[दीवान]कन्हैया! ये वीडियो तुम्हारे लिए अपलोड किया है

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Sat Mar 5 10:01:53 CST 2016


कन्हैया ! मैं तुम्हें अपने सबसे प्रिय कवि कुँवर नारायण की कविता का चरित्र
नचिकेता के रूप में बिल्कुल नहीं देख रहा, तुम्हारे अलावा किसी और रूप में
तुम्हें देखा जाना मुझे पसंद भी नहीं..जेएनयू के साथियों ने जब तुम्हारे लिए
हाथी घोड़ा पालकी,जय कन्हैया लाल की के नारे लगाए तो थोड़ा आहत भी हुआ- कहाँ
ज़मीन से जुड़े कन्हैया को सूट-बूट वाली सरकार के आगामी कैंडिडेट में पोर्ट्रे
करने में लोग लगे हुए हैं लेकिन इसे कॉमरेडों के जनमानस की अभिव्यक्ति मानकर
फिर सहज ह गया.
मैं तुम्हें राहुल गांधी का विकल्प, जुमलेबाजों के हाथ से औज़ार छिननेवाले के
तौर पर स्थापित करनेवाला मैं भला कौन होता हूँ ? न ही मैं कभी ये दावा कर सकता
हूँ कि ये दौर आ गया है कि अब मेलोड्रामैटिक भाषण और राजनीतिक तर्क के बीच
फ़र्क़ किया जाने लगेगा. मैं न्यूज़ चैनलों की तरह तुम्हारी मसीहाई छवि नहीं
गढ सकता जिससे कि आगे सत्ता केअनुकूल तुम्हें बताने में सहूलियत हो.

मैंने तुम्हारे लिए रामगोपाल बजाज की आवाज़ में कुँवर नारायण की ये कविता बस
इसलिए अपलोड की है कि तुमने अपने कल के भाषण में राष्ट्रनायक का जो ख़ाका
खींचा था उसकी शक्ल इस कविता के पिता से हुबहू मिलती है.

व्हील चेयर पर बैठे,एक व्यक्ति की मदद से जब मैंने रामगोपाल बजाज को मंच पर
आते देखा तो एकबारगी तो यक़ीं ही नहीं हुआ कि ये कविता पाठ कर भी पाएँगे लेकिन
जब पढ़ना शुरू किया तो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सभागार अभिमंच से कणों के
आपस में टकराने की आवाज़ आ रही थी. ठीक वैसे ही ही जैसे तुम्हारी आवाज़ से
मेरे टेलीविजन स्क्रीन पर जमी धूल झड़ने लगी थी. तुम जेल से आए थे,बजाज साहब
बीमारी से आधे-अधूरे बीमारी से..लेकिन आवाज़ दोनों की एक सी


कन्हैया ! मैं तुम्हें अपने सबसे प्रिय कवि कुँवर नारायण की कविता का चरित्र
नचिकेता के रूप में बिल्कुल नहीं देख रहा, तुम्हारे अलावा किसी और रूप में
तुम्हें देखा जाना मुझे पसंद भी नहीं..जेएनयू के साथियों ने जब तुम्हारे लिए
हाथी घोड़ा पालकी,जय कन्हैया लाल की के नारे लगाए तो थोड़ा आहत भी हुआ- कहाँ
ज़मीन से जुड़े कन्हैया को सूट-बूट वाली सरकार के आगामी कैंडिडेट में पोर्ट्रे
करने में लोग लगे हुए हैं लेकिन इसे कॉमरेडों के जनमानस की अभिव्यक्ति मानकर
फिर सहज ह गया.
मैं तुम्हें राहुल गांधी का विकल्प, जुमलेबाजों के हाथ से औज़ार छिननेवाले के
तौर पर स्थापित करनेवाला मैं भला कौन होता हूँ ? न ही मैं कभी ये दावा कर सकता
हूँ कि ये दौर आ गया है कि अब मेलोड्रामैटिक भाषण और राजनीतिक तर्क के बीच
फ़र्क़ किया जाने लगेगा. मैं न्यूज़ चैनलों की तरह तुम्हारी मसीहाई छवि नहीं
गढ सकता जिससे कि आगे सत्ता केअनुकूल तुम्हें बताने में सहूलियत हो.

मैंने तुम्हारे लिए रामगोपाल बजाज की आवाज़ में कुँवर नारायण की ये कविता बस
इसलिए अपलोड की है कि तुमने अपने कल के भाषण में राष्ट्रनायक का जो ख़ाका
खींचा था उसकी शक्ल इस कविता के पिता से हुबहू मिलती है.

व्हील चेयर पर बैठे,एक व्यक्ति की मदद से जब मैंने रामगोपाल बजाज को मंच पर
आते देखा तो एकबारगी तो यक़ीं ही नहीं हुआ कि ये कविता पाठ कर भी पाएँगे लेकिन
जब पढ़ना शुरू किया तो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सभागार अभिमंच से कणों के
आपस में टकराने की आवाज़ आ रही थी. ठीक वैसे ही ही जैसे तुम्हारी आवाज़ से
मेरे टेलीविजन स्क्रीन पर जमी धूल झड़ने लगी थी. तुम जेल से आए थे,बजाज साहब
बीमारी से आधे-अधूरे बीमारी से..लेकिन आवाज़ दोनों की एक सी ..


https://www.youtube.com/watch?v=kMheyhv4ocg&feature=youtu.be
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