[दीवान]बग़ावत-ए-हिंद से तक़सीम तक : जब ग़ालिब और मंटो एक दूसरे से रूबरू हों !!
kamal mishra
kissakhwar at gmail.com
Thu May 11 03:09:17 CDT 2017
लाज़मी है कि सआदत हसन मंटो को हम उनकी सालगिरह के मौके पर याद करते चलें।
लेकिन, १० मई १८५७ याने बग़ावत ए हिंद से १६० सालों बाद, आज मंटों को याद करते
हुए मुझे एक बेहद दिलचस्प किताब का जिक्र जरुरी लगता है। और, वो किताब है
पिछले सालों में पहले पहल बांग्ला और फिर हिंदी में प्रकाशित हुआ रविशंकर बल
का उपन्यास *दोज़ख़नामा *।
इस उपन्यास की वैसे तो काफी चर्चा हुयी है। लेकिन ग़ालिब और मंटों के चाहने
वालों के लिए बिला शक ये एक दिलचस्प किताब है। एक ऐसी किताब जहाँ बग़ावत-ए-हिंद
के गवाह मिर्जा ग़ालिब और तक़सीम के गवाह मंटो न सिर्फ एक दूसरे से बतकही में
मुब्तिला हैं। बल्कि, उनका अपना दर्द भी एक हद तक साझा है।
मैं, बलवंत कौर जी का बेहद शुक्रगुजार हूँ, जिनकी मेहरबानी से मुझे पिछले
दिनों *दोज़ख़नामा *पढ़ने का मौका मिला। दीवान के कई पाठकों की जानकारी में हो
सकता है कि यह किताब कोई बढ़ोत्तरी न कर पाए। मगर, मैं दावे के साथ कह सकता हूँ
कि ऐसे बहुपठित भी इस किताब की उपेक्षा कर के बयान की लताफ़त का मजा लेने से
चूक जायेंगे।
तो दोस्तों, बग़ावत-ए-हिंद से तक़सीम तक, और ग़ालिब से मंटो तक का जो रिश्ता है,
उस पर चर्चा साम्प्रदायिक फ़ासीवाद के इस मौजूदा दौर में भी जारी रहे,
इसी उम्मीद और अपील के साथ, मैं आप सब को *दोज़ख़नामा * पढ़ने और गुनने के लिए
भी आमंत्रित करता हूँ।
*A nation's treasure is its scholars. --- Yiddish proverb*
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