[दीवान]क्या जेएनयू से उठे ताजा विवाद का राजनैतिक फायदा उठाने के लिए भगवा पार्टी ने बदली है अपनी रणनीति?

kamal mishra kissakhwar at gmail.com
Fri Feb 12 05:01:20 CST 2016


दोस्तों,
सुबह जब सो कर उठा, तो पेट में चूहे भयानक उधम मचा रहे थे। वज़ह ये कि कल रात
एक बार फिर फांकाकशी में ही गुजरी थी। लेकिन कल रात से भूखा होने के बावजूद
भी, शायद अपनी ब्राह्मण पृष्टभूमि के चलते ही, अलसुबह इतना जरूर याद रहा कि आज
तो बसंत पंचमी है। सो नहा -धो कर और देवी सरस्वती की आराधना करने के बाद ही
मुझ जैसे विधा- लोभी को नेवाला उठाने का हक़ बनता है! बस, ये ख्याल दिल में आते
ही, जल्दी-जल्दी स्नान-ध्यान से निवृत्त हुआ, और कोने-अतरे में पड़े चिल्लर
तलाशने के बाद जो कुल जमा 20-25 रुपये मिले उन्हें जेब के हवाले
कर तेजी से जेएनयू की तरफ़ बढ़ चला। इरादा ये था कि, जेएनयू में, के.सी.
कॉम्प्लेक्स पहुँच कर, चौधरी के यहाँ गरमा गरम पूरी-सब्जी और चाय का भोग लगाया
जाये। मगर अपनी तेजकदमी में ज्यों ही जेएनयू गेट तक पहुंचा कि वहां तैनात
पुलिस फ़ोर्स और मीडियाकर्मियों को देख माथा ठनक गया। पूछने पर मालूम हुआ कि
किसी प्रदर्शन के सबब ये लोग वहां जमा हैं। वैसे प्रदर्शनकारी अभी वहां नहीं
पहुंचे थे, और सब लोग अब उन्ही के आगमन का इंतजार कर रहे थे। खैर, 'भूखे भजन न
होय गोपाला, रख लो अपनी कंठी माला' जैसे एक बेहद व्यवहारिक वाक्य को याद करते
हुए मैंने उस वक्त वहां रुकना मुनासिब न समझ पहले के.सी. जा कर पेट पूजा करने
का फैसला किया। चौधरी के ढाबे तक पहुंचा भी नहीं था कि सामने से मैनेजर
पाण्डेय साहब आते हुए दिखायी दिए। उन्हें श्रद्धा से नमस्कार किया, तो
मुझ अजनबी का नमन स्वीकार करने के बजाय वो सर घुमा कर मेडिकल स्टोर की तरफ बढ़
चले। बहरहाल, चौधरी के यहाँ काम करने वाले लड़कों को जल्दी से एक पूरी-सब्जी
बनाने का कह, मैं वहीँ बेंच-टेबल पर जम गया। लड़के भी किचन में काम करने वालों
को पूरी-सब्जी बना देने की बात दोहरा कर, मोबाईल पर खेसारी लाल का कोई भोजपुरी
होली गीत देखने-सुनने में मशरूफ हो लिए। मेडिकल स्टोर से कुछ पूछ- ताछ करने के
बाद पांड़े जी भी अपने रस्ते जा चुके थे, और नाश्ते का इंतजार करने के दौरान,
मैं उसी मेडिकल स्टोर पर जमा लोगों की भीड़ को देखता हुआ व्यक्ति और समाज की
निरंतर बढ़ती स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर सोचने को विवश हुआ।
बहरहाल मेरी फ़िक्र का सिलसिला कुछ खास आगे बढ़ता उसके पहले ही चौधरी के यहाँ
काम करने वाले एक लड़के ने नाश्ते की प्लेट सामने ला कर रख दी, और मैं
क्षुधापूर्ति को प्राथमिकता देते हुए उसे साफ करने में जुट गया।
दसेक मिनट में चाय- नाश्ता करने के बाद, मैं जब तक वापस से जे एन यू गेट की
तरफ पहुंचा, तो पाया कि वहां का नजारा अब तक पूरी तरह बदल चुका था। गेट को आम
लोगों के आवागमन हेतु बंद करवाने के साथ ही, ट्रैफिक को दूसरे गेटों की तरफ
डायवर्ट किया जा रहा था। गेट के बाहर इकट्ठा मुट्ठी भर प्रदर्शनकारियों से
चार-गुना ज्यादा बड़ी संख्या में पुलिस के जवान और महिला कांस्टेबल वहां
बैरिकेट आदि लगा कर अपनी पोजिशन संभाल चुके थे। मीडियाकर्मी भी अपने कैमरे
संभाले किसी बड़ी सनसनी को हर एंगल से कवर कर लेने के लिए पूरी तरह मुस्तैद हो
चुके थे। और गेट के पास ही खड़े इक्का-दुक्का छात्र अब आपस में बाहर जारी
प्रदर्शन पर चर्चा में मशगूल थे। इतने में पुलिस के किसी अधिकारी की गाड़ी को
अंदर आने देने के लिए गेट खोलने की जरुरत पड़ी, और इस से पहले की आने-जाने
वालों के लिए वह रास्ता फिर से पूरी तरह बंद हो जाता आपका यह नाचीज़ उसी
गेट से बाहर निकल चुका था।
दरअसल, मुझे यह महसूस हुआ कि गेट से बाहर निकल कर कुछ दूसरे कोण से वही नजारा
कहीं ज्यादा साफ़ देखा जा सकता है। सो चंद लम्हों में, जेएनयू गेट से निकल
कर, सड़क पार करने के बाद, मैं हिल-टॉप पर एक किनारे जा खड़ा हुआ। वहां से मैं
उन पच्चीस-तीस के लगभग जमा प्रदर्शनकारियों को, जो अब तक गेट के बाहर एक घेरा
सा बना चुके थे, साफ देख सकता था। छोटी-बड़ी गाड़ियों से उतर कर प्रदर्शन में
शामिल होने के लिए आ रहे उत्साही लोगों को भी यहाँ खड़े हो कर देख पाना मेरे
लिए मुश्किल नहीं था। बहरहाल, इस 'साईड-व्यू' से देखते हुए जो पहली बात मुझे
साफ समझ में आयी वो ये कि कैमरे और ओ.वी. वैनों की उपस्थिति
से प्रदर्शनकारियों का उत्साह यहाँ दोबाला हो रहा था, और वे कैमरों की निगाह
में निगाहें डाले 'जेएनयू के जयचंदों' के खिलाफ बुलंद आवाज़ में नारेबाजी करते
हुए अपने सभी पिछले रिकार्ड ध्वस्त किया चाह रहे थे। तिरंगा झंडा लहराते हुए
लोगों का यह दिलकश मजमा अपने-- 'जूते मारों सालों को' और 'हिंदुस्तान में रहना
है तो वंदेमातरम कहना होगा', जैसे-- उग्र राष्ट्रवादी नारों और
तदनुरूप तेवर से पास की सड़क से गुजर रही भीड़ का ध्यान भी बरबस खींच रहा था।
एक बात तो साफ़ थी और वो ये कि पिछले दिनों जेएनयू के कुछ छात्रों द्वारा अफजल
गुरु और कश्मीरी आजादी समर्थकों के पक्ष में कार्यक्रम आयोजित किये जाने से
उपजे विवाद की प्रतिक्रिया में ही आज का यह प्रदर्शन आयोजित था। लेकिन जे एन
यू के सामने तिरंगा लहरा कर राष्ट्रवादी नगाड़ा बजा रहे इन प्रदर्शनकारियों का
असली मकसद क्या है और ये लोग आखिर हैं कौन यह साफ नहीं हो पा रहा था। इसी
उधेड़बुन में जेब में पड़ी एक सिगरेट निकाल कर उसे तीली दिखाने की तैयारी कर ही
रहा था कि प्रदर्शनकारियों की भीड़ में सबसे आगे नारेबाजी कर रहे कुछ
परिचित चेहरों पर निगाह थम गयी। सिगरेट का कश खींचने के साथ ही अब मैं यह साफ
देख रहा था कि मेरे पड़ोस में रहने वाला भारतीय जनता पार्टी के अनुसूचित
जाति मोर्चे से संबद्ध एक अति महत्वाकांछी नौजवान, जिसने नरेंद्र मोदी के पी.
एम. उम्मीदवार घोषित होने के साथ ही भाजपा का दामन थामा, बुद्धविहार में रहने
वाले कई दूसरे दलित नौजवानों के साथ इस प्रदर्शन में बढ़-चढ़ कर शामिल है। यह
देखने के बाद इस बात पर शंका की कोई गुंजाईश बाकी न रही कि प्रदर्शन का आयोजन
संघ-भाजपा के लोगों ने ही किया है। लेकिन अपनी पार्टी का झंडा बैनर थाम कर
प्रदर्शन करने के बजाय भगवा पार्टी ने तिरंगा झंडा लहरा कर प्रदर्शन करने का
फैसला आखिर क्यों किया ? यह और इसी तरह के कुछ दूसरे मौजूं सवालों पर सोचता
हुआ मैं सिगरेट ख़त्म होने के साथ ही हिल-टॉप से उतर कर अपने ठिकाने की ओर बढ़
चला।
दोस्तों, अपने कमरे पहुँचने और यह पोस्ट लिखने के दौरान मानव संसाधन विकास
मंत्री स्मृति ईरानी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह के मीडिया को दिए गए
ताजा बयानों पर भी नजर गयी। इस बात का भी इल्म हुआ कि जेएनयू प्रशासन द्वारा
उक्त विवादास्पद मामले पर एक जाँच कमिटी बिठाने का निर्णय और शीघ्र
ही कार्यवाही करने का भरोसा देने के बाद भी, दिल्ली पुलिस ने हालिया मामले
पर सक्रियता दिखाते हुए पिछले कुछ घंटों के दर्मियान पूछताछ के नाम पर जेएनयू
से छात्रों की धर-पकड़ शुरू कर रखी है। और 'राष्ट्रद्रोह' जैसे मामले में
छात्रों को घेरने की तैयारी लगभग पूरी की जा चुकी है। जो भी हो एक बात तो नोट
करने की है और वो ये कि हैदराबाद सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला की
आत्महत्या जैसी बेहद दुखद घटना से हुयी अपनी छीछालेदर के बाद केंद्र सरकार
और भगवा पार्टी ने अब शायद अपनी रणनीति बदल ली है। इसका मतलब ये कि, आक्रामकता
में कमी करने के बजाय, जे एन यू से उठे ताजा विवाद को अपने पक्ष में राजनैतिक
तौर से भुनाने के लिए, भगवा गठजोड़ आसन्न छात्र संघ चुनाव को देखते हुए कैम्पस
में जहाँ अपने छात्र संगठन एबीवीपी की सहायता से हस्तक्षेप और दबाव बनाने का
प्रयास करता दिख रहा है। वहीँ कैम्पस के बाहर जेएनयू की विवादास्पद घटना
पर जनमत बनाने, इस बेहद लोकतान्त्रिक अकादमिक संस्थान पर दबाव बढाने, और इसके
चरित्र को अपनी तरह से प्रभावित करने के लिए भी सीधे भाजपा के बैनर का
इस्तेमाल न करके भगवा संगठन के लोग तिरंगा लहराते हुए प्रदर्शन करते हैं।
वैसे, जेएनयू के जयचंदों को जूते मारने और गिरफ्तार करने की मांग को ले कर
किया गया भगवा पार्टी का आज का प्रदर्शन मुझे तो हर लिहाज से सफल लगा। इस
लिहाज से और भी कि यह प्रदर्शन कुछ वैसे नौजवानों को भी अपने पक्ष में खड़ा कर
ले गया जो रोहित वेमुला जैसे दलित छात्र की आत्महत्या के बाद भगवा राजनीति से
छिटक कर दूर जा सकते थे।
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