[दीवान]कहाँ ले जा रही है असहिष्णुता??
kamal mishra
kissakhwar at gmail.com
Tue Nov 3 14:56:26 CST 2015
जरा सोचें, सहिष्णुता/असहिष्णुता के मुद्दे का राष्ट्रीय स्तर पर जारी बहस के
केंद्र में आना विडंबना नहीं तो और क्या है ? अगर हमारे दौर की सर्वप्रमुख
राजनैतिक बहस आज इस बिंदु पर केंद्रित होती दिख रही है कि, 'भारतीय समाज में
असहिष्णुता बढ़ रही है या नहीं' तो इसके लिए वास्तव में कौन जिम्मेवार है? आपकी
निगाह में मौजूदा हालात के लिए अंततः कौन जवाबदेह है? और सहिष्णुता के गिरते
ग्राफ पर लगाम लगाना आखिर किसकी जिम्मेवारी है? संक्षेप में, अगर आप फिल्म
अभिनेता शाहरूख खान, संगीतकार अमजद अली खान, और किरण मजूमदार शा,
या नारायणमूर्ति के ताजा बयानों की रौशनी में भी मौजूदा हालात का जायजा लेने
की कोशिश करें तो उपरोक्त सवालों से बच निकलना संभव नहीं लगता।
वैसे अभी दो दिन पहले अरुण जेटली साहब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश में
असहिष्णुता से सबसे ज्यादा पीडित व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास
करते नजर आ रहे थे ! मैं ईमानदारी से इस बात को स्वीकार करता हूँ कि
वित्तमंत्री जब प्रधानमंत्री को असहिष्णुता के सबसे बडे शिकार के रूप
में प्रस्तुत कर रहे थे तो मुझे उनकी तरफ से आया यह वक्तव्य पूर्णतः गंभीर और
विचार योग्य प्रतीत हुआ। जिसके बाद मैंने पूरी संवेदना के साथ इस प्रश्न पर
सोचना शुरू किया कि क्या वाक़ई नरेंद्र मोदी देश में असहिष्णुता के सबसे बड़े
शिकार हैं ? और अगर यह सच है तो इसके लिए मूलतः कौन जिम्मेवार है ?
इस प्रश्न पर एकाधिक कोणों से गहन चिंतन मनन के उपरांत मैं इस निष्कर्ष पर
पहुंचा कि संभव है की नरेंद्र मोदी कुछ हद तक असहिष्णुता के शिकार हों। लेकिन
यह कहना कि मोदी इस देश में असहिष्णुता के सबसे बड़े शिकार हैं असल में सत्य पर
पर्दा डालने जैसी बात है। निश्चित रूप से मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए गुजरात
में जिस बड़े पैमाने पर बेगुनाहों का कत्लेआम हुआ आज भी लोग उसे भूले नहीं हैं।
हो सकता है कि कुछ लोग गुजरात दंगों से उचित तरीके से न निबटने के लिए अभी भी
मोदी को कसूरवार ठहराएं। और तब यह भी असंभव नहीं कि बहुत से लोग मोदी के प्रति
चाह कर भी सहिष्णुता का भाव न रखते हों। लेकिन इस देश ने पिछले आम चुनावों में
मोदी और उनके नारे 'सबका साथ, सबका विकास' पर भरोसा करते हुए जैसा
प्रचंड बहुमत उनके नेतृत्व वाली भाजपा को प्रदान किया उसके बाद भी उन्हें
असहिष्णुता का सबसे बड़ा शिकार बताना न सिर्फ करोङो समर्थकों का अपमान है बल्कि
बेहद दुर्भाग्यपूर्ण भी। हाँ, इतना जरूर है कि, 'बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ
से होय (?)' अब अपने अपने कर्मों के फल का भोग तो राजा और रंक सभी को करना
पड़ता है और शायद बुजुर्ग भी ऐसा ही कह गए हैं। इस लिए अगर नरेंद्र मोदी ने
अतीत में असहिष्णुता के बीज बोये हैं तो जाहिर है कि फसल भी वही काटेंगें!
हालाँकि जब वित्त मंत्री अरुण जेटली से अरुण शौरी, शत्रुघ्न सिन्हा और शाहरुख़
खान के बयानों पर उनकी प्रतिक्रिया मांगीं गयी तो उन्होंने बड़े ही भोलेपन से
उलट कर सवाल कर डाला कि "असहिष्णुता कहाँ है ?" जाहिर है कि वित्त मंत्री को
उस तौर से असहिष्णुता कहीं नजर नहीं आ रही।
लेकिन हम जब शाहरुख खान के बयान पर आयी कुछ प्रमुख प्रतिक्रियाओं पर गौर करना
शुरू करते हैं तो तस्वीर का रुख अपने आप साफ होता चला जाता है। दरअसल शाहरुख
ने अपने 50 वें जन्मदिन के मौके पर एनडीटीवी की एक चर्चा के दौरान देश में
असहिष्णुता बढ़ने की बात कही थी। उन्होंने तब यह भी कहा कि यह बेहद अपमानजनक और
शर्मनाक है कि मुझे मेरी राष्ट्रभक्ति साबित करनी पड़ती है। शाहरुख़ के ऐसे बयान
पर प्रतिक्रिया जताते हुए एक तरफ विश्व हिन्दू परिषद से सम्बद्ध साध्वी प्राची
ने जहाँ उन्हें पाकिस्तानी एजेंट करार देते हुए पाकिस्तान चले जाने का
सुझाव दिया। वहीँ दूसरी ओर भाजपा नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मंत्री कैलाश
विजयवर्गीय ने कहा कि "शाहरुख़ रहते तो भारत में हैं लेकिन उनका मन सदा
पाकिस्तान में रहता है।..... यह देश द्रोह नहीं तो क्या ?"
अब आप खुद देखें कि विजयवर्गीय और साध्वी प्राची ने मिल कर न सिर्फ शाहरुख़ को
पाकिस्तान का एजेंट बना डाला बल्कि उनके कथित देशद्रोह के लिए उन्हें
पाकिस्तान चले जाने की सलाह भी दे डाली है। यह क्या सिर्फ इस लिए कि शाहरुख
एक मुसलमान अभिनेता हैं? वर्ना बढ़ती असहिष्णुता पर चिंता जताने वाले वो कोई
पहले व्यक्ति तो नहीं थे ? जुबिन मेहता से लेकर लार्ड स्वराज पॉल तक इस मुद्दे
पर मुखर हैं। और सबसे बढ़ कर तो हमारे राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने अब तक कुल
तीन दफे इस महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाया है। तब क्या यह मान लें कि समाज में
बढ़ती असहिष्णुता केवल मुसलमानों के खिलाफ है। और जैसा नारायणमूर्ति जैसे एक
उद्यमी ने भी महसूस किया कि इसी के चलते अल्पसंख्यक समुदाय में भय व्याप्त है
? मेरा अपना ख्याल है कि ऐसा करके हुए हम असहिष्णुता और इसके व्यापक प्रभावों
को लेकर किसी वास्तविक बोध तक नहीं पहुंचेंगे। वैसे भाजपा नेता कैलाश
विजयवर्गीय की मानें तो 'आज सारी दुनिया भारत और उसके नेतृत्व का मान कर रही
है, ऐसे में यहाँ असहिष्णुता बढ़ने की बात करना, दुनिया के समक्ष भारत को कमजोर
करना होगा।' और अब जब कि "भारत संयुक्त -राष्ट्र का स्थाई सदस्य बनने को है,
पाक समेत सभी भारत विरोधी ताकतें इसके खिलाफ षडयंत्र रच रही हैं।'
मैं समझता हूँ कि अव्वल तो इस तरह का कोई अंतर्राष्ट्रीय षडयंत्र नहीं है। और
अगर ऐसा कुछ है तो हमारे राष्ट्रपति महोदय क्यों हर तीसरे दिन असहिष्णुता बढ़ने
की चेतावनी जारी कर रहे हैं। क्या वित्त मंत्री सहित भाजपा नेतृत्व को अब
भी यह दिखाई नहीं पड़ रहा कि समाज में बढ़ती असहिष्णुता के परिणाम स्वरुप कैसे
उसी की पार्टी के एक जिम्मेवार नेता मुख्यमंत्री तक का गला काट लेने जैसे
निंदनीय बयान देने से भी बाज नहीं आ रहे हैं।असहिष्णुता की हद तो ये है कि जे
एन यू जैसे एक प्रतिष्ठित शिक्षा केंद्र को, जिसके छात्र संघ में आर एस एस/
भाजपा समर्थित अखिल विद्यार्थी परिषद का भी एक निर्वाचित छात्र प्रतिनिधि
मौजूद है, एक साजिश के तहत राष्ट्रद्रोह का केंद्र बताया जा रहा है। जे एन यू
के विरुद्ध ऐसा दुष्प्रचार कोई विदेशी ताकत नहीं बल्कि आर एस एस का अपना
मुखपत्र पांचजन्य ही कर रहा है। क्या इस तरह के व्यवस्थित दुष्प्रचार का एक
भावी परिणाम असहिष्णुता के रूप में नहीं आएगा ? इस दुष्प्रचार से जनित
असहिष्णुता का शिकार आखिर कौन होने वाला है ? जरा विचार करें कि देेश के एक
सर्वप्रमुख बौद्धिक केंद्र के खिलाफ एक प्रत्यक्ष असहिष्णु साजिश के पीछे संघ
परिवार के कौन से हित हैं ? क्या आप अब भी यह नहीं मानते कि असहिष्णुता की
दुधारी तलवार के जरिये ही संघ परिवार विरोध के स्वरों को खामोश करने के
अलावा अपनी वैचारिकी के उथलेपन को ढंकने का काम भी बखूबी कर रहा
है।
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