[दीवान]ऑटो के पीछे क्या है
Ravikant
ravikant at sarai.net
Mon Dec 17 19:07:27 IST 2007
कुछ नया नहीं है, आईएएनएस के ब्रजेश ने दीवान-ए-सराय02: शहरनामा में प्रकाशित, और रचनाकार
http://rachanakar.blogspot.com/2007/04/what-is-there-behind-auto.html
में पुनर्प्रस्तुत लेख को पुनर्संदर्भित किया है. यहाँ आपको यह बताने के लिए पोस्ट कर रहा हूँ कि
यह प्रॉजेक्ट अभी ज़िन्दा है. प्रभात झा और हम अभी भी ये नारे इकट्ठा करने में लगे हैं. अभी
कलकत्ता के मिठुन बोस ने सराय शोधवृत्ति कार्यशाला में कलकत्ते के रिक्शे के पीछे छपी तस्वीरों की
एक बानगी दिखाई. इस काम को वे और फैलाना चाहते हैं.
आप भी अगर कुछ दिखे तो भेजें, दीवान डाक सूची पर ही. आपके योगदान को विनम्रतापूर्वक
याद किया जायेगा.
रविकान्त
आटो के पीछे क्या है?
दैनिक जागरण, पटना, 17 दिसंबर, 2007.
http://www.epaper.jagran.com/main.aspx?edate=12/17/2007&editioncode=42&pageno=16
नयी दिल्ली, एजेंसी : सुबह-सबेरे दिल्ली की सड़कों पर चलते वक्त यदि आटो रिक्शा के पीछे लिखा दि
ख जाय बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला तो अन्यथा न लें बल्कि गौर करें। क्या ये चुटकीली पंक्तियां
शहरी समाज के एक तबके को मुंह नहीं चिढ़ा रही हैं? गौरतलब है कि ऐसी सैकड़ों पंक्तियां तमाम आटो
रिक्शा व अन्य गाडि़यों के पीछे लिखी दिख जायेंगी जो बेबाक अंदाज में शहरी समाज की सच्चाई बयां
करती हैं। अंदाजे-बयां का ये रूप केवल हिन्दुस्तान तक ही सीमित नहीं है बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में
प्रचलित है। इन पंक्तियों के पीछे भला क्या मनोविज्ञान छिपा हो सकता है, इस दिलचस्प विषय पर
शोध कर रहे दीवान ए सराय के श्रृंखला संपादक रविकांत ने कहा कि आटो रिक्शा के पीछे लिखी
चौपाइयां, दोहे और शेरो-शायरी वहां की शहरी लोक संस्कृतियों का इजहार करती हैं। मनोभावों की
अभिव्य1ित का ये ढंग पूरे दक्षिण एशिया में व्याप्त है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में भी आपको
आटो रिक्शा के पीछे लिखा दिखेगा कायदे आजम ने फरमाया तू चल मैं आया। कहने का मतलब यह है कि
हर वैसी चीजें जो शहरी समाज का हिस्सा हैं वह शब्दों के रूप में आटो रिक्शा व अन्य वाहनों के पीछे
चस्पां हैं। वह रूहानी भी हैं और अश्लील भी। सियासती भी हैं और सामाजिक भी। फिलहाल मैं और
प्रभात इन लतीफों को इकट्ठा कर रहा हूं जिसे अब तक गैरजरूरी समझ कर छोड़ दिया गया था। यकी
नन इससे शहरी लोक संस्कृतियों को समझने में काफी मदद मिलेगी। खैर! इसमें दो राय नहीं है कि आटो
रिक्शा व अन्य गाडि़यों को चलाने वाले चालकों का जीवन मुठभेड़ भरा होता है। इन्हें व्यक्ति, सरका
र और सड़क तीनों से निबटना पड़ता है। तनाव के इन पलों में ऐसी लतीफे उन्हें गदुगुदा जाते हैं।
पर क्या अब दिल्ली में इजहारे-तहरीर पर भी सियासती रोक लगा दी गयी है?
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