[दीवान]सपनों की रेल , पहला पार्ट लेकर हाजिर हूं

Ravikant ravikant at sarai.net
Fri Apr 20 16:16:42 IST 2007


रविवार 15 अप्रैल 2007 10:59 को, zaigham imam ने लिखा था:
> नमस्‍कार
> ''सपनों की रेल'' का पहला पार्ट लेकर हाजिर हूं।

क्या बात है! अपनी सपनों की रेल के पहले स्टेशन तक के इस सफ़र पर हमें साथ ले चलने के लिए हम आपके 
अहसानमंद है.  आप जिन तफ़्सीलात में जा रहे हैं, वे वाक़ई दिलचस्प हैं. उन्हें देने में कंजूसी बरतने की 
कोई ज़रूरत नहीं.  

> पटरी पर रेल
> इन  रेलों की शुरुआत में इलाहाबाद के संगम और हाईकोर्ट का भी खासा योगदान है।
> (इनकी व्‍याख्‍याएं अगली पोस्टिंगों में की जाएंगीं)
और हमें इसका इंतज़ार रहेगा, क्योंकि हम तो आपके द्वारा दी गई शुरुआती
 जानकारियों के आधार पर इसका रिश्ता सिर्फ़ विश्वविद्यालय से जोड़ पा रहे थे.  इस प्रसंग में
मुझे लगता है कि जब गाड़ी शुरू की गई होगी तो इसमें बेटिकटी या सुविधाहीनता का वैसा 
अपवाद नहीं बरता गया होगा, जो बाद में जाकर इसका नियम हो जाता है. उन दिनों के बारे में हम 
शायद पुराने यात्रियों/कर्मचारियों से मिल कर जान पाएँगे. 


> रनिंग स्‍टाफ
> आमतौर पर दूसरी सभी रेलों में रनिंग स्‍टाफ के तौर पर टीटीई की नियुक्ति
> भी होती है, मगर नहीं इसमें चेकिंग जैसा कोई प्रावधान नहीं है।

क्या बात है! बीच बीच में मैजिस्ट्रेट चेकिंग ज़रूर होती होगी. तब क्या आलम बनता है?
या बिल्कुल ही राम-भरोसे है?
> सफर के साथी
> रेल की सफर के साथी यानि यात्री 70 प्रतिशत छात्र हैं। दूसरे लोगों में काम की
> तलाश में इलाहाबाद आने वाले मजदूर, इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले
> वकील और तीसरे दर्जे के सरकारी कर्मचारी शामिल हैं। कमाई के लिए मुंबई,
> दिल्‍ली, गुजरात और कलकत्‍ता जैसे शहरों को जाने वाले गंवई मजदूर भी इलाहाबाद
> आने के लिए (क्‍योंकि उनके यहां से सीधे बडे शहरों को रेल नहीं जाती )इन्‍हीं
> रेलों का सहारा लेते हैं।
>

>
> यह कैसी स्‍पीड
> रेलवे के नियमों के मुताबिक रेल की न्‍यूनतम स्‍पीड 45 किलोमीटर प्रतिघंटा है,
> लेकिन 95 किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए 4:30 घंटे का आधिकारिक टाइमटेबल
> बनाया गया है।
> स्‍टापेजों को लेकर देखें को समय का 1 घंटा 17 मिनट रुकने में खर्च होता। यानि
> रेल 3 घंटे 13 मिनट लगातार दौडती रहती है। इस हिसाब रेल की चाल 30 किलोमीटर
> प्रतिघंटे से भी कम बैठती है। साफ है रेलवे का कानून खुद उसी के लिए मजाक है।
>
>
> रुकना ही जिंदगी है
> पैसेंजर रेल अपने सफर के दौरान रोजाना कम से 20 से भी अधिक बार चेन पुलिंग का
> सामना करती है। सिंगल टै्क होने की वजह से एक दर्जन गाडियों को जिनमें
> मालगाडियां प्रमुख रुप से शामिल हैं इसे रोककर पास दिया जाता है। रेल नियमित
> रुप से दो घंटे तक विलंबित रहती है।

 कब से ऐसा है? चेन पुलिंग के क्या कारण होते हैं? गौतम सान्याल की पीजी भौजी जैसे मज़ेदार हैं 
क्या?  क्या यहाँ भी 'भैकम्प' काटा जाता है, जेसे कि बिहार में? उसमें स्थानीय लोग कौन-कौन से 
जुगाड़ भिड़ाते हैं? मुझे एक बार इसी तरह एक शादी में बीच टाल के खेत में उतारा गया था, क्योंकि 
वहीं से शादी वाला गाँव नज़दीक पड़ता था! गार्ड के केबिन में कोई नहीं था, हम उसमें चढ़ गए, 
हमने एक गोल स्टीयरिंग जैसी चीज़ घुमाई और गाड़ी फुस्स से हवा निकाल कर रुक गई. हम इत्मीनान 
से उतर कर शादी में गए. मुझे पता है कि यह काम डिब्बों के बीच लगी हवा के दबाव वाली पाइपों 
के जोड़ को तोड़ कर भी किया जाता है. आप इस जनोपयोगी जुगाड़ के बारे में और बता कर 
जन-कल्याण करें.  


> --------------अगली पोस्टिंग में पैसेंजर रेल कैसे बनी सपनों की रेल, गंवारों
> की इंजीनियरिंग का शानदार नमूना, ''एसीपी'' की अनूठी परंपरा और अभी भी जिंदा
> है अंग्रेजियत। और हां अपनी एएफ से मिलना न भूलिएगा।
साहब  आपके इन लघु-अध्यायों के नाम मनोहर हैं.  अल्लाह करे ज़ोरे क़लम और कुछ ज़यादा!
उम्मीद है इस शोध की रफ़्तार वही होगी जो इसका वायदा है.  

>
> धन्‍यवाद
> सैयद जैगम इमाम

बहुत-बहुत शुक्रिया. माफ़ कीजिएगा. आपके आग्रह पर ही मैंने इतना बकने की हिम्मत करके इस स्वतंत्र 
शोध में अपनी टाँग अड़ाई. 

शुक्रिया
रविकान्त 




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