[दीवान]नया ज्ञानोदय विवाद

प्रमोद रंजन pramodrnjn at gmail.com
Sun Jul 22 20:12:44 IST 2007


परिचय और पाठ का अंतर्विरोध <http://sanshyatma.blogspot.com/>

परिचय कैसा भी हो,वह मनुष्‍य की बहुआयामी संभावनाओं को सीमित करता है।
साहित्यिक हलकों में इन दिनों चर्चा और विवाद का विष्‍य बने भारतीय ज्ञानपीठ की
मासिक पत्रिका 'नया
ज्ञानोदय`<http://mohalla.blogspot.com/search/label/%E0%A4%A8%E0%A4%AF%E0%A4%BE%20%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A4%AF%20%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6>के
परिचय प्रसंग में भी यह मूल बात ध्यान रखी जानी चाहिए। विवाद की शुरूआत
नया
ज्ञानोदय के मई, २००७ युवा पीढ़ी पर केंद्रित विशेषांक में प्रकाशित विजय कुमार
के लेख से हुई।उसके बाद विशेषांक में प्रकाशित परिचयों पर भी विवाद हुआ। यद्यपि
ज्ञानोदय ने अपने लेखकों के 'परिचयों` के साथ पहली बार मसखरी नहीं की है
।पत्रिका के वर्तमान संपादक रवीन्द्र कालिया 'वागर्थ` के समय से ही
अतिश्योक्तिपूर्ण परिचय प्रकाशित कर हिन्दी के साहित्यिकों को प्रसन्न करते रहे
हैं ।

मैं अन्‍यत्र भी <http://janvikalp.blogspot.com/2007/07/blog-post_8369.html>यह
कह चुका हूं कि नया ज्ञानोदय के मई अंक में विजय कुमार के जिस लेख 'कवित्त ही
कवित्त है` से विवाद का जन्म हुआ वह सदाशयतापूर्वक लिखी गई अलोचना है। उतनी ही
सुरूचिपूर्ण भी, जितनी कि कलावाद को प्रश्रय देने वाली कोई आलोचना हो सकती है।
इस विवाद के दोनों पक्ष गैरऱ्यथार्थपरक, और अंतत: कलावादी इसलिए भी कहे जा सकते
हैं कि विजय कुमार का विरोध करने वालों ने भी इस तथ्य पर उंगली रखने की
आवश्यकता नहीं समझी कि विजय जी अपनी आलोचना में 'यथार्थबोध` के स्थान पर 'सौंदर्य
शिल्प और रूप-रचाव` पर जोर दे रहे हैं। न ही किसी ने यह याद करने की कोशिश की
कि लेखकों के ऐसे अतिश्योक्तिपूर्ण परिचय की आवश्यकता प्राय: सभी साहित्यिक
पत्रिकाओं को क्यों होने लगी है?

यह सच है कि नया ज्ञानोदय के युवा पीढी विशेषांक में लेखकों के परिचय
'अतिश्योक्ति` की भी सीमा पार कर हास्यास्पद और वल्गर हो गए हैं ।अंक में किसी
युवा लेखक के परिचय में लिखा गया कि 'अविवाहित कथाकार।कॉम्लेक्शन एंड
क्वालिफिकेशन नो बार।बट गर्ल्स फादर मस्ट हैव ओन बार` तो किसी युवा लेखिका के
बारे में कहा गया कि 'दुबली-पतली और सुन्दर कहानीकार`। इसके अलावा अन्य
पत्रिकाओं की ही तरह ज्ञानोदय में प्रकाशित इन परिचयों में भी लेखकों के उंचे
घराने से संबंधित होने अथवा उंची नौकरियों में होने जैसी बातों को प्रमुखता दी
गई है। साहित्यिक पत्रिकाओं का 'उंचे` लोगों के प्रति मोह अलग विश्लेषण की मांग
करता है। जरा सोचें, यदि कबीर अथवा रविदास के समय ये साहित्यिक पत्रिकाएं होती
और उनमें से कोई उनकी वाणी छापने के लिए तैयार भी हो जाती तो उनका 'परिचय` क्या
होता? क्या अभिजात संपादकीय मानसिकता यह पचा पाती कि उसका लेखक 'कपड़ा बुनता
है` या 'जूता बनाता है`? और वे अपने तुलसी का परिचय क्या देते?

ज्ञानोदय के मई और जून में प्रकाशित युवा पीढी पर केंद्रित दो विशेषांकों में
प्रकाशित इन परिचयों के पीछे की मानसिकता को समझने में पत्रिका का जुलाई
अंकसहायक बन सकता है। संभवत: यह रवींद्र कालिया के विरोधियों द्वारा
ज्ञानपीठ प्रबंधन
से की गई शिकायतों का असर रहा कि नया ज्ञानोदय के जुलाई अंक में लेखकों के
परिचय एकदम गायब हो गए। अंक में लेखकों के सिर्फ फोटो छापे गए हैं। पिछले अंकों
में प्रकाशित परिचयों के लिए संपादक ने स्पष्‍टीकरण भी दिया है। लेकिन इस अंक
से एक और नई कवायद शुरू की गई है। इसमें वरिष्‍ठ कवि भगवत रावत की कविताओं और
शशिकला राय द्वारा लिखी गई समीक्षा के साथ उन पत्रों को भी छाप दिया गया जो इन
रचनाकारों ने संपादक के नाम लिखे थे। इन पत्रों में भगवत रावत को कहते हुए
दिखलाया गया है कि 'अगर आपको यह कविता इस योग्य किसी भी कारण से न लगे कि इसे
प्रकाशित किया जाए तो यह बात आप और मेरे बीच ही रहे`। शशिकला राय का पत्र है कि
'आपके आदेशनुसार समीक्षा भेज रही हूं।मुझे समीक्षा नहीं लिखने आती`। दोनों
पत्रों के उपरोक्त उद्धृत हिस्सों से इन्हें प्रकाशित किए जाने के कुछ
निहितार्थ तो स्वयं स्पष्‍ट हो जाते हैं लेकिन इनके प्रकाशन से यह भी संकेत
मिलता है कि नया ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया इन चीजों को रचना का
'पूरक` मानते हैं। परिचयों के बारे में संपादकीय स्पष्‍टीकरण में उन्होंने इस
आशय की बाते कहीं भी हैं। असली पेंच भी यही है। वह यह नहीं समझ पाते कि इस तरह
की चीजें रचना के आस्वाद में बाधक होती हैं।परिचय तो दूर,'पाठ के बाहर कोई अर्थ
नहीं है' का उदघोष करने वाले फ्रेंच चिंतक जॉक देरिदा तो यहां तक कहते थे कि
रचना के साथ छपा रचनाकार का चित्र भी पाठक-आलोचक से रियायत मांगता प्रतीत होता
है। मुझ जैसे अनेक लोगों की (जो पाठ के बाहर लेखक की सामाजिक पृ ठभूमि में भी
अर्थों को देखते हैं, भी सहमति कम से कम देरिदा की इन बातों से तो बनती ही है)
किसी रचनाकार का यह परिचय कि उसे ससुराल में 'बार` चाहिए या वह एक छरहरी सुंदरी
है , किसी पाठ का पूरक नहीं हो सकता। हां, यदि आप यह बताएं कि फलां 'कर्मकांडी
परिवार' से आते हैं, तो उसकी कुछ सार्थकता संभव है। तब यह देखा जा सकता है कि
उसकी रचना के आंतरिक तत्व क्या हैं अथवा उसने अपनी पृष्ठभूमि का कितना अतिक्रमण
किया है। इसी तरह, अगर यह बताया जाए कि यह युवा रचनाकार धोबी परिवार आता है और
किशोरवस्था तक घाटों पर कपड़े साफ करता था तब उसकी पृष्‍ठभूमि यह देखने के लिए
पूरक बन सकती है कि उस छूट चुके परिवेश,मेहनतकश भारतीय के प्रति उसकी
प्रतिबद्धता कितनी है। जाहिर है दोनों पूरकों के उपयोग में एक बडा फर्क होगा।
किन्तु अंततोगत्वा यह खोज और विश्लेशण आलोचना का काम है। रचना के साथ किसी तरह
की पृष्‍ठभूमि,परिचय आदि का प्रकाशन मूल रूप से पाठक के पाठ में हस्तक्षेप करना
ही है। न यह बात रवीन्द्र कालिया समझ पाते हैं, न उनके विरोधी।


( नया ज्ञानोदय प्रकरण पर यह लेख प्रभात खबर के लिए लिखा गया था, जैसा कि
प्रभात खबर के पटना संस्‍करण में अक्‍सर होता है, यह लेख उसके ' जिला संस्‍करणों'
में 18 जुलाई,2007 को छपा । वैसे मुझे ज्‍यादा कोफत होती अगर यह पटना में छपा
होता और उन जिला संस्‍करणों में नहीं, जहां के साहित्यिक पाठकों को दिल्‍ली
दरबारों से संबंधित सूचनाओं का शिददत से इंतजार रहता है । गनीमत है ऐसा नहीं
हुआ। )

-- >> प्रमोद रंजन , http://sanshyatma.blogspot.com/
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