[दीवान] Fwd: meerut ka prakashan udyoga II

Ravikant ravikant at sarai.net
Wed Jul 11 17:06:36 IST 2007


chunki yeh pichhli bar sahi nahin aaya tha. 

ravikant

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Subject: meerut ka prakashan udyoga II
Date: मंगलवार 10 जुलाई 2007 17:21
From: "VIJAY PANDEY" <vijaykharsh at gmail.com>
To: ravikant at sarai.net

•	बीसवी शताब्‍दी के शुरुआती सालों में देवनागरी हाईस्‍कूल में पं
रामनारायण मिश्र भूगोग पढ़ाते थे। उनके संपादन में 1924 में मासिक
प‍त्रिका भूगोल का प्रकाशन हुआ। वैसे तो भूगोल विषय बहुत ही शुष्‍क समझा
जाता है लेकिन इस पत्र में पंडित जी ने लेखों को बहुत ही रोचक भाषा में
प्रस्‍तुत करते थे। वे अपने पत्रों में विदेशों की कई वैज्ञानिक
उप‍लब्‍धियों का विवरण भी प्रकाशित करते थे। उन्‍होंने इस पत्र के कई
विशेषांक प्रकाशित किए। उनका पत्र विद्यार्थियों के अलावा भी काफी
लो‍कप्रिय था। लगभग इसी समय के आसपास मेरठ में बड़े पैमाने पर शैक्षिक
पुस्‍तकें के प्रकाशन की नींव पड़ी।

•	शैक्षिक प्रकाशनों और साहित्यिक प्रकाशनों से इतर भी आम जनमानस में
लोकप्रिय लोकसाहित्‍य का प्रकाशन भी मेरठ से हुआ। 1932 में जवाहर बुक
कंपनी की स्‍थापना कर लक्ष्‍मीचंद अग्रवाल ने लोक साहित्‍य के प्रचार
प्रसार का बीड़ा उठाया। अपने शुरुआती सालों में ही जवाहर बुक कंपनी से
प्रकाशित पुस्‍तकें आम आमदियों को खूब पसंद आयी। लक्ष्‍मीचंद ने मेरठ के
तत्‍कालीन प्रकाशन स्‍वरूप से एकदम हटकर केवल लोक साहित्‍य के प्रकाशन पर
अपना ध्‍यान केन्‍द्रित रखा। जवाहर बुक कंपनी से प्रकाशित होने वाली
आल्‍हा, ढोला, रागनियां और भजन खासे लोकप्रिय थे। उन दिनों आल्‍हा, ढोला,
भजनों और रागनियों का गायन गांव की चौपालों में खूब होता था। लोक कला ही
आम जन के मनोरंजन का साधन थीं। इसके अलावा तोता मैना की कहानियां सहित कई
लोक प्रचलित किस्‍से कहानियों का प्रकाशन जवाहर बुक कंपनी के लिए फायदे
का सौदा साबित हुई। यहां से प्रकाशित किताबें दिल्‍ली, मथुरा, लखनउ तक
जाती थीं। जहां एक ओर खड़ी बोली के केन्‍द्र पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में
कई नामचीन साहित्‍यकार साहित्‍य साधना में लगे थे वहीं जवाहर बुक कंपनी
आम जनमानस में प्रचलित किस्‍से कहानियों और लोकगीतों के प्रकाशन में पूरी
तल्‍लीनता से लगी थी। इस अलावा जवाहर बुक कंपनी धार्मिक किताबों के
प्रकाशन में भी लगे थे। हालांकि लोकप्रिय साहित्‍य के प्रकाशन में लगे
होने के कारण जवाहर बुक कंपनी को खास तवज्‍जो नहीं दी जाती थी, लेकिन
जनमानस के साहित्‍य को एकत्र कर उसे प्रकाशित कर आम जन तक पहुंचाने में
जवाहर बुक कंपनी के योगदान की अनदेखी नहीं की जा सकती है। लक्ष्‍मीचंद
अग्रवाल ने जहां पुराने आल्‍हा, ढोला, होली सांग को प्रकाशित किया वहीं
उन्‍होंने नए आल्‍हा, ढोला और होली सांग लिखवाकर भी प्रकाशित कराए। उन
दिनों जवाहर बुक कंपनी से प्रकाशित चौधरी बेधड़क के भजन की किताबें भी
पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में खूब बिकती थीं। हालांकि समय बीतने के साथ
जवाहर बुक कंपनी ने तकनीकी में कई बदलाव किए लेकिन अब यह केवल पूजा,
आरती, व्रत की किताबों के प्रकाशन के छोटे दायरे तक ही सी‍मित रह गयी है।

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