[दीवान]दार्शनिक- आचार्य नवज्योति सिंहं : पहला परिचय

kamal mishra kissakhwar at gmail.com
Thu Jul 28 05:57:00 CDT 2016


पिछला पोस्ट पढ़ कर मेरे एक बेहद अज़ीज दोस्त ने लिखा है कि-

"वीडियो देख लिया, मगर वो बात समझ नहीं पाया जो तुम कहना चाह रहे हो। आधुनिकता
और तकनीकी का एक दूसरे से कितना करीबी संबंध रहा था ? अगर भाप की क्रांति और
औधोगिक क्रांति न हुयी होतीं तो क्या आधुनिकता भी न होती ? पारंपरिक ज्ञान और
दस्तकारों का ज्ञान एक ही चीज है या अलग-अलग?"


*A nation's treasure is its scholars. --- Yiddish proverb*

2016-07-27 17:07 GMT+05:30 kamal mishra <kissakhwar at gmail.com>:

> वैश्वीकरण के मौजूदा बवंडर में और कुछ नहीं तो इतना तो आप भी मानेंगे कि
> हिंदुस्तानी मूल का हर अमेरिकी जरुरी नहीं कि ट्रंप का ही वोटर हो जाए। फिर
> अमेरिका में पीएचडी करने के बाद वहीं के हो कर रह गए
> हिंदुस्तानी अप्रवासियों के पास भी एक दूसरा विकल्प-- मिसेज क्लिंटन का
> समर्थक बन जाना-- तो है ही! खैर जहाँ तक मैं समझता हूँ तो ग्रीन- कार्ड धारक
> बहुतेरे अप्रवासी तो इस फालतू के फल्लड़ में पड़ना ही नहीं चाहेंगे।
> वैसे चुनावी प्रक्रिया के शामिल-बाजे पर थिरकना कोई अनैतिक या गलत काम बिलकुल
> भी नहीं है। आखिर तो सबको अपने-अपने जुनून के हिसाब से चुनने और जीने की
> सहूलियत मिलनी ही चाहिए।
>
> मगर भारत जैसे विकसित होते मुल्क की राजधानी के अतरे में बैठ कर सोचते हुए एक
> बुनियादी सवाल तो यह भी उठता है कि जिन्हें हम पारंपरिक ज्ञान की पद्धतियों का
> साकार-रूप कहते आये हैं क्या उन "विधाधरों"  के पास भी आधुनिकता का ग्रास बनने
> से इंकार करने, कॉरपोरेट पूँजी की मार से बच निकलने, और राज्य की सर्वग्रासी
> सत्ता के प्रतिवाद में समरथ हो पाने जैसे न्यूनतम विकल्प भी भला आज की दुनिया
> में कहीं मौजूद हैं?
>
> फिर हमारे परंपरागत ज्ञानियों की इस त्रासद विकल्प-हीनता से जुड़ा एक दूसरा
> ग़ौर -तलब पहलू वो विशिष्ट ज्ञान-कांड भी है जिसमे, हमें, खास तौर से दक्ष
> बनाने के लिए विश्वविद्यालय जैसी पश्चिम- अभिमुखी ज्ञान-उत्पादक संस्थाओं की
> बड़ी भारी ऐतिहासिक भूमिका रहती आयी है।
>
> बहरहाल, तीसरी दुनिया से संबंध रखने वाले (और पश्चिम के भी) कई एक
> नामी-गिरामी बुद्धिजीवियों ने देश- दुनिया में जारी ज्ञानोत्पादन की
> प्रक्रिया को अक्सर 'सत्ता' और मूल्यों से बिलगा कर देखने की हमारी अपनी भोली
> सोच पर तीखे सवाल खड़े किये हैं। मिसाल के लिए, आधुनिकता की मुक्तिदायनी
> पश्चिमी परियोजना के सबसे मुखर आलोचकों में से एक तो हमारे अपने जाने- माने
> विद्वान आशीष नंदी ही हैं।
>
> मगर सारी दुनिया के विद्वान कमोबेश यह मानने लगे हैं कि पश्चिम की आलोचना
> करने भर से कुछ खास होने जाने वाला नहीं है। तब, वैकल्पिक आधुनिकता की खोज के
> अलावा भी, ज्ञानोत्पादन या चिंतन पर पश्चिमी वर्चस्व के मुकाबले अपनी निज
> की विचार पद्धतियों में जीवन- जगत को समझने- समझाने और आधुनिकता जनित बेहद
> जटिल प्रश्नों के हल निकालने जैसी संभावनाओं की तलाश में आज चौतरफा कोशिशें
> जारी है।
>
> इस लिहाज से भारतीय सन्दर्भ पर नजर डालते हुए जरूर थोड़ी निराशा होती है।
> क्योंकि अपेक्षा के उलट यहाँ के बौद्धिक जगत का नजारा कुछ अलग ही दिखायी देता
> है। रति- कर्म से बिंब उधार लेते हुए कहूँ तो यहाँ एक तरफ तो वे अंग्रेजीदां
> बुद्धिजीवी हैं जिन्होंने लंबे समय से हमारी परंपरागत ज्ञान धाराओं को
> मुख-मैथुन के लिए विवश करने और, इस तरह से उसकी 'गैगिंग' या, अपनी जबरपेलई से
> उनका मुहँ बंद करने का प्रयास किया है। दूसरी तरफ़ यहाँ वो हिंदुत्ववादी
> बौद्धिक हैं जिन्हें हमारी परंपरागत ज्ञान-धाराओं के साथ सिर्फ और सिर्फ गुदा-
> मैथुन में दिलचस्पी है। ऐसे हिंदुत्ववादी विचारक आपको हर बात पर "पीछे की तरफ"
> अश्लील ईशारा करते और फिर अपनी उस निर्लज्ज हरकत पर चहुँओर इठलाते बारहां मिल
> जायेंगे।
> कहना नहीं होगा कि ऐसे परिदृश्य में परंपरागत ज्ञान धाराओं के साथ रचनात्मक
> संसर्ग में निरत बौद्धिक दुर्लभ ही हैं। फिर उन से भी दुर्लभतर हैं वो जो
> परंपरागत ज्ञान धाराओं में पारंगत व्यक्तियों और समूहों के सशक्तिकरण की दिशा
> में भी सोच सकें। मतलब पारंपरिक ज्ञान की शक्ति में जिन्हें न सिर्फ विश्वास
> हो बल्कि ऐसे बौद्धिक जो नए शहराती सन्दर्भों में पारंपरिक ज्ञान की विरासत को
> बरक़रार रखने और आगे बढ़ाने की चुनौती को भी खुले तौर से स्वीकार करते हों।
> दार्शनिक-आचार्य नवज्योति सिंह ऐसा ही एक विलक्षण व्यक्तित्व है। अगर यकीन
> नहीं तो आप खुद देख-सुन कर तसल्ली कर लें -
> https://www.youtube.com/watch?v=cvbr_0qm7ZQ
>
>
>
> *A nation's treasure is its scholars. --- Yiddish proverb*
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