[दीवान]नोट- बदली से हो रही गरीबों की फ़ज़ीहत, और राहुल गाँधी का 'मास्टरस्ट्रोक'

kamal mishra kissakhwar at gmail.com
Sun Nov 13 05:33:48 CST 2016


आपकी प्रतिक्रिया के लिए बेहद शुक्रगुजार हूँ !!
 जी हाँ, घर में पड़ी सब नकदी काला धन ही हो ये जरुरी नहीं। ठीक वैसे ही
जैसे बैंक में पहले से जमा सारा पैसा ईमानदारी और मेहनत से ही कमाया गया हो ये
भी जरुरी नहीं! वैसे इस पोस्ट में मेरी मुराद बस उस रक़म से है, जिस पर टैक्स न
भरा गया हो, और जिसके आय का कोई लेखा-जोखा भी न रखा गया हो। रही बात राहुल
गाँधी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताने (या बनाने) की तो इस बारे में
सिर्फ इतना ही कह सकता हूँ कि अपनी तुच्छ हैसियत को ले कर मुझे किसी किस्म
की खुशफ़हमी पालने का जरा भी शौक नहीं है। मगर भारतीय राजनीति के मैदान में
जनमत को बनाने बिगाड़ने की कोशिश में जुटे राजनेताओं से ख़ासकर जनसामान्य जैसे
संयत व्यवहार की अपेक्षा ऐसे किसी मुश्किल दौर में रखता है, उसकी एक झलक
हम पहले राहुल गाँधी के स्वयं लाइन में जा खड़े होने, और पीछे से उनके
कार्यकर्ताओं के नाम जारी वीडियो सन्देश में भी साफ देख सकते हैं। अब आप इसे
अगर 'मास्टर' राहुल का 'स्ट्रोक' कहना चाहें तो मुझे इस पर कोई विशेष आपत्ति
नहीं है। लेकिन जहाँ तक खुद मेरे शब्दों के चयन का प्रश्न है तो असमाधेय
अंतर्विरोधों की जितनी और जैसी भी समझ मेरी अपनी एक लंबे समय के दौरान बनी है,
उसके हिसाब से मुझे तो यह उनका 'मास्टरस्ट्रोक' ही लगता है।

*A nation's treasure is its scholars. --- Yiddish proverb*

2016-11-13 16:15 GMT+05:30 iMentor Studio <delhi.yunus at gmail.com>:

> कमल जी
>
> घर में कैश रखना कदापि ग़ैर क़ानूनी नहीं है।
> काले धन को लेकर जिस क़दर बचकाना समझ के साथ क़दम उठाया गया है, शायद आपको
> 'मास्टर' राहुल का स्ट्रोक लिखना पड़ेगा न कि मास्टरस्ट्रोक।
>
> या फिर  आप उन्हें प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में सामने रखना चाहते
> हैं?
>
> धन्यवाद्
> On 11-Nov-2016 8:23 PM, "kamal mishra" <kissakhwar at gmail.com> wrote:
>
>> प्रधान मंत्री द्वारा दो दिन पहले पाँच सौ और हजार रुपये के नोटों को बंद
>> किये जाने की घोषणा के बाद से हर तरफ़ एक अफ़रा- तफ़री का माहौल है। जाहिर है
>> कालेधन, भ्रष्टाचार और जाली मुद्रा के खिलाफ़ जारी अपने 'महायज्ञ' में देश की
>> जनता से सार्थक भागीदारी का जो प्रस्ताव मान्यवर प्रधानमंत्री जी ने किया है,
>> उसमें होम करते हुए सिर्फ भ्रष्टाचारियों के ही हाथ नहीं जल रहे हैं! आम अवाम
>> को भी इस बीच काफी दुश्वारी झेलनी पड़ रही है। अब भाजपा मंत्री महेश शर्मा जी
>> के अस्पताल सहित दूसरे तमाम अस्पतालों में भर्ती मरीज़ हों, या फिर शुक्रवार
>> को एटीएम से पैसे निकलने की उम्मीद लगाए बैठे लोग सब कहीं न कहीं इस आकस्मिक
>> सरकारी फैसले से परेशान नजर आ रहे हैं।
>> देखते- देखते बाजार की रौनक ग़ायब हो गयी है। और लोगों की जेब खाली होने के
>> चलते बाजारों में दुकानदार भी निठल्ले बैठे नजर आ रहे हैं। इस सब के बीच आज
>> मुनिरका में बाद दोपहर एक और हंगामा देखने में आया। इनकम टैक्स विभाग के लोग
>> छापेमारी के लिए मुनिरका आ रहे हैं, या कुछ ऐसी ही सुगबुगाहट फैलने के साथ
>> ही धड़ाधड़ दुकानों के शटर गिरने लगे और पलक झपकते ही गली मोहल्ले की सारी
>> दुकाने बंद हो गयीं। हालाँकि राजेन सुरीन की वो रसोई जहाँ मैं दोपहर का खाना
>> खाने जा रहा था खुली ही रही। मगर वहां पहुँचने पर पता चला कि रोटियां नहीं मिल
>> पाएंगी। दरअसल आटा ख़त्म होने के बाद वहां राजेन अपनी पत्नी पर बेवजह झल्ला रहे
>> थे। स्थिति की गंभीरता को समझने में मुझे थोड़ा वक्त लगा, जिसके बाद मैंने अपनी
>> तरफ से ये प्रस्ताव किया कि मेरे बटुए में जो आख़री सौ रुपए का नोट बचा है
>> फ़िलहाल उससे आटा ला कर रोटी बनायी जाये ताकि पेट की आग कुछ तो कम हो। मेरा यह
>> प्रस्ताव सुन कर बेहद स्वाभिमानी राजेन, जो मूलतः झारखंड के रहने वाले आदिवासी
>> हैं, को बिलकुल अच्छा नहीं लगा। और उनकी पत्नी भी तुरंत ही बोल पड़ी कि नहीं
>> भईया आप तो बस दस या बीस रुपये भर दे दीजिये बाकी मै इंतजाम कर लेती हूँ।
>> खैर जब वो आटा लाने बाहर गयीं तो राजेन ने अपना दर्द बयान करना शुरू किया कि
>> कैसे पिछले दो दिन से सभी लोग उधार ही ले जा रहे हैं। हम भी छात्रों को कुछ
>> नहीं कह रहे ये सोच के कि जब पैसे मिल जायेंगे तो वो दे ही देंगे। लेकिन जिस
>> आदमी के यहाँ से डेढ़ साल से हर रोज पचासों विद्यार्थियों को खिलाने के लिए नक़द
>> भुगतान कर आटा लाता हूँ आज वो भी उधार देने को राजी नहीं है। क्या करें ? घर
>> में कुछ पाँच सौ के नोट पड़े हैं पर अब यहाँ छात्रों को खाना बना कर खिलाएं या
>> बैंक जा कर हम लाइन लगाएं कुछ समझ में नहीं आ रहा ? इस पर जब मैंने नोट बदली
>> के मोदी सरकार के निर्णय पर राजेन की राय जाननी चाही तो उन्होंने फ़ौरन जाली
>> नोटों की बढ़ती समस्या के लिहाज से इसे 'जरुरी' ठहराया।
>> यकीन मानिये राजेन सुरीन की बात सुनते हुए मेरा दिल भर आया। सच बात है कि
>> इतनी मुश्किल घड़ी में भी वो पचासों विद्यार्थियों के लिए रोज अपनी रसोई से
>> दोनों वक्त का खाना परोस रहे हैं। ये ज्यादातर वैसे विद्यार्थी हैं जो पास में
>> ही एक मालिक- मकान द्वारा बनवाये 'स्टडी-रूम' में लगभग बारह सौ रूपये प्रति
>> छात्र की दर से महीने का भुगतान कर पढ़ने के लिए जमा हुआ करते हैं। शुरुआत में
>> पहले तल्ले पर चल रहा 'स्टडी रूम' इन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले
>> छात्रों में इतना लोकप्रिय हुआ कि एकाध साल बाद ही मालिक मकान ने अब दूसरा
>> फ्लोर बनवा कर वहां भी बीसियों छात्रों के बैठने की व्यवस्था कर दी है।
>> वैसे भी जब बगैर हाथ- पैर चलाये सिर्फ किराये से मिलने वाली लाखों रूपये
>> महीने की आय को "टैक्स फ्री" मानने का रिवाज़ समाज में गहरे तक जड़ जमाये हो,
>> तो रुपये कमाने का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता है ? तभी तो इस इलाके में
>> हजारों में शायद ही कोई एक ऐसा मकान मालिक हो जो अपनी आय को ठीक ठीक घोषित
>> करता और उसपे नियमित टैक्स भरता हो। लेकिन मोदी महराज के तमाशाई 'महायज्ञ' से
>> ऐसे धनिकों को कोई खास दिक्कत भी नहीं है। क्योंकि अव्वल तो बैंकों में
>> अधिकारियों से उनके संबंध बेहद मधुर हैं। दोयम ये कि उन्होंने टैक्स बचा कर जो
>> धन जमा किया है वो ज्यादातर तो प्रोपर्टी (याने रियल इस्टेट) और कमिटी (याने
>> चिट फंड) या स्वर्णआभूषणों में लगातार एक सुरक्षित निवेश पाता रहा है। आप कह
>> सकते हैं कि ये हमारे अपने आस पड़ोस से लिया हुआ महज एक छोटा सा उदहारण है जो
>> यह जताने के लिए काफी है कि कैसे काली कमाई नए नोट आने के बाद भी बदस्तूर जारी
>> रहने वाली है।
>> बहरहाल, नोट बदली के इस मोदी महायज्ञ से हक़ीक़तन हाँथ और मुहँ के बीच बसर
>> करने वाले किरायेदारों, छात्रों-युवाओं, और राजेन सुरीन जैसे मेहनतकश
>> परिवारों को तकलीफ और अंततः हताशा के सिवा और क्या मिलना है ? क्योंकि, मोदी
>> सरकार यह भूल गयी है कि नए नोट अपने आप ही काले धन की उत्पादक संरचना को
>> तो क्षत-विक्षत नहीं कर पाएंगे। फिर, भ्रष्टाचारियों से यह उम्मीद की नए नोट
>> आने के बाद वो भ्रष्टाचार बंद देंगे भी बिलकुल वाज़िब नहीं। हाँ, भाजपा
>> अध्यक्ष अमित शाह ने भले ही राहुल, मुलायम, और मायावती के बयानों पर उन्हें
>> आतंकवाद समर्थक बता कर अपनी कपटपूर्ण बुद्धि का एक बार पुनः दीदार करवाया हो।
>> सच्चाई यही है कि बड़े नोटों के बाजार में आते ही भारतीय अर्थव्यवस्था
>> की विरोधी शक्तियां उनकी भी प्रतिलिपियाँ तैयार करने में सक्रिय रूप से
>> लग जाएंगी। तब यह कहने की जरुरत नहीं कि इस सब के नतीजे से आज नरेंद्र मोदी
>> आयोजित 'महायज्ञ' में उनके ही आह्वाहन पर फौरी फ़जीहत झेल रहे गरीबों को
>> ही सबसे ज्यादा निराशा होगी। और वैसे निराशा से उपजे गुस्से की
>> सूरत में आश्चर्य नहीं अगर कल को बैंक की लाईन में आम अवाम के साथ खड़े नजर
>> आ रहे राहुल गाँधी का यह कदम भारतीय राजनीति की बिसात पर
>> उनका एक मास्टरस्ट्रोक साबित हो जाए।
>>
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