[दीवान]Fwd: चिंता तीन मूर्ति की: एक बयान
Ravikant
ravikant at sarai.net
Sun Oct 11 08:02:57 CDT 2015
दोस्तो,
ये बयान पिछले दिनों के अंग्रेज़ी अख़बारों में शायदआपकी नज़र से गुज़रा होगा।
मसलन:
http://www.hindustantimes.com/india/scholars-academics-question-govt-s-efforts-to-shift-focus-of-nmml/story-gk7hs4Mm1bqGQKAyOYG8BM.html
अगर आप बयान से सहमत हैं तो इसे अपने मंच पर जगह दें, आगे बढ़ाएँ
रविकान्त
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चिंता नेहरू स्मारक संग्रहालय व पुस्तकालय (NMML, तीन मूर्ति) की : एक बयान
हम विश्वविद्यालयों के शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी और ऐसे अकादमिक जिन्होंने
तीन मूर्ति पुस्तकालय का इस्तेमाल किया है, इसके निवर्तमान निदेशक डॉ. महेश
रंगराजन द्वारा संस्था में पिछले चार सालों में किए गए बेहतरीन काम की तहेदिल
से सराहना करते हैं। डॉ. रंगराजन को संस्था-सेवियों की अग्रिम पंक्ति में रखा
जाएगा। यह एक ऐसी समर्पित प्रजाति है जो अकादमिक परिसरों में शोध के नानाविध
दृष्टिकोण को फलने-फूलने, उनमें आपसी संवाद का मौक़ा देती है, मौजूदा संस्थान
के संसाधनों का विस्तार करती है और अनुशासनिक दायरों को पुनर्परिभाषित करने के
लिए कटिबद्ध रहती है। डॉ. रंगराजन हमेशा हर किसी के लिए मौजूद रहे; उनको परिसर
के पेड़ों, चिड़ियों, इमारतों और उसकी स्वच्छता उतनी ही प्यारी थी जितनी
किताबें, गोष्ठियाँ, प्रस्तुतियाँ या उच्च कोटि की अकादमिक बातचीत। उनकी
निहायत सहज, अनुशासित, सक्रिय और आत्म-विमुख मौजूदगी के चलते तीन मूर्ति भवन व
पुस्तकालय एक बार फिर जी उठे थे - विश्वविद्यालय के युवा शोधार्थियों से इसका
रिश्ता जुड़ गया था और संस्था ने अपने दरवाज़े व्यापक जनसमुदाय के लिए खोल दिए
थे।
सबसे पहले एक ग़लतफ़हमी जो आम हो गई है, उसको सुधार लेना चाहिए। ये मान लेना
कि किसी व्यक्ति-विशेष – जवाहर लाल नेहरू - के नाम से जुड़ी संस्था और उसकी
तमाम गतिविधियाँ सिर्फ़ उनकी ही विरासत को सहेजेगी, सही नहीं है। नेहरू स्मारक
व पुस्तकालय में रखे दस्तावेज़, चिट्ठी-पत्री और ऐतिहासिक हस्तियों से बातचीत
के ध्वन्यांकित संग्रह सार्वजनिक जीवन की इंद्रधनुषी झाँकी पेश करते हैं। गत
चार सालों में संग्रह के काम में तेज़ी आई और इतिहासकार दामोदर धर्मानंद
कोसाम्बी, विदुषी अमृता रंगास्वामी, हिंदी के पत्रकार-चिंतक वेदप्रताप
वैदिक, हिंदी
के उपन्यासकार-नाटककार उपेन्द्रनाथ 'अश्क', वैज्ञानिक यशपाल और डॉ. एस. वरदराजन,
प्रकृति-विशेषज्ञ एम कृष्णन, कूटनीतिग्य मसलन रिखी जयपाल, राशिद अली बे, और
सुबीमल दत्त, उद्योगपति जैसे राहुल बजाज, और अर्थशास्त्री-प्राध्यापक एस गुहान
और अरुण बोस, भाषा-साहित्य के विद्वान व कार्यकर्ता गणेश देवी, हरद्वारी लाल
जैसे राजनेता और एस. आर. राव जैसे समुद्री पुरातत्त्ववेत्ता के महत्वपूर्ण
दस्तावेज़ जु्टाए और सहेजे गए।
पिछले चार सालों में तीन मूर्ति के कर्मचारियों ने अथक मेहनत करते हुए
व्याख्यान-मालाओं की शृंखला को क्या ख़ूब सक्रिय रखा। संस्थान सेमिनार और
गोष्ठियों से रज-गज रहा। 'समाज, इतिहास और साहित्य' के नाम से हिंदी में एक
अलग जीवंत शृंखला चली; युवा शोधार्थियों ने 'उत्तर-पूर्व के इतिहास पर नए
दृष्टिकोण' और 'सामाजिक न्याय की पड़ताल' विषयों पर अपने नये रिसर्च पर्चे पढ़े;
'इतिहास में नगर' शृंखला ने जनतांत्रिक बदलाव में शहरों की महती भूमिका को
रेखांकित करने की चेष्टा की। 'विज्ञान और विरासत' शृंखला तथा 'नया भारत और
पहला आयआयटी' वाली अब तक जारी प्रदर्शनी का उद्देश्य विज्ञान और समाज विज्ञान
को क़रीब लाने का रहा है। पर्यावरण में महेश रंगराजन की निजी दिलचस्पी के चलते
ऐतिहासिक और समसामयिक सरोकारों पर जमकर काम हुआ। आख़िर में, पुस्तकालय भी
अद्यतन किया जा चुका है, नए शोध-पत्र जोड़े गए हैं, और हिंदी सहित भारतीय
भाषाओं की किताबों की लगातार ख़रीद हुई है।
हमें मालूम है कि सांस्कृतिक व राजनीतिक संस्थानों की स्वायत्तता को नियंत्रित
और नियमित करके एक जड़ परंपरा की जगह दूसरी को आरोपित करने की कोशिश किसी भी
सत्ता-केंद्र से आ सकती है। किसी भी स्वतंत्र-चेता अकादमी को अपने पेशेवर
नियमों पर खरे उतरने का गौरव हासिल होना चाहिए। साथ ही, अकादमिक जगत पर दीगर
जगहों पर लिखे और इस्तेमाल में लाए जा रहे नवाचारी इतिहास से मुखामुखम होने का
दबाव भी होता है। ये ऐसे इतिहास हैं, जिनमें अल्पसंख्यक, निम्न जाति के समूह, '
जनजातीय', हाशिए और सीमांत के समुदाय अपनी आवाज़ सुनते हैं, अपना तजुर्बा
बाँटते हैं। फिर, ऐसे इतिहास भी हैं, जो सांस्थानिक सत्ता और सामाजिक तर-तमता
से ताक़त पाकर बहुमतवादी विजेता-भाव की कथा हमारी शैक्षणिक और सांस्कृतिक
संस्थाओं में आरोपित करना चाहते हैं। यह कथा विविधता और विरोध नापसंद
करती है, सार्वजनिक
मंचों पर नागरिकों की नुमाइंदगी के संवैधानिक अधिकारों का निषेध करती है, चाहे
नागरिक जिस वर्ग, जाति, समुदाय या राजनीतिक सरोकार से जुड़े हों।
हम ये बात शिद्दत से महसूस करते हैं कि नेहरू स्मारक संग्रहालय व पुस्तकालय को
पंगु बनाने की ऐसी किसी भी कोशिश से बचाया जाना चाहिए, ख़ासकर ऐसे वक़्त में
जब यह संस्था पेशेवर अकादमिक जीवन का समाज और इतिहस विषयक व्यापक विमर्श से
तालमेल बिठाने की कोशिश कर रही है। राजनेताओं की एक पाँत की जगह पर दूसरी पाँत
को बिठा देने-भर से निम्न जातियों, जनजातियों, महिलाओं, युवाओं और बेचैन शहरी
आबादी, अल्पसंख्यक या सीमांत पर के लोग पाठ्यक्रम, संग्रहालय, सार्वजनिक
अभिलेखागारों, नुमाइशों, सिनेमा या टेलिविज़न के कार्यक्रमों में नुमाइंदगी
हासिल नहीं कर लेंगे।
हम तमाम नागरिकों से अनुरोध करते हैं कि वे एनएमएमएल जैसे स्वायत्त सांस्कृतिक
व अकादमिक संस्थानों के कार्यकारी निकायों से जगह की स्वायत्तता को क़ायम रखने
की गुहार लगाएँ, ताकि लोकतांत्रिक बातचीत, वैचारिक विनिमय, बहस, विरोध, और
अल्पसंख्यक मत को व्यक्त करने की जगहें आबाद रहें। यह भी कि जिन्हें इन पदों
पर आसीन किया जा रहा है, वे अपनी-अपनी जगह पर अपनी स्वतंत्र स्थिति और स्वच्छ
आचरण बनाए रखें, और उन्हें रचनात्मक ढंग से काम करने का अवसर दिया जाए ताकि वे
अपने कर्तव्य का निर्वहन बौद्धिक ईमानदारी व गरिमा के साथ कर सकें।
*(**ख़्याल रहे**: **इस बयान में व्यक्त विचार अधोहस्ताक्षरियों (अब तक
तक़रीबन ३५०) के हैं**, **न कि उनकी संस्थाओं के।*
*) *
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