[दीवान]तिरंगे को इस हाल में देखकर दुख तो बहुत हुआ लेकिन..

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Mon Feb 22 11:01:32 CST 2016


हम जैसे रेडियो के श्रोता जो आकाशवाणी की ये पंक्ति सुनकर बड़े हुए हैं- और
राष्ट्रीय शोक के इस मौके पर तिरंगे को झुका दिया गया है, कनॉट प्लेस, नई
दिल्ली के तिरंगे को 107 फीट उंचे खंभे से तेजी से फिसलते और फिर जमीन में
लोटता देख बहुत दुख हुआ. जिस तरह से तिरंगा 107 फिट उंचे खंभे से सरसराते हुए
बिल्कुल जमीन पर लोटने लग गया, वो दृश्य अभी तक मेरे जेहन में चक्कर काट रहा
है. लगा खंभे की उंचाई जिस पर तिरंगा लहराता रहा है, वो उंचाई अब अब एक शोक
में, अवसाद में बदल गई हो. उंचाई भी इतनी निरीह, बेजान हो सकती है, अपनी आंखों
से देख रहा था.

लगा साठ फीट लंबे और चालीस फीट चौड़े तिरंगे को जाकर पकड़ लूं. इसे तह लगाकर
केन्द्रीय सचिवालय पुलिस स्टेशन में जमा करा आउं जिससे कि मेरी तरह आहत होने
से कई लोग बच जाएं. जिस झंड़े पर लोगों की निगाहें टिकी रहती है और कनाट प्लेस
में मैंने दर्जनों बार इसकी सीध में आकर सेल्फी लेते देखी है, आज उनके बीच से
तिरंगा गायब था या फिर सिर्फ उतना ही हिस्सा दूर से दिखाई दे रहा था कि जैसे
सेंट्रल पार्क में शाम की शाखा लगी हो. लेकिन

हम ऐसा कुछ भी नहीं कर सकते थे. मैं किस भावना से झंड़े को छू रहा हूं, ये भला
किसे मालूम होता और जिस माहौल में मैं उसे छूने का काम करता, क्या मैं लोगों
के बीच उसके बाद सुरक्षित रह पाता. लिहाजा अफसोस करने के अलावा कोई और विकल्प
नहीं था. आज से तीन दिन पहले मैंने जंतर-मंतर पर जेएनयू की घटना को लेकर पूरे
शहर के बुद्धिजीवी-अकादमिक की जुटान के बीच था तो उनके बीच मुझे एक ऐसी मां
मिली जो अपने दस-ग्यारह साल के बच्चे को तिरंगे में लपेटकर लाई थी. मुझे जितनी
बात समझ में आई, वो ये कि यदि लाठी चार्ज जैसी स्थिति बनती है तो कोई इस पर
चोट नहीं करेगा, बच्चे को कोई नुकसान न होगा.

अभी जो सरकार की ओर से देश के सारे केन्द्रीय विश्वविद्यालय में 207 फीट उंचे
खंभे पर तिरंगा फहराने का आदेश हुआ है( हालांकि जेएनयू में ये तिरंगा पहले से
ही लहराता आया है) और इसे लेकर जो तर्क दिए जा रहे हैं, मुझे इसमे दूसरा भाव
नजर आता है. खासकर जब मैं कनॉट प्लेस के सेन्ट्रल पार्क में इसे लहराते हुए
देखता हूंं.

मुझे लगता है कि तिरंगे के सामने होने पर लोगों में ये फीलिंग होती होगी कि
पॉकेटमारी नहीं करनी चाहिए. ऑटो रिक्शा को लगता होगा, मनमानी किराया मांगना या
जान-बूझकर न चलने के बहाने बनाना सही नहीं होगा. पुरुषों को लगता होगा कि
महिलाओं से बदतमीजी से पेश नहीं आना चाहिए. किसी को किसी से झूठ नहीं बोलना
चाहिए..देश की राष्ट्रभक्ति का सबूते ये तिरंगा गवाह बनकर हमारे सामने खड़ा
है..मैं इस कल्पना में अक्सर सोचता हूं कि कितना अच्छा हो जब देश के हर कोने
में ऐसा तिरंगा हो जिसे लोग राष्ट्रभक्ति का गवाह मानकर उसका सम्मान करें और
कुछ भी गलत करते हुए डरें भी..तब क्या इस शहर में, देश में सीसीटीवी कैमरे,
पुलिस और राष्ट्रभक्ति का सर्टिफिकेट जारी करनेवाले चैनलों की जरूरत रह जाएगी
? देश के कितने संसाधनों की बचत होगी. सेंट्रल पार्क के तिरंगे को मैं इसी रूप
में देखना-समझना चाहता हूं. तिरंगे के जरिए शहर की सुरक्षा.

करीब ढाई- तीन घंटे तक कनॉट प्लेस इलाके में रहा और झंड़ा उसी हाल में रहा.
मेरी तरह शायद बाकी लोग भी जिन्हें इस तिरंगे से बेहद प्यार है, जो बचपन में
बांस की तिल्ली मे अटके, हाथ में लहराते हुएष कॉलेज के दिनों में पीतल की बैज
बनकर सीने पर चिपक गया, दुख हो रहा होगा. वो भी कुछ करना चाह रहे होंगे लेकिन
वो मेरी तरह इस दुविधा में होंगे- हमने इसके प्रति प्यार दिखाया और भीड़ ने
हमें देशद्रोही करार दे दिया तो ? प्यार में अगर आशंका आ जाए तो उसे इजहार
करने में कितनी मुश्किल होती है न ?

‪#‎दरबदरदिल्ली‬
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[image: Vineet Kumar's photo.]
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