[Deewan] uday praksh ki ek kavita
Ravikant
ravikant at sarai.net
Thu Mar 16 12:31:03 IST 2006
अनुभूति पढ़नेवालों से क्षमायाचना सहित और अनुभूति से साभार. मेरी कविता में गति बहुत थोड़ी है,
लेकिन उसमें संगीत अच्छा लगता है. कवि की तीन और कविताएँ यहाँ हैं:
http://www.anubhuti-hindi.org/kavi/u/udayprakash/
चाहे शुषा में पढ़ें या फ़ायरफ़ॉक्स में, युनिकोड फ़ॉन्ट में. मज़े लें.
रविकान्त
ताना बाना
हम हैं ताना हम हैं बाना।
हमीं चदरिया¸ हमीं जुलाहा¸ हमीं गजी¸ हम थाना।
नाद हमीं¸ अनुनाद हमीं¸ निश्शब्द हमीं¸ गंभीरा
अंधकार हम¸ चांद–सूरज हम¸ हम कान्हां¸ हम मीरा।
हमीं अकेले¸ हमीं दुकेले¸ हम चुग्गा¸ हम दाना।
मंदिर–मस्जिद¸ हम गुरुद्वारा¸ हम मठ¸ हम बैरागी
हमीं पुजारी¸ हमीं देवता¸ हम कीर्तन¸ हम रागी।
आखत–रोली¸ अलख–भभूती¸ रूप घरें हम नाना।
मूल–फूल हम¸ रुत बादल हम¸ हम माटी¸ हम पानी
हमीं यहूदी–शेख–बरहमन¸ हरिजन हम ख्रिस्तानी।
पीर–अघोरी¸ सिद्ध औलिया¸ हमीं पेट¸ हम खाना।
नाम–पता ना ठौर–ठिकाना¸ जात–धरम ना कोई
मुलक–खलक¸ राजा–परजा हम¸ हम बेलन¸ हम लोई।
हम ही दुलहा¸ हमीं बराती¸ हम फूंका¸ हम छाना।
हम हैं ताना¸ हम हैं बाना।
हमीं चदरिया¸ हमीं जुलाहा¸ हमीं गजी¸ हम थाना।
उदय प्रकाश
16 मार्च 2006
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