[दीवान]दुआ है, सबको शाजी जमां जैसे शिक्षक मिलेः
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Sun Oct 23 13:12:00 CDT 2016
पीथल सों मजलिस गई तानसेन सों राग
हंसवो, रमिवो, बोलिबाो, गयो बीरवर साथ..
सर..ये आपने हंसवो के बाद आगे क्या कहा था ? मैं दूर खड़ा तो सुन नहीं पाया.
लिखिए न..हंसवो, रमिवो,बोलिवो, गयो बीरवर साथ.. दरअसल अकबर कला, साहित्य और
अक्ल को इस कदर पसंद करते थे कि पृथ्वीराज चौहान, तानसेन और बीरवर( उस वक्त
बीरबल को वीरवर भी कहा जाता था) के जाने के बाद बड़ी ही तकलीफ में ये बात कही
थी..
8: 05 से अकबर पर शुरु होने और 10.10 तक बिना रूके, बिना किसी व्यावधान के
चलनेवाली शाजी जमां की क्लास की तासीर अभी भी मेरे जेहन में है. दिनभर ऑटो,
कैब, बस में शहर के एक छोर से दूसरे छोर तक भटकता रहा लेकिन वो दृश्य अब भी
आंखों में फ्रीज हो गई है जब वो मेरी उपर की पंक्ति पूछने पर खड़े होकर सीधे
कॉपी पर लिखवाने लग गए. इतिहास का ऐसा शिक्षक मुझे संत जेवियर्स कॉलेज में
फ्रैंकलिन बाखला मिले थे. बाद में उन्हें जब पता चला कि मैंने इतिहास के बदले
प्रयोजनमूलक हिन्दी में एडमिशन लेना तय किया है तो अफसोस से बोले- यॉर एफेक्शन
व्अर फॉर एक शॉर्ट स्पैम ऑफ टाइम. हिस्ट्री डिमांड्स लाइफ, यॉर इन्टायर लाइफ..
शाजी जमां से मेरी ये पहली मुलाकात थी. एक-दो बार प्रेस क्लब में बोलते भर
सुना है और पिछले चौदह सालों से मैं अपने स्तर पर मीडिया को जितना समझने की
कोशिश करता आया हूं, बहुत ही अनसंग हीरो की तरह काम करनेवाले संपादक के तौर पर
इनकी पहचान रही है. अब जब उनकी किताब अकबर आ रही है तो न्यूजरूम के बाहर के
लोगों के बीच भी अपने से होते जा रहे हैं.
ये बात कौन नहीं जानता है कि आज इंडिया हैबिटेट सेंटर ने पुराना किला में जो
हैरिटेज वॉक का आयोजन किया, वो उनकी किताब की प्रोमोशन का हिस्सा है. इससे
किताब चर्चा में आएगी और बिकेगी. हम जैसे लोगों के लिखे पर भी प्रोमोशन और
पीआर प्रैक्टिस की लेबल चस्पाने का इंतजाम पहले से है. लेकिन
वो दो घंटे की क्लास ? वो क्लास जिसमे वो एक-एक चीज को उस बारीकी के साथ हमारे
सामने पेश करते जा रहे थे कि मीडिया, फैशन, साहित्य के छात्रों के लिए बेहद
जरूरी क्लास थी. हमने इस दो घंटे में तो कम से कम दो दर्जन ऐसे शब्द सुने और
उसका अर्थ समझने की कोशिश की जो कि इससे पहले मेरी नजरों से नहीं गुजरे. इससे
पहले हमें किसी ने नहीं बताया कि टॉलरेंस सही शब्द नहीं है, असल में होना
चाहिए हॉर्मनी. इससे पहले हमें किसी ने नहीं बताया कि हिस्ट्री से कहीं ज्यादा
महत्वपूर्ण होते हैं फीडर हिस्ट्री. वो हिस्ट्री जिससे कि कई बार इतिहास का
मूल सीधे तौर पर प्रभावित होता है. इतनी दिलचस्पी के साथ मुगलों की पोशाक छोटी
हो जाने का संदर्भ नहीं बताया कि हुमायूं की मौत सीढ़ियों से लुढ़ककर हुई थी.
अकबर के दिमाग में कहीं न कहीं ये बात थी कि ये लंबी पोशाक के कारण भी हो सकती
है..उस आदमी के पास अद्भुत दिमाग रहा था और अक्लमंद की कद्र करना जानता था.
अकबर की तमाम खूबियों की चर्चा करने के दौरान साथ में ये भी जोड़ा कि शासकों
की दिलचस्पी सिर्फ और सिर्फ नाटकीय क्षणों को इतिहास में दर्ज करवाने की रही
है, परेशान करनेवाले मौके, एम्बेरेसिंग मोमेन्ट्स शामिल करवाने में नहीं.
शाजी जमां को दो घंटे तक धारा-प्रवाह अकबर पर बोलते, बीच-बीच में एक-एक शब्द
और संदर्भों की बारीकियों को ठहरकर समझाते हुए देखता रहा तो दिमाग में एक
ख्याल ये भी आता रहा- न्यूज चैनलों ने हमें बौद्धिक स्तर पर इतना निचोड़ लिया
और यहां काम करनेवाले अधिकांश लोगों ने अपनी हरकतों से हमारे भीतर एक ऐसी
स्थायी छवि तैयार कर दी है कि हम उससे कई बार चाहते हुए भी बाहर निकलकर देख
नहीं पाते..
शाजी जमां ऐसे अकेले संपादक नहीं हैं जिन्होंने न्यूजरूम जैसे बूचड़खाने में
रहकर मुगलकालीन इतिहास और साहित्य का गहन अध्ययन किया है.( ये भी उनके ही शब्द
हैं. उस वक्त आइबीएन7 में काम कर रहे मीडियाकर्मी शैलेन्द्र सिंह की मौत पर
प्रेस क्लब में जो शोक सभा आयोजित की गई थी, उन्होंने कहा था- न्यूजरूम में
खबरें मारी जाती हैं, ये न्यूजरूम नहीं बूचड़खाना है) मैं ऐसे आधे दर्जन से
ज्यादा लोगों को जानता हूं जो इसी न्यूजरूम में काम करते हुए पेंटिंग की गहरी
समझ रखते हैं, खुद भी अच्छे चित्रकार हैं. जबरदस्त खाना बनाते हैं और दुनियाभर
की खानपान की संस्कृति की गहरी समझ है. विश्व साहित्य का जानकार है...और भी
बहुत कुछ
लेकिन चूंकि वो हमारे-आपके सामने क्या एलियन गाय का दूध पीते हैं जैसी खबरें
प्रसारित करते हैं तो न तो हम उनकी काबिलियत का अंदाजा लगा पाते हैं और न ही
उनका व्यक्तिगत स्तर पर अर्जित ज्ञान टीवी के जरिए पहुंचकर कुछ बेहतर हो पाता
है. पेशे की मजबूरी का हवाला देकर और खबरों के बिजनेस पैटर्न के बीच पिसकर
उनका ज्ञान स्वांतः सुखाय तक सीमित रह जाया करता है. ऐसे में कोई इन सबके बीच
से शिक्षक की भूमिका में आ जाए तो सुखद अनुभूति तो है ही.
ऐसे में प्रोमोशन की ही नीयत से सही, मीडिया से आनेवाले लेखक अपनी आनेवाली
किताब पर व्यवस्थि ढंग से कक्षाएं आयोजित कर रहा हो. उस विषय के प्रति हमारी
दिलचस्पी पैदा कर रहा हो तो ऐसे प्रोमोशन एप्पको की देशभक्ति से तो बेहतर ही
है न..
..ये खुली पाठशाला थी. मामूली औपचारिकता के बाद कोई भी जा सकता था, हमने इसी
दिल्ली शहर में दर्जनों बार साइड में जाकर आयोजकों को बार-बार फोन करते देखा
है- आप कब तक आ रहे हैं, आ रहे हैं न..आ जाइए, लोग भी कम हैं..लेकिन आज की
सुबह निर्धारित समय से पहले तकरीब पच्चीस लोग मौजूद थे. मुझे नहीं पता कि
किसको कितनी बार फोन करके बुलाया गया था लेकिन मेरी ही वॉल पर कुछ लोगों ने
लिखा- मैं तो मिस्स कर गया.
पढ़ने-लिखने की दुनिया इसी तरह आबाद रहे. हमारे लिए इससे सुखद स्थिति क्या हो
सकती है भला ?
[image: Vineet Kumar's photo.]
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