[दीवान]असल मुद्दा पाजामे की सफेदी की सुरक्षा का हैः
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Sun Aug 21 12:47:38 CDT 2016
र्चुअल स्पेस पर जो ये आप पॉलिटिकल वीर-जारा की तस्वीर तैर रही है, ऐसा नहीं
है कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद चलकर बाढ़ के पानी से
गुजर नहीं सकते. आखिर उनके साथ के दर्जनभर अर्दली तो चल ही रहे हैं न.
लेकिन असल मामला तो सफेदी का है. बचपन से जो अंग-वस्त्र सफेद रखने का
प्रशिक्षण मिला है, उसे यूं ही कैसे गंवा दें. फिर बाकी के लोगों की जो पोशाक
है, उनके साथ रंग चक्कर भी तो नहीं है. जो मिट्टी का रंग है, वही उनकी वर्दी
के भी. ऐसे में इस तस्वीर का मजाक उड़ाने और जनसेवक की छवि खराब करने की नियत
से आलोचना करने से पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की बचपन से अमुशासित
रहने किसी भी हद तक सूखे बने रहने की प्रतिबद्धता की दाद देनी चाहिए.
मेरा ख्याल है शिवराज सिंह चौहान का जिस दौर में बचपन गुजरा होगा, वो रिन
सफेदी के विज्ञापन का दौर नहीं रहा होगा, सर्फ एक्सेल और एरियल तो भूल ही
जाइए, बहुत बाद की चीज है. वो दौर रहा होगा निरमा..वांशिंग पाउडर निरमा, दूध
सी सफेदी..मेरी तरह इन्होंने भी इसे मछली जल की रानी है टाइप से कविता समझकर
रट लिया होगा..तो एक अर्थ में ये कविता के प्रति की भी प्रतिबद्धता है. अच्छा
ही उन्होंने ऐसे नाजुक वक्त में भी कविता का साथ नहीं छोड़ा. कला और साहित्य
संरक्षण के लिए अनुशासन के साथ-साथ इनकी जितनी तारीफ की जाए कम है.
अब बात रह गई इस पॉलिटिकल वीर-जारा के दृश्य की. हमने एम.ए तक किसी से भी
प्रेम नहीं किया. प्रेम न करने की जो मूल वजह रही वो थी अस्सी और नब्बे के दशक
का हिन्दी सिनेमा और उनके गाने. मैंने गौर किया कि जब भी रोमांटिक दृश्य बनता,
कोई न कोई गाना शुरू हो जाता. गाना मुखड़ा क्रॉस करके अंतरा की तरफ यूटर्न
लेता कि हीरो हबटकर हीरोईन को गोद में उठा लेता. कुछ में तो गाना खत्म होने की
दो पंक्ति पहले तक गोद में ही लेकर चलता-दौड़ता. इसके अलावा पहले तो हीरोईन को
सांप-बिच्छू काट लेता, हीरोईन मूर्छित( बेहोश ) हो जाती तो हीरो को अचानक से
गोद में उठाकर एम्बुलेंस तक पहुंचाना पड़ता और बाद के फिल्मों में जब हीरोईनें
ड्राइविंग करने लगीं तो रोड एक्सीडेंट का चक्कर पड़ने लगा. फिर वहां भी गोद
में उठाकर हॉस्पीटल ले जाने का दृश्य. इन दृश्यों को देखकर छुटपन से ही दिमाग
में ये बात बैठ गई कि इश्क-मोहब्बत में पड़ने पर कभी भी प्रेमिका को गोद में
उठाना पड़ सकता है.
मेरे जैसा फिजिकल एक्टिविटी से भागनेवाला लद्दड़ छात्र जो पीटी केडर से काले
शीशेवाले कम्प्यूटर कमरे में छुप जाता, स्कूल का बस्ता उठाने में ही रोते-रोत
आंख से खून निकल जाते, वो भला कहां से ऑन एन एवरेज चालीस-पैंतालीस किलो की
प्रेमिका को उठाकर भागता. बोर्ड परीक्षा तक मां कपार पर गेहूं की थैली भी रखती
तो पांच किलो से ज्यादा की नहीं. लव मैरिज की जगह एरिंज मैरिज को ज्यादा
सुविधाजनक मानने की एक वजह ये भी रही कि दिमाग में था कि इसमे गोद में उठाकर
भागने की जरूरत नहीं पड़ेगी. मुसीबत में भी घर में कोई न कोई तो होगा ही. खैर
अब जब इस दृश्य से गुजर रहा हूं तो खुद का ही लाख-लाख शुक्रिया अदा कर रहा
हूं. बार-बार एक ही ख्याल आया- अच्छा किया, कभी सेना, पुलिस, यूपीएससी, पीसीएस
का ख्याल नहीं आया. नहीं तो जिस डर से हमने छुटपन से लेकर एम.ए. तक प्रेम नहीं
किया, वो काम करना पड़ जाता. बाद की प्रेमिका तो आप कन्विंस भी कर सकते हो कि
देखो, ये गोद में उठाकर दौड़नेवाला काम हमसे नहीं होगा, नल्ला उखड़ जाएगा मेरा
( मां के शब्द जिसमे भारी चीज उठाने के बाद से लूज मोशन शुरू हो जाता है). तुम
फास्ट-फार्वड मोड में चाहे बाकी जो करवा लो. लेकिन सरकारी नौकरी रहते कैसे मना
कर सकते .. दो ही ऑप्शन होता- या तो नौकरी से इस्तीफा दो या फिर उठाने के बाद
लूज मोशन और नल्ला उखड़ जाने का ईलाज करवाओ. लेकिन
इन सबके बावजूद मैं इस सिरे सोच रहा हूं कि यदि मैं पजामे की सफेदी की रक्षा
कर रहे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उठाता तो उसी इमोशन्स के साथ उठा
पाता जैसा कि वीर-जारा में शाहरूख ने प्रीति जिंटा को उठाया था या फिर जान
तेरे नाम में रोनित रॉय ने फहरीन को उठाया था ? बिना रोमैंटिक फीलिंग्स के
ड्यूटी बजाने की खातिर सिनेमाई अंदाज में किसी को उठाना कितना मुश्किल काम है
न..? मेरा बड़ा मन है गोद में उठाए सुरक्षाकर्मियों से ये सवाल करने का कि अगर
आपके साथ नौकरी की बंदिश नहीं होती तो आप किसी ऐसे शख्स को इस तरह गोद में
उठाते जिनको लेकर किसी तरह की इमोशनल फीलिंग्स नहीं है. अगर मामला पाजामे की
सफेदी की सुरक्षा से अलग हटकर होता तो आपके चेहरे के हाव-भाव ऐसे ही होते ?..
[image: Image may contain: 1 person , outdoor and nature]
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