[दीवान]मेरी तरफ से परांञ्जय गुहा ठाकुरता को थैंक्यू सर..

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Wed Jul 19 10:24:02 CDT 2017


इपीबीडब्ल्यू के संपादक पद से हटने पर मजबूर कर पत्रिका ने कुछ नहीं तो ये
संदेश जरुर दे दिया कि संपादक जैसी संस्था अभी मरी नहीं है. बहुत नहीं भी तो
परांञ्जय गुहा ठाकुरता जैसे कुछेक संपादक जरुर हैं जिनकी रीढ़ की हड्डी अभी
गयी नहीं है.

हर-दूसरे, तीसरे मीडिया सेमिनारों में ये जुमला किसी न किसी रुप में जरुर
उछाला जाता कि संपादक जैसी संस्था की मौत हो गयी है या फिर वो मैनेजर में
तब्दील हो गए हैं. इपीडब्ल्यू प्रकरण के बाद उम्मीद है कि ऐसे जुमले उछालने के
पहले वक्ता एक घड़ी जरुर सोचेंगे.

ऐसा नहीं है कि ठाकुरता साहब जब अडानी मामले पर पूरी स्टोरी एडिट कर रहे होंगे
तो उन्हें अंदाजा नहीं होगा कि इसका क्या असर होगा लेकिन उन्होंने वही किया जो
कि एक संपादक को करना चाहिए. इससे हुआ ये कि संपादक की कुर्सी से तो वो जरुर
हटा दिए गए लेकिन उस संपादक की कुर्सी की साख बची रह गयी. नहीं तो आलम ये है
कि कुर्सी तो बची रह जाती है लेकिन उसकी साख...

मीडिया हो या अकादमिक, प्रशासन हो या सरकार, कुर्सी बचा ले जाना फिर भी आसान
काम है लेकिन उस कुर्सी पर बैठने के लिए जिस रीढ़ की जरुरत होती है, पेशे के
प्रति ईमानदार बने रहने के लिए जिस रीढ़ का होना जरूरी होता है, उसे बचाए रखना
मुश्किल काम है. ठाकुरता ने उसे बचाया है ये हम नए मीडिया पाठकों के लिए खुश
होने की बात है.

बाकी इपीडब्ल्यू पत्रिका जैसे पहले फुटनोट लगाने के काम आती रही है, आगे भी
आती रहेगी.
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