[दीवान]और वो चोला और चैनल बदलते रहते हैंः दास्तान-ए-सेडिशन
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Sat Feb 20 13:29:43 CST 2016
शहंशाह को उड़ती-उड़ती खबरों पर यकीं है और ये उड़ती-उड़ती खबरें टाइम्स नाउ
तक जा पहुंचती है..
ये जेनएनयू में पिछले दिनों हुई घटना को लेकर, बहुत ही कम समय में( चार-पांच
दिन के भीतर ही) अंकित-चड्डा और हिमांश वाजपेयी( Himanshu Bajpai
<https://www.facebook.com/himanshu.lakhnavi>) की ओर से पेश की गई दास्तानगोई
है. आपको जेनएयू मामले में जो कुछ भी हुआ, हो रहा है और इसके प्रतिरोध में जो
आवाजें उठाई जा रही हैं, उनसे असहमति हो सकती है लेकिन जब आप इस दास्तानगोई से
गुजरेंगे तो महसूस कर सकेंगे कि प्रतिरोध की रचनाशीलता क्या होती है ? कविता,
कहानी, कल्पनाशीलता और फैंटेसी के बीच यथार्थ कितने खुरदरे और मारक रूप में
सामने आता है.
दास्तान-ए-सेडिशन दरअसल 2007 में विनायक सेन की हुई गिरफ्तारी पर पेश की गई
दास्तानगोई का सामयिक रूपांतरण है. तब साहित्य अकादमी में पेश की गई
दास्तानगोई के दौरान ये पंक्तियां बार-बार याद आ जा रही थी-
यदि देश की सुरक्षा यही होती है
कि बिना ज़मीर होना ज़िंदगी के लिए शर्त बन जाए
आंख की पुतली में 'हां'के सिवाय कोई भी शब्द
अश्लील हो
और मन बदकार पलों के सामने दंडवत झुका रहे
तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है.
कल जेएनयू में जब अंकित और हिमांशु इसे नए कलेवर के साथ हजारों छात्रों के बीच
पेश कर रहे थे तो मैं जा नहीं पाया और अब इसकी वीडियो देखकर मैं साल 2007 के
दौर में चला जा रहा हूं. तब यूपीए की सरकार थी और जनता के प्रति,
पढ़ने-लिखनेवाले, बुद्धिजीवी समाज के प्रति यूपीए सरकार को उसी तरह का शक
परेशान कर रहा था और उनके दमन में लगी थी, जैसा कि हम इन दिनों देख रहे हैं..
लेकिन उस दौर में और अब में बुनियादी फर्क है कि इस दमन में तब मीडिया इतने
खुले और बेशर्म होकर साथ न थी जितना कि अब सक्रिय है. उस वक्त भी न्यूज चैनलों
का चरित्र सराहनीय नहीं था लेकिन ये भी नहीं था कि दर्शकों को बलवाई-दंगाईयों
में तब्दील करने की फैक्ट्री के तौर पर काम करने लग जाए. लिहाजा, इस
दास्तानगोई में आप देखेंगे कि कोहिस्तान के बहाने जिस कहानी के जरिए देश के
हालात पर चिंता जाहिर की जा रही है और सत्ता के दमनकारी नीतियों से असहमति,
उसके साथ-साथ मीडिया के चरित्र पर भी करारी चोट है..
https://www.youtube.com/watch?v=vB22GzQEuwk&feature=youtu.be
<https://www.facebook.com/l.php?u=https%3A%2F%2Fwww.youtube.com%2Fwatch%3Fv%3DvB22GzQEuwk%26feature%3Dyoutu.be&h=EAQFS5VDiAQGH_SrPVGyjdsGvSyapyOrWyefEhtRFFbj2NQ&enc=AZOkOSj4N43jsnip5An7ctg8OXynpOkcM8PHcU_lmhm5Uh0SVgwEhCamfT09Mf8WslX55rfil8nxwOqXtzLk7M8eHkF6_ekBwXNZp2nWktRWLKVdfQ-BweCjoaZciwnWL5s_SOeSOqJgW19iF2dr9F210WfQeO64RKN-rvyxVr2TIyGFGOgVImt3J-PCOZxzTsQ&s=1>
नोटः इस वीडियो में कुछ नारे भी लगाए गए हैं जो कि दास्तानगोई का हिस्सा नहीं
है और मेरी अपनी समझ है कि इससे बचा जाना चाहिए था. दास्तानगोई अपने आप में
इतनी मारक विधा है कि दर्शकों को अलग से नारे लगाने की जरूरत कभी नहीं पड़ती.
लिहाजा हम विधा के पुराने दर्शक होने के नाते नारे लगाए जाने की रिवायत से
अपने को अलग करते हैं. कायदे से तो तालियां भी नहीं बजानी चाहिए.
[image: Vineet Kumar's photo.]
<https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10208285569474577&set=a.10200486778069666.2195810.1163764868&type=3>
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