[Deewan] न्यूज़ चैनलों का सत्यकथाकरण - दूसरी खेप , भाग 2

Ravikant ravikant at sarai.net
Mon Mar 6 10:52:45 IST 2006


 
......   इनमें ऑपरेशन दुर्योधन,ऑपरेशन चक्रव्यू और ऑपरेशन घूसमहल को छोड़ दिया जाए 
तो बाकी को गंभीर पत्रकारिता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। हालांकि, कई दर्शकों का यह 
भी मानना  है कि इन तीनों ऑपरेशनों की खबर दिखाते वक्त भी टीवी चैनलों ने खबर को जरुरत
 से ज्यादा खींचा यानि इन खबरों में भी सननसी पैदा की। मैंने इन तमाम खबरों को लेकर कुछ चैनलों के 
अहम  पदों पर बैठे लोगों से बात की तो उन्होंने तीन प्रमुख तर्क दिए।   1-क्राइम और सनसनी 
बिकती है   2-सारा मामला टीआरपी का है   3-ऐसी खबरें मिलती भी बहुत हैं   अब, इन तीन
 तर्कों पर मेरा अध्ययन जारी है। क्राइम और सनसनी बिकती है, यह कहां तक सच है,कहना मुश्किल 
है। लेकिन,टीआरपी यानि टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट्स के आंकडे कहते हैं कि  क्राइम आधारित कार्यक्रम 
और खबरें बिकती हैं। खबरे बिकती हैं तो उन्हें विज्ञापन मिलते हैं और विज्ञापन मिलते हैं तो और
 कार्यक्रम, और सनसनी पैदा की जाती है। क्राइम  प्रोग्राम दर्शकों को कितने पसंद आते हैं, इस 
सिलसिले में मैं अपना सर्वेक्षण भी कर रहा हूं लेकिन फिलहाल टीआरपी को लेकर कुछ नए तथ्य पता चले 
हैं। दिलचस्प बात यह कि ये तथ्य न  केवल टीआरपी पर शक पैदा करते हैं बल्कि सनसनी बेचने की पूरी 
थ्योरी पर ही सवालिया निशान लगाते हैं। टीआरपी के बारे में ये पांच प्वाइंट गौर फरमाने लायक 
हैं। इस बार मैं इनकी  चर्चा भर कर रहा हूं-विश्लेषण अगली पोस्टिंग में करुंगा। दरअसल, ये पांच
 प्वाइंट हैं-   1- टीआरपी नापने के लिए मीटर देशभर में केवल 5500 घरों में लगाए गए हैं।   2- 
टीआरपी मीटर भी चैनल के आधार पर नहीं बल्कि फ्रीक्वेन्सी के आधार पर गणना करता है। यानि 
टीवी सैट में दो नंबर,तीन नंबर,चारनंबर आदि पर जो चैनल आता है,वो उसकी गणना करता है।  
हमारें यहां केबल ऑपरेटर हर आए दिन चैनल का नंबर बदलते रहते हैं   3-मीटर बिहार,झारखंड,अंडमान 
जैसे कई राज्यों में हैं ही नहीं   4-एक मीटर की कीमत लाखों में हैं,लिहाजा टैम( टीआरपी गणना 
करने वाली कंपनी) और मीटर लगाने की इच्छुक नहीं है।   5-विज्ञापन प्रदाता कंपनियों के पास 
कार्यक्रमों की लोकप्रियता जानने का कोई और साधन नहीं हैसलिहाजा वो टीआरपी के आधार पर ही 
विज्ञापन देते हैं और बहुत हद तक इसके आधार पर  विज्ञापन दर तय की जाती है।   

अब,इनका विश्लेषण अगली पोस्टिंग में। मैं कोशिश कर रहा हूं कि इस पूरे गड़बड़झाले के बारे में और 
ज्यादा जानकारी जुटायी जा सके। साथ ही, सनसनीखेज कार्यक्रमों की टीआरपी क्या  रही,इसके 
आंकडे भी जुटाए जा सके। सनसनी बेचने की कोशिश और क्राइम प्रोगाम्स के बारे में आप क्या सोचते हैं, 
मेरे लिए ये जानना महत्वपूर्ण है।   धन्यवाद   पीयूष  


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