[दीवान]सोशल मीडिया ः नफरत की एक्सटेंशन
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Mon Jul 4 00:36:21 CDT 2016
वो मुझे मेरी मां को संबोधित करते हुए कई बार गालियां दे चुके हैं. शायद अब
मुझे और मेरी मां को जिसने मुझे पैदा करके कोख को लजाया है, गालियां देते-देते
थक गए हैं. वो गाली और नफरत के लिए प्रयोग करना चाहते हैं.
मैं बाकी लोगों की तरह इसके लिए सीधे-सीधे भक्त या दक्षिणपंथी शब्द नहीं लगाता
क्योंकि मेरे साथ ये काम उन्होंने भी किया है जिन्हें प्रगतिशील लोगों का
समर्थन हासिल रहा है और वो खुद कभी वामपंथी छात्र संगठन के सक्रिय कार्यकर्ता
रहे हैं..जब खुलेआम लिखा "मादरचोद" तो कई लोगों ने इनबॉक्स में आकर सुझाव
दिया- तुम्हें ऐसे लोगों को इग्नोर करना चाहिए. शायद ऐसा न करने से व्यावहारिक
जीवन का व्याकरण गड़बड़ाने लग जाए. हमने कई मौके पर देखा कि ये सलाह देनेवाले
लोग सार्वजनिक जगहों पर उनके साथ घूम-टहल रहे हैं. यानी कहीं कोई सार्वजनिक
बहिष्कार नहीं. आखिर मेरे लिए कोई ऐसा क्यों करेगा ? ऐसी गालियां बुरी है
लेकिन अगर किसी को दी जाए तो पूरा मामला पर्सनल हो जाता है. ऐसे में मुझे इस
बात को लेकर कोई दुविधा नहीं है कि गालियां देनेवाले लोग सिर्फ भक्त या एक खास
विचारधारा के लोग होते हैं. कोई भी हो सकते हैं. सोशल मीडिया पर सक्रिय बाकी
बुद्धिजीवियों की तरह मुझे ये सुविधा नहीं है कि गालियां देनेवाले, नफरत और
घृणा फैलानेवाले को चट से भक्त कहकर एक आम राय बनाने लग जाऊं.
अब देख रहा हूं कि नफरत का ये विस्तार मेरी होनेवाली संभावित बेटी तक हो चुका
है. मेरी अभी शादी नहीं हुई है. पता नहीं कल होती है तो मेरी पार्टनर बच्चे
रखना चाहेगी भी या नहीं लेकिन नफरत करने की सुविधा के लिए कुछ लोगों ने मेरी
जिंदगी में अभी से ही बेटी को जन्म दे दिया है.
हम अब तक सौन्दर्य और सरोकार के लिए कल्पना का विस्तार करते रहे हैं लेकिन
सोशल मीडिया के जरिए नफरत का विस्तार करने में जुटने लगे हैं. मैं उस बेटी का
संभावित पिता होने की कल्पना से ही कांप जाता हूं जिसका इस धरती पर आने की अभी
दूर-दर तक कोई संभावना नहीं है. जिनकी बेटियां हैं, जो सोशल मीडिया पर सक्रिय
हैं, वो सच में कितना हिम्मत रखते हैं.
मेरी मां सोशल मीडिया पर मेरे लिए लिखी गई गालियों को पढ़कर पहले आहत होती है,
फिर रूककर कहती है- जाने दो, देने से देह में लग थोड़े गया, तुम अपना काम
करो..बेटियों का पिता अपनी बेटियों को क्या और कैसी ट्रेनिंग दे रहे हैं इन
सबको लेकर, शेयर कीजिएगा..
हमने अपने जीवन, करियर, परिवार को लेकर कोई प्लानिंग नहीं की है. जिसे सभ्य
समाज सेटेल्ड लाइफ कहता है- मेरे दिमाग में उसका खाका ही नहीं है. किस स्तर पर
सेटेल्ड लाइफ- साधन-सुविधा के स्तर पर या मन के स्तर पर, भावना के स्तर पर ?
बस दिमाग में एक ही बात रहती है, जो है, जैसा है बेहद खूबसूरत है, बस
आखिर-आखिर तक ऐसा ही निभ जाए..फिर भी नफरत के इस विस्तार ने इधर कुछ दिनों से
भीतर एक संभावित बेटी का पिता होने का बोध पैदा कर दिया है. मैं आपके शेयर किए
जाने के बाद उस संभावित बेटी से संवाद करना चाहता हूं. उस मासूम से जो असल
जिंदगी में शायद मुझ जैसे शख्स की बेटी होने पर बेहद अफसोस भी करे.
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