[दीवान]हिन्दी पर होती रही राजनीति के प्रतिरोध में एक जरुरी किताब
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Mon Sep 14 01:43:24 CDT 2015
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आज गांधीजी हिन्दी के भाग्य का निर्णय नहीं कर सकते. आज कांग्रेस नहीं कह सकती
कि इस लिपि में लिखो और ऐसी भाषा में बोलो. झूठी एकता के नाम पर देश की
प्राचीन भाषा और संस्कृति को, जिसे हमने हजारों वर्ष से सुरक्षित रक्खा है, हम
छोड़ नहीं सकते.
..आशा है इसमे उन राजनीतिक नेताओं को को भी विचार करने को भी विचार करने की
सामग्री मिलेगी जिनका "हिन्दुस्तानी" -प्रेम राजनीति पर निर्भर है.- रविशंकर
शुक्ल
( आज से साठ साल से भी ज्यादा साल पहले लिखी इस किताब में रविशंकर शुक्ल ने
जिस भावनात्मक अंदाज में हिन्दी की सुरक्षा के प्रति चिंता जाहिर की है और
भाषाई शुद्धता को लेकर जो सवाल उठाए हैं, बहुत संभव है कि उससे अभी और उस वक्त
भी लोगों को असहमति रही होगी..लेकिन ये भी है कि हिन्दी को लेकर अखाड़ेबाजी और
राजनीति दलों के बीच तुष्टीकरण की नीति शुरु से ही रही है. इसे हम आकाशवाणी के
कार्यक्रमों और उसकी भाषा को लेकर समय-समय पर समझते आए हैं. शुक्लजी की इस
किताब की खास बात है कि हम तर्क के स्तर पर असहमत होते हुए भी तथ्य को लेकर ये
बेहतर समझ पाते हैं कि आज प्रधानमंत्री सहित उनकी बीजेपी की सरकार ने विश्व
हिन्दी सम्मेलन के बहाने जो कुछ भी भोपाल में किया, कांग्रेस इसे सालों से
हिन्दी दिवस के रीति-रिवाज के तौर पर करती आयी है.
रविकांत सर के कमरे में अक्सर ऐसी किताबें मिल जाया करती हैं जो हमें सामयिक
घटनाओं और धत्तकर्मों पर आश्चर्य प्रकट करने और अतीत को स्वर्णिम मान लेने से
रोकती हैं. ये किताब भी वहीं मिली जिसका एक हिस्सा बैठे-बैठे पढ़ गया.
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