[दीवान]बत्रा साहब, सच बताइए..विपन चंद्रा को पढ़े बिना आपका काम चल जाएगा ?

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Fri Apr 29 12:09:16 CDT 2016


दीनानाथ बत्रा साहब ने मानव संसाधान विकास मंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि
इतिहासकार विपन चंद्रा की किताब "India’s Struggle for Independence" पर बैन
लगा देने चाहिए और जितनी प्रति है, उसे नष्ट कर देनी चाहिए.

बत्रा साहब खुद को इतिहासकार और संस्कृति रक्षक होने का दावा करते हैं और 2014
की सोप ओपेरा शुरू होने के कुछ दिनों बाद से ही लगातार चर्चा में रहे हैं.
अपने अजीबोगरीब बयान से वो प्राइम टाइम की बहसों के टेस्ट चेंजर का काम करते
रहे हैं. लेकिन

असल सवाल किसी किताब को लेकर आपत्ति दर्ज करने या असहमत होने से कहीं ज्यादा
इस बात को लेकर है कि आखिर एक शिक्षक को ये लिखते हुए कि फलां किताब को नष्ट
कर देनी चाहिए, फलां लेख को जला देना चाहिए, फलां व्यक्ति को नहीं पढ़ा जाना
चाहिए हाथ कैसे नहीं कांपते होंगे. बत्रा साहब जिस स्कूल से आते हैं वहां
किताब सरस्वती हुआ करती हैं और उसे पढ़नेवाले सरस्वतीपुत्र. आखिर एक सरस्वती
पुत्र अपनी मां को जलाने की कल्पना कैसे कर सकता है, नष्ट करने की बात कैसे
सोच सकता है ?

समाज में हुडदंगियों की एक बड़ी जमात है जो विपन चंद्रा को बिना पढ़े, बिना
जाने उनके खिलाफ ट्रॉलिंग का काम शुरू कर देगी, मुर्दाबाद के नारे से वर्चुअल
स्पेस गूंज जाएगा..लेकिन उस साधना का आकलन आखिर कौन करेगा जिसके लिए किसी
व्यक्ति ने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी ?

ये सवाल सिर्फ विपन चंद्रा का नहीं है. सवाल ये है कि क्या हमारा काम
इतिहासकार को, शिक्षण संस्थानों को, शिक्षक-प्रोफेसर को, पत्रकारों को मारकर,
ध्वस्त कर चल जाएगा ? हमारे दिमाग में कहीं उस हिन्दुस्तान की कल्पना तो नहीं
है जिसमें इन सबकी सिरे से जरूरत नहीं है. न किताब की, न लिखनेवाले की और न ही
उस पर बात करनेवालों की. ये मौका विपन चंद्रा की महानता पर बात करने का नहीं
है क्योंकि पूरी रणनीति एक-एक करके उन तमाम लोगों, संस्थानों को खारिज करने की
है जिसकी व्यापक स्तर पर स्वीकार्यता रही है.

ये सवाल कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है कि यदि कोई लेख, किताब, लेखक और इतिहासकार
राष्ट्र निर्माण के एजेंड़े के अनुरूप नहीं है तो उस पर बात करने के लिए
क्लासरूम में मौजूद हैं या फिर सारी कार्रवाई चौक-चौराहे, सड़कों पर लाकर ही
हो जाएगी ? जब सारी चीजें नारे और इस तरह के नष्ट कर दिए जाने की मानसिकता के
बीच ही तय होनी है तो हमें कुछ भी नया करने से पहले सिरे से सबमे आग लगाने,
कूडेदान में फेंक देने के इंतजाम करने होंगे. इस मसले पर क्षितिज( Kshitiz Roy
<https://www.facebook.com/kshitiz.roy>) से हुई लंबी बातचीत की वो लाइन अभी
तक गूंज रही है- आप अपने कलेजे पर हाथ रखकर खुद से पूछिए- क्या आधुनिक भारत को
समझने के लिए बिना विपन चंद्रा को पढ़े आपका काम चल जाएगा ? ठीक है, विपन
चंद्रा गैरजरूरी इतिहासकार हैं तो आप अपनी तरफ से क्या प्रस्तावित करना
चाहेंगे ?

असल में हो क्या रहा है कि हम कुछ भी अलग और बेहतर करने से कहीं ज्यादा
रिजेक्शन मोड में चले जा रहे हैं. हम चीजों की सिरे से खारिज करके, नष्ट करके
सुधार का नारा देने लग गए हैं लेकिन समाज सिर के बाल नहीं हैं कि एक तरफ से
पूरी तरह सफाचट हो जाओ कि आगे के सारे बाल कायदे से आएंगे..
[image: Vineet Kumar's photo.]
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