[दीवान]बाबा साहेब से इश्क हकीकी, इश्क मज़ाजी का भी तो रिश्ता बनता है
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Wed Apr 13 12:02:42 CDT 2016
“हम तीर वो ऐसे हैं, लगते जो निशाने हैं,
पंगा हमसे मत लेना, पंगा हमसे मत लेना
हम भीम दीवाने है।
जो शमा पे सड़ जाए
हम वो परवाने हैं
पंगा हमसे मत लेना हम भीम दीवाने हैं।“
इन गीतों में जो शब्द हैं वो भले ही उर्दू या हिन्दवी या रेख़्ता की नफ़ासत
वाली परंपरा से नहीं आते हैं मगर उनके भाव वैसे ही हैं। ‘जो शमा पे सड़ जाए’,
ये लाइन उर्दू का कोई गीतकार नहीं लिखेगा। आप देखिये कि दलितों की कल्पना में
शमा की जगह क्या होती है और वो कैसी होती है। उसके पास मंडराने और उससे जल
जाने के भाव के लिए कैसे शब्द है।
मीरा और औलिया की परंपरा में ये नई सूफी परंपरा है जिसकी तरफ संगीतकारों का
ध्यान गया न ही संगीत के अध्यापकों का। डाक्टर अंबेडकर दलितों के सिर्फ
राजनीतिक प्रतीक नहीं हैं। भीम गीतों में आपको निर्गुण और सगुण भक्ति दोनों ही
परंपरा मिलेगी। इन पर सूफी संगीत की कव्वाली परंपरा से लेकर डीजे संगीतों का
खूब असर है।
आउटलुक के ताजा अंक( अंग्रेजी) में रवीश कुमार का पूरा लेख पढ़ने के लिए नीचे
की लिंक पर चटका लगाएं-
http://www.outlookindia.com/magazine/story/these-arrows-dont-miss-their-mark/296965
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