[दीवान]*रेज़ीडेंस प्रूफ***

Ravikant ravikant at sarai.net
Wed Mar 14 17:46:05 IST 2007


bipul pandey ki pehli posting.

ravikant

*शोध के बारे में***

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*रेज़ीडेंस प्रूफ***

*कदम-कदम की जरूरत उर्फ सरकारी सजा***



दिल्ली में हर साल सात लाख की आबादी आकर बस जाती है। यहां आते ही साबका पड़ता
है दुनियादारी से। घर से पैसे आते हैं तो कैसे आएं, बैंक में अकाउंट खोलना
जरूरी है। गाड़ी चलाने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना है। अगर विदेश आना-जाना
हो तो पासपोर्ट बनवाना है। गृहस्थी बसानी है तो फोन लेना है, रसोई गैस का
कनेक्शन, बिजली-पानी का कनेक्शन लेना है। इन हर कामों में जरूरत पड़ती है
रेज़ीडेंस प्रूफ की। यानी कदम-कदम की जरूरत। लेकिन इस जरूरत को हासिल करने के
लिए कम ठोकरें नहीं खानी पड़ती। दरअसल पहले प्रमाण से ही बाकी सारे प्रमाण
हासिल होते हैं — ड्राइविंग लाइसेंस, राशन कार्ड, वोटर पहचान पत्र, पासपोर्ट या
फिर कोई और। लेकिन पहला प्रमाण मिलना इतना आसान भी नहीं। इन सभी प्रमाणों का एक
ऐसा चक्रव्यूह यानी वीसस साइकिल है कि उसी में व्यक्ति उलझा रहता है। यहीं पर
पढ़ाया जाता है अपराध का सरकारी पाठ। कोई एक रेजीडेंस प्रूफ हासिल करने के लिए
हेराफेरी करने का पाठ। अगर एक अनुमान जताया जाए तो महानगर की नब्बे फीसदी आबादी
यही करती है।

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*लाल फीताशाही में फंसी सरकार***

सरकारी महकमे में कोई विभाग ऐसा नहीं है जो लोगों को बिजली-पानी की तरह घर के
पते का प्रमाण देता हो। यानी रेजीडेंस प्रूफ। सरकारी महकमे में सिर्फ एक जगह
ऐसा है जहां आपको सिर्फ पता देना होता है, प्रमाण अफसर जुटाते हैं। वोटर आई
कार्ड। लेकिन इसके लिए आपको सरकारी स्कीम का इंतजार करना होता है और सरकार को
अपनी कार्रवाई पूरी करने के लिए दो महीने का वक्त देना हो ता है। बाकी विभागों
से अपेंडिक्स की तरह जोड़ी गई जिम्मेदारी को पूरा करने की उम्मीद करना बेमानी
है।

22 जुलाई 2005— सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार की राशन कार्ड पर जमकर खिंचाई
की। इस खिंचाई की वजह था दिल्ली सरकार का वह आंकड़ा जिसमें बताया गया था कि साल
2000 में दिल्ली में कुल 44.1 लाख परिवारों के पास राशन कार्ड थे। सरकार के
मुताबिक एक परिवार में औसतन पांच लोग होते हैं जिन्हें राशन दिया जाता है।
लेकिन गौर करने वाली बात ये थी कि राशन कार्ड के हिसाब से साल 2000 में दिल्ली
में दो करोड़ लोगों को राशन दिया जा रहा था। जबकि दिल्ली की अभी आबादी
1.40करोड़ के करीब है। ये उदाहरण है कि राशन कार्ड की बंदरबांट कैसे होती
है।
बावजूद इसके अगर हम अपने आसपास देख लें तो अधिकतर लोगों के पास राशन कार्ड नहीं
मिलेगा।

* *

*पराया शहर, नए छात्र***

दिक्कत उनके साथ है जो घर से सीधे दिल्ली पढ़ने और तैयारी करने आते हैं। जिनके
पास स्टूडेंट आई कार्ड भी नहीं होता। घर से पैसे मंगाए तो मंगाए कैसे। बैंक
अकाउंट नहीं खुल पाता। दफ्तरों के धक्के खाने के बाद बिना दफ्तर गए रेज़ीडेंस
प्रूफ बनाना सीख जाते हैं। शायद फर्जी तरीके अपनाना ?



*पति-पत्नी और पता***

दिल्ली में नौकरी पेशा करने वाला एक वर्ग ऐसा है जिसको नौकरी की बदौलत घर के
पते का प्रमाण मिल जाता है। लेकिन दिक्कत तब होती है जब उनका पता बदल जाए। घर
का पता बदलते ही नए प्रमाण और रेज़ीडेंस एड्रेस बदलवाने की कवायद शुरू होती है।
कुछ लोगों को नौकरी की बदौलत भी रेजीडेंस प्रूफ नहीं मिल पाता। दिलचस्प यह है
कि पति के पते को पत्नी का पता नहीं माना जाता। पिता के पते को बेटी का पता
जरूर माना जाता है। इसलिए एक दिक्कत तब शुरू होती है जब दिल्ली से बाहर की
लड़की पत्नी बनकर आती है। यानी फिर पहचान हासिल करने की कवायद।



*परदेशियों को कौन पूछे*
दिल्ली की झुग्गियों में बांग्लादेशी भी रहते हैं जो सरकार की नजर में अवैध है।
कुछ कारण है जो इन झुग्गियों में हर साल आग लगती है। इस आग में न सिर्फ
झुग्गीवालों के सपने जल जाते हैं बल्कि पूंजी भी जलकर खाक हो जाती है। क्योंकि
अवैध रिहायश होने से बांग्लादेशियों के लिए बैंक में पैसा रखना संभव नहीं। ठीक
वही हालत होती है, जो फुटपाथी लोगों की होती है।



*एनसीआर के दिल्लीवाले***

दिल्ली से सटे उपनगरों गुड़गांव , फरीदाबाद, नोएडा और गाजियाबाद के लोग वो लोग
हैं जो दिल्ली के ज्यादा करीब हैं अपने राज्यों उत्तर प्रदेश और हरियाणा की
राजधानी से दूर। ये वो लोग हैं जिनका दफ्तर दिल्ली में है और घर दूसरे राज्य
में। इसलिए इनकी समस्याएं अलग तरह की है। ये लोग दो राज्यों के बीच जी रहे हैं।
और घर के पते को लेकर परेशान रहते हैं।

*मकसद--* इस रिसर्च का मकसद है इस बात को उजागर करना कि दिल्ली सत्ता का केंद्र
है। देश की सबसे बड़ी न्यायपालिका यहीं हैं। तीनों सेनाओं का मुख्यालय यहीं है।
भारत विश्व से मुकाबला कर रहा है। लेकिन इसी दिल्ली के लोग एक वाहियात समस्या
से जूझ रहे हैं - रेजीडेंस प्रूफ। किसी भी देश के विकास का पैमाना होता है वहां
रहने वाले लोगों का जीवन स्तर। तो क्या ये जीवन स्तर पिज्जा , बर्गर जैसी चीजें
दरवाजे पर हासिल कर लेने का ही दूसरा नाम है? भले ही कोई एक मामूली और बेतुकी
सी बात रेजीडेंस प्रूफ के लिए कोई भटकता रहे? यानी लोग एक इमानदार फर्जीवाड़ा
कर रहे हैं, जो करना लोगों की मजबूरी है।



*अपने बारे में** *

और दोस्तों, मैं आपसे मुखातिब हूं बिपुल पांडेय। पेशे से पत्रकार। पढ़ाई के
साथ-साथ उन्नीस सौ तिरानबे से अखबारों में लिखना शुरू किया। इलाहाबाद में
आकाशवाणी में कविता पाठ का मौका मिला। साहित्य में रुचि है और लेखन ही जीवन
यापन का साधन बना हुआ है। फिलहाल स्टार न्यूज हिंदी चैनल में एसोसिएट
प्रोड्यूसर के पद पर काम कर रहा हूं। उम्मीद है शोध का विषय आपको अपना लगा
होगा। कई कहानियां (परेशानियां) तो आपके जेहन में भी होंगी। मुझसे साझा करें तो
अच्छा लगेगा। मुझे मेल ( bipulpandey at gmail.com ) कर सकते हैं, और बात
(09899983503) भी।


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