[दीवान]बुरबक, लड़भख और पेलू-भैरव।

kamal mishra kissakhwar at gmail.com
Fri Aug 12 10:12:30 CDT 2016


दोस्तों, हमारे चंदन भाई छुपे रुस्तम हैं इतना तो आप सब समझ ही गए हैं। यह भी
कि दीवान पर लिखे हमारे पोस्ट को पढ़ते तो हैं लेकिन उस पर किसी तरह की प्रतिक्रिया
व्यक्त करने में वो शायद संकोच करते है। इस लिए भी जब इस पोस्ट पर उनको
प्रतिक्रिया व्यक्त करते पाया तो एकसाथ हैरत और ख़ुशी दोनों महसूस हुयी। मैं
समझता हूँ कि चंदन भाई जैसे गंभीर अध्येता अगर यथोचित अवसर पर अपना मौन भंग
करते रहें तो इससे दीवान के प्रबुद्ध पाठको के साथ ही यहाँ लिखने का
रियाज़ करने वाले मुझ जैसे नौसिखियों का भी बड़ा लाभ होगा।

एक बार फिर आपकी प्रतिक्रिया पा कर अच्छा लगा चंदन भाई! लेकिन इस बार
आप उसे दीवान के पाठको को 'टैग' करना भूल गए हैं। खैर, आप ने जो यह लिखा
है कि, "कर्ण शल्य को कटु वचन कहने के क्रम में दरअसल कई जनपदों के कुछेक
व्यवहारों को असंगत ठहराता है."

तो कहना चाहूंगा कि आपका पोस्ट किया हुआ महाभारत का अंश पढ़ते हुए जो बात मुझे
सबसे ज्यादा चकित कर गयी वह ये कि शल्य के मद्र देश की स्त्रियों को कर्ण के
माध्यम से स्वछन्द कहला रहा महाभारत का रचनाकार सिर्फ उनके यौन आचरण पर ही
टिप्पणी नहीं करता। बल्कि पीसा अनाज और तली मछली खाने वाले मद्रदेशी किस तरह
अपने घरों में *गौमांस भक्षण*, *मद्यपान*, और *हँसना-रोना* करते हैं यह भी
ग्रंथकार की एक प्रमुख चिंता है। और, इस लिए भी ब्राह्मणवादी- पितृसत्तात्मक
समाज- व्यवस्था का तीव्र समर्थक  कुंती /सूर्य /सूत-पुत्र कर्ण हमें उनके इस
आचार- व्यवहार की मुखर आलोचना पेश करता दीखता है।

बहरहाल, जब आप यह लिखते हैं कि, " अवमाननासूचक शब्द और गाली में बुनियादी फर्क
मैं नहीं कर पाता...अर्थबोधक तीव्रता का एक स्केल बनायें तो आपके लिखे तीन
शब्द और अगम्यागमन को केंद्र बनाकर गढ़े गये अवमानना सूचक शब्द पड़ोसी नहीं तो
भी एकजवारी जरुर जान पड़ेंगे."

तो इस बारे में मुझे बस इतनी ही फ़रियाद और करनी है कि हम अगम्यागमन को केंद्र
में रख कर विचार करते हुए निश्चय ही एकजवारी शब्दों की एक विस्तृत सूचि बना
सकते हैं। और फिर कुछेक मामलों में अर्थबोधक तीव्रता के कमतर होने के पीछे की
तार्किक वजहों को भी तलाश ले सकते हैं। मगर ऐसा करते हुए हमें खुद से यह सवाल
भी करना होगा कि इस पूरी प्रक्रिया में हम कहीं एक विशेष भाषायी समूह के
सदस्यों को उनके अपने कर्तृत्व ('एजेंसी') से तो वंचित नहीं कर दे रहे?

और इसी लिए किसी भी भाषाई व्यवहार का पूर्ण सन्दर्भ बड़ा महत्वपूर्ण हो जाता
है।मसलन एक भोजपुरी भाषी बनारसी जब रियो में नजर आये भाजपा सरकार के खेल
मंत्री द्वारा प्रस्तुत आचरण के आधार पर यह निर्णय सुनाता है कि- "*भाजपईया सब
लड़बहेर हऊअन!*"  (मतलब, सारे भाजपाई बेवकूफ हैं।) तो अपशब्द या गाली के बजाय
यहाँ प्रयुक्त 'लड़बहेर' शब्द का अर्थ एक जानकार भोजपुरी श्रोता 'बेवकूफ' के ही
तौर से लेता है। लेकिन सन्दर्भ इतना स्पष्ट न होने पर भी 'लड़बहेर' जैसे
किसी अवमानना सूचक शब्द को 'बेवकूफ' के ही अर्थ की अभिव्यंजना में प्रयुक्त
किया जाता है। और ऐसा शायद लंबे समय से होता आ रहा है। हालाँकि, इसके अपवाद हो
सकते हैं। और इसी लिए मैंने पहले भी यह माना कि अगर 'साला' जैसा
इक साधारणतया स्वीकृत (अप) शब्द किसी विशेष सन्दर्भ में (और आप के शब्दों में
कहूँ तो-- "दांत पीसकर, आंखें बड़ी-बड़ी करके एकदम सप्तम में जाकर") गाली के
तौर से ही इस्तेमाल हो सकता है, तो हमारा अवमानना सूचक शब्द 'लड़बहेर' क्यों नहीं?


फिर भी यह तो हम दोनों मानते हैं कि अवमानना पूर्ण शब्दों के बगैर किसी भी
समूह का काम नहीं चलता चाहे वह कितना भी शिष्ट क्यों न हो। और इसी लिए
अंग्रेजीदां बौद्धिकों के बीच अक्सरहां प्रयुक्त होने वाला 'ईडियट' जैसा
बेहद सामान्य अवमानना सूचक शब्द भी बाज़ मौके किसी लक्षित श्रोता को "गाली"
जैसा चुभ जा सकता है। मगर आम तौर से तो ऐसा नहीं होता है न!

चंदन भाई, अंत में, जो बात मैं मजबूती से एक बार फिर कहना चाहूंगा वो ये कि
लक्षणा और व्यंजना जैसी शब्द शक्ति के अपने भाषाई प्रयोग में बेहद मारक और हर
लिहाज से समृद्ध भोजपुरी भाषी समाज की उद्घाटित और अनुद्घाटित विशिष्टताओं से
कम-जरब हिंदी वाले भला कब तक आँखें चुराएंगे।

*A nation's treasure is its scholars. --- Yiddish proverb*

2016-08-11 16:27 GMT+05:30 kamal mishra <kissakhwar at gmail.com>:

> आपकी प्रतिक्रिया पा कर अच्छा लगा चंदन भाई! दीवान के पाठको को मालूम हो कि
> वर्ष 2002 -2004 के दौरान जब मैं जामिया मिल्लिया इस्लामिया से एम ए कर रहा था
> उस वक्त चंदन भाई वहां हिंदी विभाग के छात्रों को पढ़ाने आया करते थे। बताने की
> जरुरत नहीं कि वो बड़े ही गंभीर अध्येता हैं। और उन्हें शायद ही याद हो कि जब
> मैंने पहले- पहल शोध के बारे में बस सोचना ही शुरू किया था उसी
> वक्त मार्गदर्शन पाने की आकांक्षा लिए जे एन यू के झेलम हॉस्टल में उनसे
> मिलने भी पहुंचा था।
>
> चंदन भाई आपका पोस्ट किया हुआ महाभारत का अंश पढ़ा। मुझे तो ऐसा लगता है
> कि शल्य के मद्र देश में महाभारत की रचना किये जाने के वक्त भी पितृसत्ता अपनी
> जड़ें नहीं जमा पायी थी। और इसी लिए वहां की स्त्रियों को महाभारत का रचनाकार,
> कर्ण की जानिब से, भले ही स्वछन्द कहे, लेकिन, मुझे तो उनका यौन- जीवन और आचरण
> पितृसत्ता के साथ स्थापित होने वाली तमाम वर्जनाओं से पूर्णतया मुक्त दीखता
> है। फिर, आप यह भी गौर करें कि महाभारत का रचनाकार कर्ण के मुख से सिर्फ मद्रक
> स्त्रियों के लिए अपमान जनक बातें ही नहीं कहलाता। बल्कि गांधारकों में शौच के
> आभाव और बिना ऋत्विक के स्वयं यज्ञ करने वाले राजा की निश्चित विफलता से उनकी
> सटीक तुलना के क्रम में वह प्रतिष्ठा प्राप्ति के निमित्त ब्राह्मणवादी समाज
> व्यवस्था और आचार- व्यवहार पालन की अनिवार्यता को भी साथ -साथ रेखांकित करता
> जाता है।
>
> बहरहाल, महाभारत में प्रयुक्त अपशब्दों के उदाहरण से जो निष्कर्ष आप ने
> निकाले हैं उससे भला कौन असहमत हो सकता है ? मेरा मतलब है कि अगम्यागमन सहित
> वर्जना और विहित को साफ़ अलगाने के क्रम में ही कोई भी समाज अपने सदस्यों के
> लिए 'सामान्य' और 'स्वीकार्य' व्यवहार को परिभाषित करने का प्रयास करता है।
> और जिसे हम -आप अंग्रेजी में 'टैबू' कहते हैं, उसका इजहार भी अक्सर गालियों के
> रूप में ही समूह के सदस्यों द्वारा किया जाता है। इस लिए यह भी असंभव नहीं कि
> भोजपुरी के जिन तीन शब्दों का जिक्र मेरी पोस्ट में हुआ है-- किसी सन्दर्भ
> विशेष में-- उनमें से एकाध का प्रयोग गाली के तौर से भी किया जाता हो।
> क्योंकि व्यंजना और लक्षणा की शब्द शक्ति हमें किसी वाक्य प्रयोग में साधारण
> अर्थ और भावार्थ की भिन्नता के साथ ही साथ एकाधिक श्रोताओं द्वारा अपना-अपना
> अर्थ लगाने जैसी संभावना से इंकार की गुंजाईश नहीं देती।
>
> इसके बावजूद मुझे यह कहते हुए कोई हिचक नहीं है कि आम तौर से भोजपुरी के वे
> तीनों शब्द जिनका जिक्र मेरी पोस्ट में आया है गाली के तौर से न व्यवहृत हो
> कर अवमानना के लिए ही प्रयुक्त होते हैं।  मिसाल के लिए अगर मैं ये कहूं कि,
> "हमारा मौजूदा प्रधानमंत्री एक बुरबक है।" तो एक भोजपुरी भाषी 'बुरबक' शब्द को
> यहाँ गाली के रूप में न लेकर एक अवमाननासूचक अभिव्यक्ति के ही रूप में लेगा।
> और, उन ग़ैर -भोजपुरी भाषियों का मुझे पता नहीं जो अभिधा में इस शब्द का अर्थ
> तलाशने लग जाएँ!
>
> *A nation's treasure is its scholars. --- Yiddish proverb*
>
> 2016-08-10 23:59 GMT+05:30 Chandan Srivastawa <chandan at csds.in>:
>
>>  शुक्रिया कमल...आपके लिखे से याद आया महाभारत का कर्णपर्व....कर्ण ने शल्य
>> को चुन-चुनकर जो गालियां दी हैं, उन्हें मैंने मूल में तो नहीं लेकिन अंग्रेजी
>> अनुवाद में कभी पढ़ा था...आपके लिखे ने दोबारा पढ़ने को उकसाया.
>> http://www.sacred-texts.com/hin/m08/m08040.htm
>>
>> गाली चोट पहुंचाती है क्यों ?
>>
>> इसलिए कि वह प्रचलित मर्यादा की याद दिलाती है, गाली देने में यह जताने का
>> भाव होता है कि जो विहित नहीं है वह भी गाली का पात्र कर गुजरेगा/ कर गुजरा
>> है. . जैसे मां-बहन की गालियां जो अगम्यागमन को लक्ष्य करके गढ़ी गई हैं.
>> अगम्यागमन वर्जित है.
>>
>> इसी तर्ज पर यह भी सोचा जा सकता है कि कोई समाज विशेष रीति से किए जाने वाले
>> यौन-संसर्ग करने को सामान्य और विहित माने और उससे अलग रीति से किए जाने वाले
>> यौन-संसर्ग को वर्जित ठहराये. यह समाज इस अलग रीति के यौन-संसर्ग' को गाली के
>> रुप में बरत सकता है.
>>
>> कर्ण ने शल्य को जो गालियां दी उनमें यही बात है. वह मद्रदेशीय शल्य को वहां
>> प्रचलित यौन-संसर्ग की रीति विशेष की याद दिलाता है और ऐसा करके अपमान करना
>> चाहता है, माने गाली देता है.
>>
>> आपने भोजपुरी के जिन शब्दों की याद दिलायी है--- शायद उनपर भी यह बात लागू
>> हो, ऐसा सोचकर यह पोस्ट साझा करना चाह रहा हूं.
>>
>>
>> 2016-08-10 20:39 GMT+05:30 kamal mishra <kissakhwar at gmail.com>:
>>
>>> दोस्तों,
>>> शब्दों का संसार मुझे शुरू से ही बड़ा आकर्षक लगता रहा है। जब पढ़ने का कुछ
>>> शौक किया तो मालूम हुआ कि हमारी परंपरा में तो शब्द को ब्रह्म तक माना गया
>>> है। फिर तमाम आस्तिक दर्शन भी शब्द प्रमाण को मान्यता देते हैं। और वैदिकी
>>> पुरातनता से इतर भी, मध्यकाल के दार्शनिक -संत कबीर के "सबद" की चोट पड़ते
>>> ही हर किस्म के पोंगापंथी आज भी यहाँ त्राहि-त्राहि कहने लगते हैं। लेकिन
>>> शब्दों में जैसे -जैसे मेरी रूचि बढ़ती जाती है यह बात भी समझने लगा हूँ कि
>>> किसी खास भाषा के कुछ शब्द अगर आलोचनात्मक चिंतन और सर्जना के लिए आधार का काम
>>> करते हैं। तो वहीँ दूसरी ओर उसी भाषा की शब्द सम्पदा का एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी
>>> होता है जिसे गंभीर चिंतन और सर्जना के नजरिये से गैरजरूरी मान कर उपेक्षित
>>> छोड़ दिया जाता है। अक्सर ऐसे शब्दों में वो अवमाननापूर्ण अभिव्यक्तियाँ भी
>>> शामिल होती हैं जिनका इस्तेमाल एक 'शिष्ट' वक्ता केवल अनौपचारिक बातचीत में
>>> करता हैं या फिर भाषिक हिंसा को अंजाम देते हुए।
>>>
>>> मुझे नहीं पता कि आप साहिबान भोजपुरी को एक भाषा मानते हैं या महज एक बोली।
>>> खैर आप इसे जो कुछ भी मानते हों लेकिन इतना तो जरूर मानेंगें कि भोजपुरी पट्टी
>>> के बाशिंदों का अलहदा मिजाज़ उनकी अपनी बानी में ही अच्छे से अभिव्यक्ति पाता
>>> है। इस बानी की एक बड़ी भारी विशेषता जहाँ इसमें प्रयुक्त होने वाले अनगिनत
>>> लोकोक्तियाँ और मुहावरे हैं, जो भाषायी तौर से अभिधा के बजाय व्यंजना की शक्ति
>>> में इस भाषिक समूह के अटूट विश्वास की पुष्टि करते हैं। तो वहीं दूसरी ओर
>>> अवमाननापूर्ण या अशिष्ट अभिव्यक्तियों की प्रचुरता के लिहाज से भी मैं समझता
>>> हूँ कि भोजपुरी का जोड़ मिलना बड़ा मुश्किल है। और भोजपुरी भाषियों द्वारा
>>> बरते जाने वाले कुछेक अवमाननापूर्ण शब्द तो भाषायी क्षेत्र की सीमायें लाँघ
>>> कर बेहद प्रचलित हुए नजर आते हैं। ऐसा ही एक शब्द है - 'बुरबक'। बिहार
>>> प्रांत में आप कई भाषायी क्षेत्रों से संबद्ध लोगों को 'बुरबक', या कुछ
>>> वैविध्य के साथ 'बुड़बक', जैसे शब्द का इस्तेमाल करते हुए आसानी से खोज ले
>>> सकते हैं। इस अक्सरहां इस्तेमाल होने वाले बेहद प्रचलित भोजपुरी शब्द का आमफ़हम
>>> अर्थ 'बेवकूफ' बताते हैं।
>>>
>>> इस शब्द से मेरी पहली मुलाकात का भी एक बड़ा मजेदार किस्सा है। कुछ ढाई-तीन
>>> साल की ही उमर रही होगी जब भोजपुर जिले में अपने ननिहाल अनुवां जाना हुआ।
>>> मूलतः परमानपुर से संबद्ध मेरे नाना का परिवार अगर रईस नहीं तो भी संपन्न जरूर
>>> रहा होगा। क्योंकि, अस्सी के दशक की शुरुआत के वर्षों की उस यात्रा की जो
>>> स्मृति मेरे जेहन में अंकित हैं उसके हिसाब से अनुवां में दरवाजे पर उन दिनों
>>> भी घोडा बंधा करता था। वैसे शायद इलाके के रईस माने जाते रहे हों लहठान गांव
>>> के वो नथुनी तिवारी जो मेरी मौजूदगी में ही एक बार अपने हाथी पर सवार हो कर
>>> मेरे ननिहाल आये थे। बहरहाल, याद आता है कि उसी यात्रा के दौरान मेरे मामा, जो
>>> फ़ौज के लेखा विभाग में पहले दर्जे के अधिकारी रहे, मुझे साथ ले कर हमारे एक
>>> संबंधी की बारात में गए थे। जहाँ जनवासे में बाकायदा नाच देखने का भी इंतजाम
>>> किया गया था। अपने हमउम्र बच्चों के साथ खेलते कूदते मैं वहीँ सो रहा। सुबह जब
>>> सो कर जगा तो देखा कि बडा हड़कंप मचा है क्योंकि सभी बच्चों के जूते-चप्पल जो
>>> उन्होंने कनात के बाहर उतार रखे थे, रात भर में गायब हो गए हैं। इस बीच मैंने
>>> अपनी चप्पलें जहाँ सहेज कर रखी थीं, वहां से महफूज पायीं। और उन्हें पहन कर
>>> मैं अपने मामा के पास जा पहुंचा। मेरे मामा को इतनी सी उम्र में मुझसे ऐसी
>>> किसी समझदारी की उम्मीद यक़ीनन नहीं रही होगी, जिसके बाद वो बड़े गर्व से सबको
>>> बताते रहे कि जहाँ बाकी बच्चे अपनी चप्पलें खो कर "बुरबक" बन गए वहीँ उनका
>>> मिर्जापुरी- भगिना बड़ा तेज निकला और सोने से पहले उसने अपनी चप्पलें छिपा कर
>>> रख दी थीं।
>>>
>>> अब सोचता हूँ तो लगता है कि ग्रामीण पृष्टभूमि से ताल्लुक रखने वाले मेरे
>>> सीधे -सादे मामा मिर्जापुरियों के बारे में वैसा सब कहते हुए शायद दो चीजों को
>>> नजर -अंदाज कर रहे थे। पहला ये कि उस छोटी उम्र में भी मेरी तरबियत 'वणिक-
>>> वृत्ति' वाले मेरे दादा कर रहे थे। और दूसरा ये कि मिर्जापुर के सभी शहरी लोग
>>> अगर 'तेज' ही होते तो फिर वहां 'लड़भख' जैसा अवमाननासूचक भोजपुरी शब्द--
>>> ठीक बेवकूफ के ही अर्थ में-- भला किनके लिए इस्तेमाल होता आया होगा ?
>>>
>>> गौर से देखें तो आप पाएंगे कि अर्थ की समानता के अलावा भी 'लड़भख' और
>>> 'बुरबक' एक ही कोटि के शब्द हैं। इस श्रेणी को हम करीब से देख सकें इसके लिए
>>> कुछ जतन करना यहाँ आवश्यक लगता है। मैं समझता हूँ कि पहले- पहल 'लण्ड' और
>>> 'बुर' जैसे परिचित अग्रवर्ती के साथ 'भख' के मेल से ये शब्द बनाये गए होंगें।
>>> अब 'भख' या 'भक' का संबंध अगर भक्षण की क्रिया से है। तो इन शब्दों का अभिधा
>>> में अर्थ क्या होना चाहिए वह लिखने की आवश्यकता यहाँ नहीं हैं। हालाँकि,
>>> भोजपुरी पट्टी के इन दोनों निकटवर्ती अवमाननापूर्ण शब्दों का इस्तेमाल
>>> अगर इनके मौजूदा व्यंजनात्मक अर्थ (बेवकूफ) के रूढ़ होने से पहले भी अभिधा
>>> के तौर से न हुआ हो तो फिर यहाँ इस संभावना पर भी विचार करना बनता है कि क्या
>>> लोक में इनका पहला प्रयोग शैव अथवा शाक्त मतावलंबियों के लिए विरोधियों द्वारा
>>> गढ़ी गयी तिरस्कारपूर्ण अभिव्यक्तियों के रूप में तो शुरू नहीं हुआ था? अपनी इस
>>> प्रस्थापना के समर्थन में फ़िलहाल तो मैं लोक- विश्रुत और खास कर काशी के
>>> भोजपुरी भाषियों के मुहँ से सुनी हुयी एक तीसरी भोजपुरी अभिव्यक्ति का उपयोग
>>> करना चाहूंगा। और वह है - पेलू भैरव। असल में काशी के लोग 'पेलू- भैरव' जैसी
>>> अभिव्यक्ति का प्रयोग व्यंजना के ही तौर से अक्सर 'बेवकूफ बनाने वाले' के लिए
>>> किया करते हैं। लेकिन शिव की नगरी कही जाने वाली काशी में शिव के ही एक
>>> उग्र रूप की इस कदर नकारात्मक प्रस्तुति के पीछे क्या भैरव उपासकों का मजाक
>>> बनाने की मंशा एकदम साफ नजर नहीं आती है?
>>>
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>>> *A nation's treasure is its scholars. --- Yiddish proverb*
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