[दीवान]सपनों की रेल, पहला पार्ट लेकर हाजिर हूं
zaigham imam
zaighamimam at gmail.com
Sun Apr 15 10:59:11 IST 2007
नमस्कार
''सपनों की रेल'' का पहला पार्ट लेकर हाजिर हूं।
इलाहाबाद से जौनपुर (एजे) और इलाहाबाद से फैजाबाद (एएफ) के बीच चलने वाली
पैसेंजर रेलों का इतिहास और वर्तमान खंगालने से जुडे इस शोध में पहली ही बार कई
रोचक जानकारियां हाथ लगीं। तथ्यों का नीरस अंबार भी मिला है, लेकिन कोशिश यही
रहेगी कि मजेदार पक्ष को उभार सकूं। विषय पूरी तरह समझ आ जाए इसलिए हर पहलू पर
फोकस करने की कोशिश है। सुविधा के लिए जानकारियों बिंदुवार प्रस्तुत कर रहा
हूं।
पटरी पर रेल
एजे और एएफ की शुरुआत 1940 के करीब (करीब इसलिए क्योंकि आधिकारिक आंकडा रेलवे
के पास भी मौजूद नहीं है) हुई। आजादी की तमाम गहमागहमियों के बावजूद अंग्रेजों
ने इस सवारी गाडी को हरी झंडी दिखाई। वजह थी उनका अपना पूरब का
आक्सफोर्ड(इलाहाबाद विश्वविद्यालय स्थापना 1985, अब केंद्रीय
विश्वविद्यालय) जो शिक्षा का बडा केंद्र होने के बावजूद अपने ही नजदीकी जिलों
जौनपुर, सुल्तानपुर, प्रतापगढ और फैजाबाद (ये जिले अपनी जमीदारी रियासतों के
लिए मशहूर रहे हैं। प्रतापगढ के राजा भईया इसका एक उदाहरण हैं)से कटा था।
जमीदारों के होनहार बच्चे अपनी गाडियों में झटपट इलाहाबाद तक का सफर तय कर
लिया करते थे, लेकिन यहां बसने वाले प्रगतिशील किसानों और दूसरे वर्गों को
इलाहाबाद तक पहुंचने में पसीने छूट जाते थे। सडक बेहद खराब थीं।(सडकों की हालत
अभी भी बेहद खस्ता है) इलाहाबाद के 100 किलोमीटर के दायरे में आने वाले इन
जिलों से यहां तक पहुंचने के लिए दिनभर लग जाता था। उस समय इलाहाबाद से गुजरने
वाली मेन लाइन ( दिल्ली-हावडा रेल मार्ग) से एक लाइन (इलाहाबाद जंक्शन से )इन
जिलों के लिए भी निकलती थी। मगर इस लाइन पर सवारी गाडियां नहीं अंग्रेजों का
दस्ता घूमता रहता था। मांग उठी कि इस लाइन से सवारी गाडियां चलाई जाएं,
अंग्रेजों ने मेहरबानी की और इन दो पैसेंजर रेलों को हरी झंडी दिखा दी गई।
इन रेलों की शुरुआत में इलाहाबाद के संगम और हाईकोर्ट का भी खासा योगदान है।
(इनकी व्याख्याएं अगली पोस्टिंगों में की जाएंगीं)
फुस्स भाप की शक्ति और डीजल इंजन
1993 तक इन दोंनो पैसेंजर रेलों को खींचने की जिम्मेदारी बूढे होकर यार्ड में
सडने वाले भाप के इंजनों की थी। भाप इंजन यानि जेम्स वाट इंजन। टनों कोयला खा
खाकर दौडने वाले इंजन की खासियत यह थी इसे चलने के बजाय रुकना पंसद था, इंजन
बार बार फेल भी हो जाते थे। 1985 से 1993 के बीच इंजन फेल होने की घटनाओं में
बेतहाशा बढोत्तरी हुई। रेलवे की नाक में दम हो गया। फैसला किया गया कि इन
इंजनों को तुरंत बदल दिया जाए। और वाकई इंजन बदल दिए गए। वाराणसी लोकोमोटिव
कारखाने के डीजल इंजनों को रेल के डिब्बों में जोड दिया गया। यह एतिहासिक
बदलाव था।
डिब्बा या लोहे का कबाड
अमूमन आठ डिब्बों वाली इन रेलों में डिब्बों की संख्या बदलती रहती है, नहीं
बदलता तो सिर्फ उनका हुलिया। दोंनो रेलों के लिए डिब्बों की व्यवस्था करना
उत्तर रेलवे (लखनऊ मंडल) की जिम्मेदारी है। जहां से मेल और एक्सप्रेस रेलों
से खारिज हो चुके जनरल कोच के डिब्बे इन रेलों में लगाने के लिए आते हैं। ये
डिब्बे ऐसे डिब्बे होते हैं जिनकी गिनती कबाड में की जाती है। पैच वर्क के
जरिए डिब्बों में जान डालने की कोशिश जरुर होती है मगर फिर भी, खिडकी की गायब
राड, उखडी सीटें, नदारद बेसिन, गुम हो चुके पंख, बल्ब्ा असलियत बयान कर देते
हैं। रही सही कसर पूरी करते हैं इनमें सफर करने वाले होनहार यात्री जो रेल के
देरी से चलने से लेकर अपनी निजी जिंदगी का गुस्सा भी इन्हीं डिब्बों पर
उतारते हैं।
रनिंग स्टाफ
रेल के लिए आधिकारिक रुप से तीन स्टाफ होता है। चालक, परिचालक और गार्ड। ये
सभी एक प्रमोशन (गुड्स रेल से पैसेंजर रेल में) पाकर इन रेलों को चलाने योग्य
बनते हैं। रेल संचालन के क्षेत्र में इन्हें 5-8 साल तक का अनुभव होता है।
आमतौर पर दूसरी सभी रेलों में रनिंग स्टाफ के तौर पर टीटीई की नियुक्ति भी
होती है, मगर नहीं इसमें चेकिंग जैसा कोई प्रावधान नहीं है।
सफर के साथी
रेल की सफर के साथी यानि यात्री 70 प्रतिशत छात्र हैं। दूसरे लोगों में काम की
तलाश में इलाहाबाद आने वाले मजदूर, इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले
वकील और तीसरे दर्जे के सरकारी कर्मचारी शामिल हैं। कमाई के लिए मुंबई,
दिल्ली, गुजरात और कलकत्ता जैसे शहरों को जाने वाले गंवई मजदूर भी इलाहाबाद
आने के लिए (क्योंकि उनके यहां से सीधे बडे शहरों को रेल नहीं जाती )इन्हीं
रेलों का सहारा लेते हैं।
आईए मिलें इलाहाबाद-जौनपुर पैसेंजर यानि अपनी एजे से
तकनीकी पहूल
इलाहाबाद से जौनपुर के बीच एजे रोज 2 चक्कर मारती है । अप यानि
इलाहाबाद-जौनपुर के बीच गाडी नंबर होता है 1एजे और 3 एजे। जबकि डाउन यानि
जौनपुर से इलाहाबाद के बीच इनका नाम 2 एजे और 4 एजे हो जाता है।
95 किलोमीटर के अपने रुट के दौरान रेल कुल 16 बार रुकती है। यह सारे स्टापेज
आधिकारिक है। ज्यादातर स्टापेज 2 मिनट के हैं। तीन स्टापेजों प्रयाग, जंघई
और जफराबाद में रेल क्रमश: 5, 30 और 10 मिनट के लिए खडी होती है।
1एजे सुबह 5:20 पर इलाहाबाद से चलती है। 3 एजे का समय शाम के 5:00 बजे
निर्धारित है।
वापसी में यानि जौनपुर से चलने वाली 2 एजे सुबह 5:20 पर चलती है। 4 एजे का समय
शाम 5:00 बजे का है।
यह कैसी स्पीड
रेलवे के नियमों के मुताबिक रेल की न्यूनतम स्पीड 45 किलोमीटर प्रतिघंटा है,
लेकिन 95 किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए 4:30 घंटे का आधिकारिक टाइमटेबल
बनाया गया है।
स्टापेजों को लेकर देखें को समय का 1 घंटा 17 मिनट रुकने में खर्च होता। यानि
रेल 3 घंटे 13 मिनट लगातार दौडती रहती है। इस हिसाब रेल की चाल 30 किलोमीटर
प्रतिघंटे से भी कम बैठती है। साफ है रेलवे का कानून खुद उसी के लिए मजाक है।
रुकना ही जिंदगी है
पैसेंजर रेल अपने सफर के दौरान रोजाना कम से 20 से भी अधिक बार चेन पुलिंग का
सामना करती है। सिंगल टै्क होने की वजह से एक दर्जन गाडियों को जिनमें
मालगाडियां प्रमुख रुप से शामिल हैं इसे रोककर पास दिया जाता है। रेल नियमित
रुप से दो घंटे तक विलंबित रहती है।
एक सरसरी निगाह स्टेशनों पर
इलाहाबाद--------1: प्रयाग 2: फाफामऊ 3: थरवई 4: सराय चंडी 5: फूलपुर 6:
उग्रसेनपुर 7: बरियाराम 8: जंघई 9: जरौना 10: बरसेटी 11: भनौर 12: बारीगांव
नवादा 13: मरियाहूं 14: शुदनीपुर 15: सलखापुर 16: जफराबाद------जौनपुर
--------------अगली पोस्टिंग में पैसेंजर रेल कैसे बनी सपनों की रेल, गंवारों
की इंजीनियरिंग का शानदार नमूना, ''एसीपी'' की अनूठी परंपरा और अभी भी जिंदा है
अंग्रेजियत। और हां अपनी एएफ से मिलना न भूलिएगा।
धन्यवाद
सैयद जैगम इमाम
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