहिक तौर से सरकार के
>> स्तर पर मनाया जायेगा। इन सभी और दूसरे कई वक्ताओं ने इस मौके पर जो कहा वो तो
>> अपने राम के लिए महत्वपूर्ण था ही लेकिन उससे ज्यादा रोचक था प्रधान सेवक श्री
>> नरेंद्र मोदी जी का वक्तव्य। बहोत विस्तार में न जाते हुए कहूँ तो मोदी जी इस
>> मौके पर भी जम कर बोले। हालाँकि अपने भाषण से बस कुछ ही मिनटों पहले उन्होंने
>> कपिला वात्स्यायन, डॉ. लोकेश चंद्र, प्रोफेसर रमा शंकर त्रिपाठी और प्रोफेसर
>> कृष्ण नाथ को बौद्ध दर्शन, ज्ञान, कला, संस्कृति और विरासत के संरक्षण में
>> उनके जीवन भर के योगदान के लिए सम्मानित किया था। और उपरोक्त पुरस्कृत
>> विद्वानों में से प्रथम तीन के साथ ही साथ कई दूसरे विज्ञ भी इस मजलिस में
>> मौजूद थे। लेकिन एक बार जब मोदी जी ने अपना वक्तव्य देना प्रारम्भ किया तो
>> अपने वाक् कौशल के जादू से उन्होंने उपस्थित श्रोताओं को यह भूलने पर मजबूर ही
>> कर दिया कि बौद्ध परंपरा को समझना और समझाना कैसी गंभीरता या कितने श्रम की
>> मांग करता है।
>>
>> प्रधानमंत्री ने इस मौके पर बुद्ध के देश नेपाल पर आयी भारी आपदा से अपनी
>> बात की शुरुआत की, और अप्रत्यक्ष ही सही लेकिन बुद्ध के भारतीय होने के मिथक
>> को सबसे पहले ध्वस्त करने का काम किया। साथ ही अपनी दूरगामी सोच का परिचय देते
>> हुए श्रोताओं को यह भी याद दिलाना वे नहीं भूले कि इक्कीसवीं सदी को हर कोई अब
>> कैसे एशिया की सदी मान रहा है। भले ही यह बात अभी साफ़ न हो कि यह किस एशियाई
>> देश की सदी है लेकिन बुद्ध के बिना एशिया और दुनिया का भविष्य हो नहीं सकता।
>> क्योंकि दुनिया युद्ध और हिंसा के जिस मौजूदा खतरे का सामना कर रही है उसकी
>> दवा बुद्ध के यहाँ ही है। उन्होंने बुद्ध पूर्णिमा को जहाँ ''त्रिगुण'' कहा।
>> और भगवान बुद्ध को "करुणा का पुंज"। वहीँ बुद्ध की एक सुस्पष्ट व्याख्या भी
>> मोदी के वक्तव्य में उभर कर आ रही थी। जिसके अनुसार बुद्ध कोई साधारण मानव
>> नहीं थे, और वे जन्म से ही बुद्धत्व के मौलिक गुण यानी ''करुणा " से संपन्न थे
>> : तभी तो देवदत्त जब हंस का शिकार करता है, सिद्धार्थ पीड़ा से भर कर उस हंस का
>> जीवन बचाने के उधोग में लग जाते हैं। एक राज परिवार के सदस्य से भला कौन ऐसी
>> अपार करुणा की उम्मीद कर सकता है, जहाँ शिकार आदि सामान्य जीवन के अंग हों ?
>> इसके बाद बुद्ध दुनिया के दुःख से दुखी और सारा ऐश्वर्य और सम्पदा छोड़ कर दुःख
>> की निवृत्ति के उपाय तलाशने के लिए निकल पड़ते हैं। इसके साथ ही मोदी जी अपने
>> जो नोट्स लाये थे उससे थोड़ा सा सहारा लेते हुए उन्होंने अष्टांगिक मार्ग के
>> आठों घटकों को भी दो बार (अंग्रेजी और हिंदी में अलग-अलग !) श्रोताओं के समक्ष
>> बयान किया। और यह भी बताया की अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने का उनका स्वयं
>> का प्रस्ताव, जिस पर संयुक्त राष्ट्र ने भी अब अपनी सहमति दे दी है, दरअसल
>> बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग में निहित सम्यक समाधी की ओर जाने वाला एक कदम ही
>> है। दोस्तों, हमारे प्रधान सेवक जी को सुनते हुए मैं बस यही सोच रहा था कि
>> गौतम के पहले भी तो कई बुद्ध हुए हैं जैसा कि बौद्ध परंपरा स्वयं ही मानती आई
>> है। फिर तीर्थंकर महावीर को अगर अधिक नहीं तो बुद्ध जितना ही घोर त्याग करने
>> और वैदिक धर्म में निहित हिंसा की सामाजिक आलोचना प्रस्तुत करने की जरुरत किन
>> सन्दर्भों में पेश आयी? लेकिन ऐसे किसी सवाल से उलझने के बजाय आइये हम
>> यहाँ मोदी जी के 'विमर्श' का निर्बाध परायण जारी रखते हैं!
>>
>> आगे, मोदी जी ने बुद्ध भगवान के जीवन से जुड़े एक और विशिष्ट पक्ष पर
>> श्रोताओं का ध्यान आकर्षण किया। उन्होंने अपने खास अंदाज में श्रोताओं को
>> उकसाते हुए उनसे यह सवाल पूछा कि भला बुद्ध के अलावा दुनिया का ऐसा कौन दूसरा
>> महामानव है जिसे अपने जीवन काल में ही इतनी प्रसिद्धि प्राप्त हुई? यकीन
>> मानिये इस उकसावे के जवाब में हजरत मोहम्मद का नाम मेरे मुहँ से बस
>> निकलते-निकलते रहा। बहरहाल, वह किताब जो अभी कुछ देर पहले ही मोदी जी को भेंट
>> की गयी थी, और जिसमें बुद्ध वचनों का संकलन एक साथ तीन अलग-अलग भाषाओँ में
>> किया गया था, से त्वरित उद्धरण लेते हुए मोदी जी ने मौजूदा दौर में बुद्ध के
>> "ज्ञान- मार्ग" की प्रासंगिकता पर उठने वाले तमाम सवालों का सहज ही समाहार
>> करने का प्रयास भी उपस्थित श्रोताओं के समक्ष किया। एक उद्धरण में जहाँ बुद्ध
>> श्रमिकों को उनका वाजिब मेहनताना न देने वालों के लिए परलोक तो दूर इस लोक में
>> भी सुख की संभावना से इंकार करते हुए दिखाई दिए, तो मोदी जी ने अपने 'विमर्श'
>> में इसे तुरंत एक मई और श्रम -दिवस मनाने वालों के लिए पढ़ने योग्य बताया। साथ
>> ही दूसरे उद्धरण में, जहाँ बुद्ध ने महिलाओं के लिए मुक्ति हेतु पुरुष रूप में
>> पुनर्जन्म की आवश्यक्ता बताई थी, मोदी जी ने यह कहते हुए इसका एक पाठ प्रस्तुत
>> किया कि बुद्ध अपने काल विशेष में यह संवाद कर रहे थे!
>>
>> वैसे बुद्ध के जीवन और दर्शन का एक विशिष्ट पाठ प्रस्तुत करने के आलावा मोदी
>> जी ने अपने सम्बोधन के दौरान यह भी बताया कि वो बुद्ध के कितने पुराने और
>> गंभीर प्रशंसक रहे हैं। और यह एक ऐसा तथ्य है जिसका (बकौल मोदी) उनके विरोधिओं
>> को आभास तक नहीं है, वर्ना अब तक तो उनकी "चमड़ी उधेड़ दी जाती"। मोदी जी ने भरी
>> सभा में यह सत्य भी उद्घाटित किया कि गांधीनगर के मुख्यमंत्री आवास के अहाते
>> में प्रवेश करते ही जो बुद्ध प्रतिमा दिखाई देती है उसे उन्होंने ही वहां
>> स्थापित किया है। इसके अतिरिक्त जिस गाँव में उनका जन्म हुआ उसके बारे में यह
>> मान्यता चली आयी थी कि ह्वेनसांग वहां टिका था, क्योंकि अपने जीवन काल में इस
>> पश्चिमी भू-भाग में बुद्ध स्वयं पधारे थे। खैर, जैसे ही मोदी जी गुजरात के
>> मुख्यमंत्री बने उन्होंने पुरातत्व विभाग को इस गांव की खुदाई के काम के
>> निर्देश दे दिए। और खुदाई में जो कुछ सामने आया उसके नतीजे चौकाने वाले थे।
>> मोदी जी का गांव किसी ज़माने में बौद्ध विद्यार्थिओं के छात्रावास की भूमि थी
>> और यहाँ हुयी खुदाई में एक सोने की डिबिया में रखे बुद्ध के अवशेष भी प्राप्त
>> हुए! बाद में, मोदी जी ने न सिर्फ बौद्ध विद्वानों के एक सम्मलेन का आयोजन
>> करवा कर उन सभी को अपने गांव के उस महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल का भ्रमण
>> करवाया। बल्कि उनकी मंशा अभी वहां बुद्ध का एक बड़ा ''मंदिर'' बनाने की भी है,
>> जहाँ उक्त सोने की डिबिया से प्राप्त पार्थिव अवशेष (जो फ़िलहाल बड़ौदा के एम एस
>> विश्वविद्यालय में संरक्षित है) को स्थापित किया जायेगा। हालाँकि मोदी जी का
>> अपना वक्तव्य इस मौजूं सवाल पर खामोश ही रहा कि आखिर बौद्ध छात्रों का वो
>> छात्रावास और बुद्ध देव का वो ऐतिहासिक स्तूप जिसमें सोने की डिबिया में उनके
>> पार्थिव अवशेष संरक्षित किये गए थे कब और कैसे जमींदोज़ हुआ? क्या यह
>> ब्राह्मणवाद के धक्के से भूमि में समाया या किसी और ही हमले के नतीजे
>> में? वैसे मोदी जी ने यह जरूर बताया कि प्रधान सेवक चुने जाने के पहले और बाद
>> में भी कैसे जापान, चीन, श्रीलंका, आदि देशों की निरंतर यात्रा के दौरान इन
>> देशों ने उनके औपचारिक कार्यक्रम के तहत उन्हें बौद्ध पूजा स्थलों को करीब से
>> देखने का अवसर बनाया। साथ ही अपने वक्तव्य के समापन पर श्री मोदी ने बुद्ध
>> पूर्णिमा के पावन अवसर पर बुद्ध के चरणों में बैठने और उनसे जुडी कुछ बातें
>> कहने का अवसर प्रदान करने के लिए सभी आयोजकों का धन्यवाद ज्ञापन किया। जिसके
>> बाद लामा लोबजांग जी ने औपचारिक रूप से सभी का धन्यवाद कहते हुए, प्रधान
>> मंत्री को विशेष रूप से एक बौद्ध मंत्री किरण रिजिजू को अपने मंत्री-मंडल में
>> जगह देने के लिए धन्यवाद दिया।
>>
>> दोस्तों, बुद्ध पूर्णिमा पर आयोजित इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम के पहले और बाद
>> की छपी कुछ मीडिया रपटों को देखते हुए मैं यह पोस्ट करने को मजबूर हुआ। मिसाल
>> के लिए ए. बी. पी. न्यूज को यह कार्यक्रम इसलिए भी अहम लग रहा था क्योंकि उनके
>> सूत्रों के मुताबिक "इस कार्यक्रम में पीएम मोदी महात्मा बुद्ध के मानवता के
>> दिए संदेशों का जिक्र करते हुए अपनी सरकार पर लगने वाले उन आरोपों का करारा
>> जवाब देंगे जिसमें यह कहा जा रहा है की मोदी सरकार के बनने के बाद देश में
>> धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमला बढ़ा है।" और, ए. बी. पी. न्यूज सूत्रों के
>> मुताबिक "प्रधानमंत्री मोदी एक अमेरिकी संस्था की रिपोर्ट में लगाए गए सभी
>> आरोपों का जवाब दे सकते हैं।" मोदी ने इस अवसर पर न तो अमेरिकी रिपोर्ट पर
>> टिप्पणी की और न अपने सरकार के अल्पसंख्यक विरोधी होने के आरोपों से ही वे
>> उलझते दिखे। हालाँकि, यह तथ्य भी ग़ौरतलब है कि सांप्रदायिक कोलाहल के समक्ष
>> प्रधानमंत्री की अपनी लाचारी और चुनाव से एक साल बाद सरकार के कामकाज की
>> अच्छी खबर भाजपा के ही अरुण शौरी ने इसी दौरान ली है। लेकिन नरेंद्र मोदी को
>> संघी साम्प्रदायिकता का एक औजार भर मानने वालों को मैं बस यही कहना चाहूंगा कि
>> उन्हें एक स्वतंत्रचेता व्यक्ति के तौर पर मोदी के बारे में थोड़ा सा
>> पुनर्विचार अवश्य कर लेना चाहिए। अंत में, अपनी दोस्त पद्मा साल्दों की साक्षी
>> से यह भी बताता चलूँ कि लद्दाखी बौद्ध समाज में ब्राह्मणवादी अस्पृश्यता की
>> जड़ें इतनी मजबूत हैं की घर पर आने वाली कुछ ख़ास जाति के मेहमानों को आज भी अलग
>> बर्तन में ही चाय पिलाने का रिवाज़ जारी है!
>>
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