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Mon Mar 6 17:45:32 IST 2006


दोस्तो,

यह लेख मैंने कुछ दिनो पहले
पढ़ा था. थोड़ा भिन्न है, इस अर्थ
में कि बाज़ार के चलते हिन्दी
का विकास हुआ है, उसकी लोकप्रियता, स्वीकार्यता, आदि बढ़ी है, इस बात को खुले दिल से स्वीकार किया गया है. जो बहुत आम बात नहीं है. लेकिन इसका उत्सव ज़्यादा है, आलोचना नहीं - कि बाज़ार हिन्दी के लिए क्या नहीं कर पा रहा है, या नहीं कर पाएगा, या जो कर रहा है, वह किन रूपों में कर रहा है, इन सब पर ज़्यादा चिंतन नहीं है. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा.


रविकान्त

फ्री मार्केट में अपने भरोसे
हिंदी
[Monday, December 12, 2005 07:12:54 pm Navbharat Times]

हिंदी के लिए जो काम आजादी के
अट्ठावन साल में हजारों की
संख्या में चल रहे राजभाषा
विभाग के दफ्तर और यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग नहीं कर पाए, उसे बाजार ने एक दशक में कर दिया। हिंदी की पहुंच अब सिर्फ उन इलाकों तक ही नहीं है, जो पारंपरिक रूप से हिंदीभाषी माने जाते हैं। टीवी और खासकर विज्ञापनों ने उसे पूरे देश में घर-घर तक पहुंचा दिया है।

बाजार ने भाषा के खेल को इस
कदर बदल दिया है कि खालिस
अंग्रेजीभाषी माने जाने वाले
एलीट बाजार के लिए बनी कार से
लेकर हीरों और डबल डोर फ्रिज
से लेकर पिज्जा और बर्गर
जॉइंट्स के विज्ञापन देसी
भाषा में बनाए जा रहे हैं।
मारुति अपनी कार को 'पेट्रोल
खतम ही नहीं होंदा' जैसे
विज्ञापन से बेचती है, तो
सैंट्रो कहती है 'क्या कार है
बॉस'। कोका कोला 'ठंडा मतलब
कोका कोला' और 'पियो सिर उठाके'
जैसे विज्ञापन लेकर आया है, तो
पेप्सी के तरकश में 'ओए बबली'
और 'ये प्यास है बड़ी' जैसे तीर
हैं। पिछले दशक के लगभग सभी
चर्चित विज्ञापन हिंदुस्तानी भाषा में बनाए गए।

विज्ञापनों के अलावा दूसरा
बदलाव टीवी सीरियल की दुनिया
में आया है। भारत में प्राइवेट चैनलों ने अपनी शुरुआत 'बोल्ड एंड द ब्युटिफुल' और 'सांता बारबरा' से की थी, लेकिन एक के बाद एक सभी चैनलों को जल्द ही समझ में आ गया कि भारत के विशाल बाजार में पहुंचने का जरिया अंग्रेजी नहीं हो सकती। ऐसे में उन्होंने हिंदी को अपनाया। इसके बाद तो 'क्योंकि सास भी बहू थी' से लेकर 'जस्सी जैस

ी कोई नहीं' और 'कौन बनेगा
करोड़पति' ने भारतीय टेलिविजन का चेहरा बदल दिया है। आज कोई भी पॉपुलर चैनल अपने प्राइम टाइम में अंग्रेजी के किसी सीरियल को दिखाने का जोखिम नहीं ले सकता। यही हाल क्षेत्रीय चैनलों का भी है।

विज्ञापन से लेकर मनोरंजन की
दुनिया में भारतीय भाषाओं की
बढ़ती हैसियत कई सवाल खड़े
करती है। यह बदलाव उसी दौरान
हुआ है जब शहरी एलीट जीवन से
हिंदी गायब हो रही है। हिंदी
के विज्ञापन और सीरियल वही
लोग देख रहे हैं, जो अपने
बच्चों को हर कीमत पर किसी
इंग्लिश मीडियम स्कूल में
पढ़ाना चाहते हैं, जो घर के
सामने नेम प्लेट अंग्रेजी
में ही लगाते हैं और अपने
बच्चों को हिंदी नहीं, अंग्रेजी की किताबें खरीदकर देते हैं। और ऐसा वे पूरी समझदारी के साथ कर रहे हैं। वे जानते हैं कि अंग्रेजी बोलना और जानना वक्त की जरूरत है। देश का मिडल क्लास जानता है कि अंग्रेजी मौजूदा दौर में रोजगार की भाषा है, बड़े बिजनेस की भाषा है, यानी कुल मिलाकर कामयाबी की भाषा है। हाल के वर्षों में सरकारी नौकरियों के मौके लगभग खत्म हो चुके हैं। ज्यादातर रोजगार अब प्राइवेट सेक्टर में हैं और इनके लिए अंग्रेजी जानना जरूरी हो गया है। कॉल सेंटरों में नौकरियां सिर्फ उनके लिए हैं, जिनकी विदेशी भाषाओं में महारत है। इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई तो हमेशा से ही अंग्रेजी में हो रही है, आईटी से लेकर मैनेजमेंट और एचआर का पूरा कारोबार भी अंग्रेजी में ही चल रहा है। हॉस्पिटैलिटी सेक्टर से लेकर अकाउंटिंग और लॉ तक में अंग्रेजी का ही बोलबाला है। एनजीओ सेक्टर में भी बड़ी नौकरियां अंग्रेजी ज्ञान के बगैर नहीं मिल सकतीं। इंटरनेट की भाषा अंग्रेजी ही है।

आप इस बात से खुश हो सकते हैं
कि माल बेचने के लिए या
मनोरंजन के जरिए आपका ध्यान
खींचने के लिए ज्यादातर
कोशिशें हिंदी में हो रही
हैं। लेकिन यही वह समय भी है,
जब ज्ञान-विज्ञान की भाषा के
तौर पर हिंदी हाशिए पर जा रही
है। हिंदी के साथ जो कुछ अच्छा
या बुरा हो रहा है, उसके पीछे
बाजार की ताकत है। लेकिन क्या
इस मामले में देश भर में चल
रहे राजभाषा विभागों, हिंदी
निदेशालयों या विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों की कोई भूमिका है? दरअसल फ्री मार्केट के युग में जब जिंदगी के हर क्षेत्र में सरकार की भूमिका घटती जा रही है, तब इसकी उम्मीद करना ही गलत होगा कि सरकारी विभाग किसी भाषा का भला या बुरा कर सकते हैं या ऐसा करने की हैसियत भी रखते हैं।

अलबत्ता हिंदी की भलाई के लिए
बनाई गई संस्थाओं की भूमिका
को निभाने का एक बड़ा समय लगभग
दस साल पहले आया था। उस समय
इंटरनेट के कदम भारत समेत
विकासशील देशों पर पड़े ही
थे। तब हिंदी में इंटरनेट
इस्तेमाल करने वालों को एक
बड़ी समस्या से रूबरू होना
पड़ा। उनके हिंदी में भेजे
ईमेल कोई और पढ़ नहीं पाता था।
वजह थी हिंदी फोंट की विविधता। इसी वजह से हिंदी में ईमेल लोकप्रिय नहीं हो पाए। फोंट और की बोर्ड की विविधता सूचना महामार्ग में हिंदी के लिए रोड़ा बन गई। लेकिन हिंदी के मठ चलाने वालों को इसकी न खबर थी, न परवाह। जिस समय उन्हें हिंदी की एकरूपता और मानकीकरण के लिए काम करना चाहिए था, उस समय वे पुरस्कार, फेलोशिप और कथा-कहानी की राजनीति में उलझे रहे। आज भी वे वहीं डूबे हैं, जहां लेखकों की लोकप्रियता इस बात से नहीं तय होती कि उनकी किताब कितनी बिकी है। जहां ज्यादातर किताबों की पांच सौ प्रतियां छापी जाती हैं और उनमें भी ज्यादातर समीक्षकों और पुस्तकालयों तक पहुंचती हैं। जिस समय हिंदी के कर्ताधर्ता इन बातों में डूबे थे, उस दौरान इंटरनेट पर हिंदी बेगानी होती चली गई। ऐसे में आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि चीन, फ्रांस, जापान और जर्मनी जैसे देशों की भाषाओं के मुकाबले इंटरनेट में हिंदी की हैसियत नहीं के बराबर है।

अब हिंदी पूरी तरह बाजार की
ताकतों के हवाले है। यहां
हिंदी और दूसरी भारतीय
भाषाओं को अपनी जीवनी-शक्ति
के दम पर चलना होगा। अपने लिए
जगह बनानी होगी। इसकी शुरुआत
बुरी नहीं रही है। फिल्मों की
दुनिया में अरसे से भारतीय
भाषाओं का बोलबाला रहा है।
मनोरंजन और विज्ञापन की
दुनिया में भारतीय भाषाओं ने
अंग्रेजी को पीछे छोड़ दिया
है। हिंदी के होनहार विद्यार्थियों को अब हिंदी विभागों में नहीं, फिल्म, टीवी, संचार माध्यमों और विज्ञापनों की दुनिया में अपना भविष्य तलाशना चाहिए।




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