[दीवान]नक्सली_पीड़ितों_का_दर्द_कौन_लिखेगा_बेला_भाटिया!
kamal mishra
kissakhwar at gmail.com
Wed Mar 30 23:51:42 CDT 2016
भाई अंशु जी, आप ने तो बेला भाटिया और ज्यां द्रेज को नक्सल साबित करने में
अपनी पूरी प्रतिभा ही ठेल दी। दिक्कत बस इतनी है कि बेला भाटिया और ज्यां
द्रेज का कद बहुत बड़ा है और आपका पोस्ट पढ़ कर साफ पता चलता है कि कुदरत ने
प्रतिभा के मामले में आप के साथ बहुत बड़ा मजाक किया है। वरना कई महीने
पहले अशोक बाजपेई ने 'नकार' का किसको क्या मतलब समझाया उसे ही आधार बना कर आप
यहाँ हर दूसरे व्यक्ति को नक्सल होने की सनद न बाँट रहे होते ! खैर प्रतिभा से
वंचित होने के बावजूद भी नक्सलवाद का हो- हल्ला मचा आज बहुतेरे 'लिख लोढ़ा, पढ़
पत्थर' छत्तीसगढ़ से दिल्ली तक में अपनी रोज़ी -रोटी चला ही रहे हैं। मगर मेरे
भाई दीवान का कुछ तो लिहाज रखिये। बुद्धिजीवी होने का भरम रखना बुरा नहीं है,
लेकिन ये समझना कि आप कहीं भी कुछ भी बोल कर साफ निकल जायेंगे ठीक नहीं हैं।
और वो भी उस बेला भाटिया के ख़िलाफ़ जो दिल्ली की अपनी बेहद सुविधापूर्ण जिंदगी
छोड़ कर आदिवासियों पर होने वाले अत्याचार का विरोध करने के लिए उस समय से
छत्तीसगढ़ में मौजूद हैं जब केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार हुआ करती थी।
चलिए खुर्शीद अनवर के बहाने बलात्कार के मामले में जाँच पूरी करने और आरोप
साबित होने तक किसी को बलात्कारी न ठहराने की बात अगर मैं कुछ देर को मान भी
लूँ। तो समस्या ये है कि जहाँ राज्य खुद अपने नागरिकों से युद्ध में उतर पड़ा
है वहाँ भला हम किसे वकील करें और किससे मुंसफी चाहें? कहने का मतलब ये है कि
श्री लंका में लिट्टे से लड़ने के नाम पर अगर तमाम बेगुनाह तमिलों के साथ
अन्याय हुआ तो वो किसी से छुपा नहीं है, लेकिन मानवाधिकारों का खुल कर
हनन करने वाले देशभक्त सैनिकों पर क्या वहां अब तक कोई कारवाही हुई ? लेकिन इस
सब से आप को भला क्या मतलब है ? आप तो बस लगे हाँथ ओम थानवी से ले कर सईद नकवी
और अरुंधति रॉय पर एक फ़तवा दे डालिए।
हाँ, ये बड़ी बहन का ख़िताब लेकिन आप बेला भाटिया को ही दीजिये, क्योंकि तमाम
प्रचार के बावजूद अरुंधति खुद तो रहती और जीती दिल्ली की सुविधाभोगी जिंदगी ही
हैं। बेला भाटिया
जैसे लोग बिरले होते हैं , जो सीएसडीएस की सुविधापूर्ण कुर्सी छोड़ कर जन
प्रतिबद्धता के निमित्त बस्तर में सालों तक एक किराए के मकान में बसर करते
हैं। खैर मैं आप से उनके त्याग का रत्ती भर सम्मान करने की आशा नहीं रखता।
लेकिन सुरक्षा बलों के कुकर्मों की जाँच पर आप का बड़ा जोर है इस लिए यह बता
देना चाहता हूँ कि दिल्ली की एक शोधार्थी ने जो पिछले दिनों छत्तीसगढ़ से फील्ड
वर्क कर के वापस लौटी है मुझसे अनौपचारिक बातचीत में इस बात का भी जिक्र किया
था कि अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती के इलाके में हाल फिलहाल पैदा हुए अनेक
बच्चों के नयन नक्श ही यह बताने के लिए काफी हैं कि वो बलात्कार से पैदा हुई
पीढ़ी की संताने हैं। बाकी नक्सल विरोधी अभियान में सैन्य बल कितनी मुस्तैदी से
लगा हुआ है यह तो हम सब अख़बारों में आये दिन पढ़ते ही रहते हैं।
2016-03-30 15:06 GMT+05:30 Ashish Kumar 'Anshu' <ashishkumaranshu at gmail.com>
:
> एनजीओकर्मी खुर्शीद अनवर पर जब पूर्वोत्तर भारत की एक एक्टिविस्ट ने बलात्कार
> का आरोप लगाया था, उसी आरोप के आधार पर एक खबरिया चैनल ने खुर्शीद को अपने
> प्राइम टाइम के प्रसारण में ‘बलात्कारी’ कहकर संबोधित कर दिया. ‘बलात्कारी’
> संबोधन से देश भर के कम्यूनिस्ट सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धीजीवी, प्रोफेसर,
> पत्रकार बौखला गए. उन्होंने इस घटना के बाद एक बहस छेड़ दी कि जब तक किसी पर
> बलात्कार साबित ना हो जाए तब तक क्या उसे बलात्कारी कहना सही होगा? इस पूरी
> मुहिम का नेतृत्व ‘जनसत्ता’ के पूर्व संपादक ओम थानवी ने किया. खुर्शीद वैसे
> कई लोगों से आपसी बातचीत में कह चुके थे कि यदि वह लड़की सामने से आकर खुद कहे
> कि मैंने उसके साथ बलात्कार किया है तो मैं इस अपराध को कुबूल कर लूंगा. उनको
> इस बात का यकिन नहीं रहा होगा कि कथित पीड़िता यह साहस कर पाएगी. वे गलत साबित
> हुए और एक दिन कथित पीड़िता ने मीडिया के कैमरे के सामने खड़े होकर यह बयान दे
> दिया कि खुर्शीद अनवर ने उसके साथ बलात्कार किया था. इस सदमे से खबर आने के
> अगले दिन ही खुर्शीद ने खुदकुशी कर ली. इसे कुछ बड़े पत्रकारों ने मीडिया
> ट्रायल का नाम दिया. कुछ एक्टिविस्ट और प्रोफेसर किस्म के लोगों ने यह भी कहा
> कि खुर्शीद मीडिया ट्रायल के शिकार हुए हैं.
>
> इन सारी बातों का जिक्र आज इसलिए कर रहा हूं कि इसी तरह का मीडिया ट्रायल
> कॉमरेड बेला सामरी भाटिया ने जगदलपुर से रिपोर्टिंग करते हुए किया. लेकिन किसी
> कम्यूनिस्ट पत्रकार, प्रोफेसर, बुद्धीजीवी को इस पर आपत्ति नहीं है. बल्कि
> ज्यां द्रेज को एक वेवसाइट पर अपने आलेख में बताना पड़ा कि वे और बेला
> नक्सलियों के लिए काम नहीं करते.
> प्रोफेसर अशोक वाजपेयी ने सहिष्णुता-असहिष्णुता की एक बहस के दौरान प्रवीण
> शुक्ल नाम के एक युवक को जिसने प्रोफेसर वाजपेयी से कहा था कि उसका आरएसएस से
> कोई संबंध नहीं है, बड़े प्यार से समझाया था- ‘जो यह कहता है कि मैं यह नहीं
> हूं. वह वही होता है. इस बात में संदेह करने वाली कोई बात नहीं होती.’ युवक
> प्रवीण शुक्ल के लिए जो फॉर्मुला प्रोफेसर अशोक वाजपेयी ने बनाया था, वह बेला
> भाटिया और ज्यां द्रेज पर भी लागू होता ही होगा.
>
> अब बेला भाटिया की रिपोर्टिंग पर थोड़े विस्तार से बात करते हैं. बेला ने 40
> आदिवासी महिलाओं से बातचीत के आधार पर अपने लंबे लेख में यह साबित किया है कि
> छत्तीसगढ़ के सुरक्षाकर्मियों ने उनके साथ बलात्कार किया है. जबकि अभी इस मामले
> की जांच पूरी नहीं हुई है. जांच तो बड़ी बात है, अभी अपराधियों की शिनाख्त होना
> भी शेष है. बेला की स्टोरी पढ़कर यह भी स्पष्ट नहीं होता कि क्या कथित तौर पर
> 40 आदिवासी बलात्कार पीड़िता महिलाओं के साथ मेडिकल के बाद बलात्कार की पुष्टि
> हो चुकी है या नहीं?
>
> खुर्शीद मामले में सक्रिय ओम थानवी - तीस्ता सीतलवार - सईद नकवी - अरूंधति
> राय सरीखे एक्टिविस्ट-पत्रकार क्या बेला से पूछ सकते हैं कि बस्तर से बयान के
> आधार पर सनसनी रिपोर्टिंग का उनका मकसद क्या था? क्या वह अपनी रिपोर्टिंग से
> सनसनी फैलाना चाहती थीं? यदि यह मकसद था तो वह काफी हद तक इसमें सफल रही हैं.
> कथित बलात्कार पीड़िता महिलाओं की बात को रिकॉर्ड करके हंगामा स्टोरी बनाने की
> जगह बेला यदि उन अपराधियों तक पहुंचने का प्रयास करतीं, जो दोषी हैं तो उनकी
> कहानी मुकम्मल हो पाती. उनकी स्टोरी की हाहाकार और ललकार को पढ़कर यही समझ आता
> है कि उनका मकसद आदिवासी महिलाओं के दर्द को कम करना ‘कम’ था, बल्कि भारतीय
> सुरक्षा बल को बदनाम करना अधिक था. हजारों की संख्या में सुरक्षाकर्मी
> छत्तीसगढ़ की सुरक्षा में लगे हुए हैं. यदि आप चालीस पचास कथित अपराधी
> सुरक्षाकर्मियों की पहचान का खुलासा नहीं करतीं, इसका मतलब तो यही होगा कि
> आपका मकसद कथित बलात्कार पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाना नहीं बल्कि भारतीय
> सुरक्षा बल को बदनाम करना था. जो ईमानदारी से बस्तर में अपना फर्ज निभा रहे
> हैं. नक्सली हमले में जो जान देने से पीछे नहीं हटते. बीजापुर से लेकर सुकमा
> तक जो नक्सली हमले में जान दे रहे हैं. बेला भाटिया क्यों आपके हजारों शब्दों
> की स्टोरी में नक्सलियों के हाथों शहीद हुए जवानों के लिए सहानुभूति के दो
> शब्द भी नहीं थे.
>
> अब छत्तीसगढ़ और बस्तर की आम जनता भी इस खेल को भली भांति समझने लगी है, इसी
> का परिणाम रहा होगा कि आपके किराए के घर के बाहर इतनी बड़ी संख्या में छत्तीसगढ़
> में विरोध प्रदर्शन हुआ. बेला कभी उनका दर्द भी लिखिए जिनका नक्सलियों के
> हाथों बलात्कार हुआ. जिन्होंने अपना सबकुछ नक्सलियों के हाथों खो दिया लेकिन
> उनका दर्द ना आप देख पाती हैं बेला और ना आपकी बड़ी बहन अरूंधति.
>
> http://www.ichowk.in/society/bela-bhatia-report-tribal-women-of-chattisgarh-were-raped/story/1/3019.html#
>
>
>
> <https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10157017178345157&set=a.264159200156.305779.780640156&type=3>
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