[दीवान]योग करने पर हम नहीं, हमारा शरीर बोलता है
vineetdu at gmail.com
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Tue Jun 21 23:13:10 CDT 2016
योग करने पर हम नहीं, हमारा शरीर बोलता है :
योग, जिम, वॉक, डाइनिंग...शरीर को बेहतर रखने के ये वो तरीक़े हैं जिसे ईमानदारी से किए जाएँ तो अलग से छापा मार टीशर्ट पहनकर दुनिया को बताने की ज़रूरत नहीं पड़ती. लोग आपके शरीर को देखते ही पूछने लग जाते हैं- आप योग करते हो, आपने जिम ज्वाइन किया है, आप डाइट चार्ट फ़ॉलो करते हो..?
ये सारी बातें मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव पर कह रहा हूँ.
आज के अखबार में विश्व योग दिवस रियलिटी शो के मौक़े पर शामिल राजनीति,सिनेमा, कॉर्पोरेट के चेहरे की तस्वीरें देख रहा हूँ. उनका शरीर देखकर ही अंदाज़ा लग जा रहा है कि वो 21 जून के अलावा योग क्या, आहार-विहार तक ख़्याल नहीं रखते, हीं, बुरी तरह जंक फ़ूड के शिकार हैं.
कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिनकी ब्रांडिंग करते समय डिस्प्ले का ख़ास ख़्याल रखना ज़रूरी होता है. मैं कभी डीयू यूनिवर्सिटी रिज मॉर्निॉग वॉक के लिए जाया करता था. बिना किसी जान-पहचान के लोग राम-राम बाउजी करके आगे बढ़ते. उनमें से कई लौटकर मेरे ही हॉस्टल ग्वायर हॉल की कैंटीन में आकर जमकर कचौरी, सब्ज़ी, ब्रेड-बटर, छोले-भटूरे खाते, ठहाके लगाते. वो रोज़ आते लेकिन उनकी टमी घटने के बजाय और बढ़ती जाती.
सरकार को चाहिए कि जब वो दुनियाभर में योग की रिब्रांडिंग कर रही है तो साथ ही साथ डाइट चार्ट पर ज़ोर दे. वो लोगों को क़ायदे से बताए कि क्या और किस मात्रा में खाना चाहिए. और ये डाइट चार्ट भी लोगों की आर्थिक क्षमता, सामाजिक स्थिति और भौगोलिक संदर्भ के अनुरूप हो.
नहीं तो योग जिसका संबंध हमारे शरीर, मन और आहार-व्यवहार से है, बाज़ार और राजनीतिक प्रबंधन का हिस्सा तो बनता चला जाएगा लेकिन एक-दूसरे का शरीर और व्यवहार देखकर योग के प्रति ललक पैदा नहीं कर सकेंगे. योग न करने पर हमसे पहले हमारा शरीर झूठ बोलता है.
मेरे लिए योग का असर तब दिखेगा जब संसद सत्र के दौरान सांसदों को अपनी सीट से इत्मिनान से बात करते हुए सुन सकूँगा. जब पब्लिक स्फीयर में बिना किसी धमकी, उत्तेजना और उत्तेजना के लोगों से व्यवहार कर सकूँगा. मेट्रो में, बसों में माँ-बहन की गालियों के बजाय हर हाथ में किताबें होंगी. एक शांत, मेहनतकश और संवेदनशील समाज के बीच हम जी सकेंगे. योग कोई एकदिवसीय इवेंट नहीं, जीवन पद्धति के रूप में मौजूद होगा.
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