[दीवान]सूचनार्थ

Ravikant ravikant at sarai.net
Thu Feb 15 18:14:29 IST 2007


http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2006/12/061229_guestedit_third.shtml

साहित्य से दोस्ती
 
		
असग़र वजाहत
अतिथि संपादक, बीबीसी हिंदी पत्रिका
 
 
आपको आजकल हरियाणा की सड़कों पर एक विचित्र तो नहीं पर कुछ अलग किस्म की गाड़ी दिख सकती 
है. यह गाड़ी एक चलती-फिरती किताब की दुकान है और किताबों की यह चलती-फिरती दुकान 
चाहती है कि पाठक साहित्य से दोस्ती करें.  इन प्रयासों के पीछे है 'साहित्य उपक्रम' नाम की
 संस्था जो साहित्य और समाज को केंद्र में रखकर फिलहाल हरियाणा में अपनी गतिविधियाँ चला रही 
है. बहुत संक्षेप में अगर कोई समझना चाहे तो संस्था यह चाहती है कि लोग साहित्य और कला के ज़रि
ए अधिक जागरूक और संवेदनशील बनें. वे अपने समाज और परिवेश को समझें. समाज में आदमी से इंसान 
बनने की कोशिश तेज़ हो.

किताबों की यह चलती-फिरती दुकान हरियाणा के शहरों, कस्बों के गाँवों के चक्कर लगाती रहती है.

इस दुकान में सस्ती किताबें रहती हैं जिन्हें पाठक आसानी से ख़रीद सकते हैं. इनका मानना है कि किता
बें लोगों के जीवन को बदल सकती हैं.समाज को एक बेहतर समाज बना सकती हैं. 
इसलिए ज़रूरी है कि किताबें इतनी सस्ती हों और इतनी आसानी से मिल सकती हों कि किसी पाठक को 
किताब तलाशना और उसे ख़रीदना ज़रा भी मुश्किल न लगे.

इस चलती-फिरती दुकान का सबसे ज़्यादा स्वागत ग्रामीण इलाकों में होता है जहाँ न तो आमतौर पर 
पुस्तकालय है और न ही किताबों की दुकानें हैं.

पुस्तकालय शहर में हैं जिसका लाभ गाँव में रहनेवालों को नहीं मिल सकता और दूसरी मुश्किल यह है कि 
किताबें बहुत महंगी हैं और मध्यवर्गीय परिवार इन्हें ख़रीद नहीं सकता. 
ऐसी स्थिति में इस चलती-फिरती दुकान की सस्ती किताबें ग्रामीण जनता के लिए कितनी उपयोगी हों
गी, इसकी कल्पना ही की जा सकती है. 
'साहित्य उपक्रम' दरअसल एक आंदोलन है. इसका कार्यक्षेत्र केवल जनता तक सस्ती
किताबें पहुँचाना ही नहीं है. यह संस्था भारतीय इतिहास के आइने में देश की समस्याओं को समझने-समझा
ने का प्रयास करती है.

उद्देश्य है कि किताबों के माध्यम से अपने समाज को समझा और फिर बदला जाए. संस्था ने 'भगत सिंह 
से दोस्ती' का कार्यक्रम चला रखा है जिसके अंतर्गत भगतसिंह के विचारों को समझने और फिर अपने 
परिवेश को समझने का प्रयास किया जाता है.

संस्था के कार्यक्रमों के अंतर्गत 'प्रेमचंद से दोस्ती', 'अंबेडकर से दोस्ती' और
'सर छोटू राय से दोस्ती' जैसे कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं.

अंबेडकर के माध्यम से जातिवादी समस्या और राजनीति के कई पक्ष उद्घाटित होते हैं. सर छोटू राय से 
किसान समस्या के विभिन्न मुद्दों पर विचार करने की प्रेरणा मिलती है. उर्दू के प्रसिद्ध कवि ख़्वा
जा अल्ताफ़ हुसैन 'हाली' को केंद्र में रखकर संस्था ने 'हाली से दोस्ती' के अंतर्गत हिंदी-उर्दू भाषा 
और सांप्रदायिक सदभाव के मुद्दों को सामने रखा है.

चलते-फिरते पुस्तकालय के अलावा यह संस्था करनाल में 'पाश पुस्तकालय' 
और साहित्यिक क्लब भी चलाती है जहाँ बराबर कार्यक्रम होते रहते हैं. जल्दी ही नाटकों के मंचन के 
साथ-साथ संस्था फ़िल्म प्रदर्शन आदि की सुविधा भी देने वाली है.

किताबों का आंदोलन सामाजिक आंदोलन है और भारत में कोई भी आंदोलन महिला अधिकारों की अनदेखी 
नहीं कर सकता. यह संस्था भी लड़कियों के लिए 'इंकलाब ज़िंदाबाद' मुहिम चला रही है.

संस्था का कहना है, "जैसे ही लड़कियाँ कुछ नया करना चाहती हैं, अकेली पड़ जाती हैं.
" आंदोलन महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई को बहुत महत्व देता है.

हरियाणा की यह संस्था और इससे जुड़े मुद्दे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देते हैं. सबसे पहली और बड़ी 
बात जो समझ में आती है वह यह है कि समाज में परिवर्तन अंदर से आते हैं, बाहर से आरोपित नहीं कि
ए जा सकते हैं.

लोगों में सार्थक परिवर्तन की इच्छा जगाना सबसे बड़ा काम है.

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