[दीवान]और रेडियो में पिघल गए छ साल के अतीत

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Sat Aug 23 16:55:49 IST 2008


जुंगार छूटने का मतलब है किसी चीज को लेकर बेचैन हो जाना. वैसे सही मुहावरा है
बुढापे में रह-रहकर जुंगार छूटना। और गुल का आपने बहुत सही मतलब समझा है. वैसे
ही लड्डू बनाती थी मां और चूल्हे में डालती थी।

On 8/23/08, Ravikant <ravikant at sarai.net> wrote:
>
> बहुत ख़ूब विनीत,
>
> आवाज़ की दुनिया की सैर कराते रहने का शुक्रिया. रेडियो तो रेडियो, इसमेँ तो
> बैटरी के पुनर्चक्रण
> की गाथा भी निराली है, लेकिन हम सब के लिए शायद भोगा हुआ यथार्थ. सिर्फ़ एक
> चीज़ को थोड़ा
> समझाना होगा. कोयले के चूरे से गुल बनाया जाता था, यानी कोयले के बुरादे आप
> शेष ज्वलनशील
> चीज़ोँ मेँ लपेट देते थे, उनको गीला कर देते थे, फिर लड्डू-जैसा बाँध देते थे
> ताकि वह सुखाकर चूल्हे
> मेँ डालने पर लोहे के जंगले में अटक जाए, जो बुरादे की शक्ल में मुमकिन नहीं
> था.
> देखाहिस्की बहुत अच्छा लफ़्ज़ है, बस जुंगार छूटना समझा दो.
>
> रविकान्त
>
> शनिवार 23 अगस्त 2008 15:31 को, vineet kumar ने लिखा था:
> > कैम्पवाले भायजी के कहने पर मैं चांदनी चौक चला गया रेडियो खरीदने। पहले तो
> > रेडियो की एक दूकीन के आगे पांच मिनट खड़ा हुआ और जीभरकर रेडियो देखे।
> > दुकानदार ने पूछा भी कि आपको कौन-सी रेडियो और कितने दाम तक के चाहिए। मैंने
> > कहा-अभी रुको भाई, पहले कुछ देर देख तो लेने दो तसल्ली से। एक साथ बहुत सारे
> > रेडियो देखकर मन बहुत खुश हो रहा था। एक ख्याल भी आया कि दो-तीन एक ही साथ
> > खरीद लेता हूं, पता नहीं कब लुप्त हो जाए। म्यूजियम में बाल-बच्चों को ले
> जाकर
> > दिखाना पड़े, इससे बेहतर है कि घर में ही मिल जाए।
> >
> > दुकानदार एक-एक करके दीखाता जा रहा था और बार-बार उसके दाम भी बताता। मैं
> > चुपचाप देख रहा था। मैंने दुकानदार का ज्यादा समय नहीं लिया और सीधे कहा- ये
> > दे दो। उसने फिर कहा- पहले तो ये एक हजार पिचानवे में आते थे, अब दाम गिरा
> है,
> > आठ सो पांच दे दीजिए। मैंने आगे कहा-देख लो भइया, कोई गुंजाइश हो तो। उसने
> > कहा- वाकई आप रेडियो के कद्रदान लगते हैं, कहां कोई आठ सौ लगाकर सिर्फ
> रेडियो
> > खरीदता है, सब तो हजार-बारह सौ में सीडी प्लेयर लेने के चक्कर में होते हैं।
> > अब आपसे मोल-तोल करने में ठीक भी नहीं लग रहा, चलिए आप सात सौ पचास दे
> दीजिए,
> > आपको इसे बिजली से चलाने के लिए एडॉप्टर तो नहीं चाहिए। मैं उसे बिना बिजली
> के
> > बैटरी से ही चलाना चाहता था, सो उसने झट से बीपीएल की तीन बैटरी डाल दी.
> >
> > रेडियो में बड़ी लगनेवाली बैटरी मैं करीब सात-आठ साल के बाद देख रहा था।
> खरीदे
> > हुए तो इससे भी ज्यादा समय हो गए होंगे। अपने पास जो भी चीजें है, उसमें
> डूरा
> > सेल की पेंसिल बैटरी ही लगती है. मुझे याद है, तब एक बैटरी की कीमत पांच से
> छह
> > रुपये रही होगी। लेकिन तीन बैटरी के दूकानदार ने ४५ रुपये लिए। अब बैटरी के
> > उपर लोहे के पत्तर लगे होते हैं. छुटपन में जब था तो इसके उपर कागज लगे
> होते।
> > जब बैटरी खत्म हो जाती तो कागज गल जाते। मां इस बैटरी को चूरकर सूप रंगा
> करती।
> > एक तो इससे सूप की मजबूती बढ़ जाती और दूसरा कि बांस के रेशे जिसके चुभने का
> > डर होता, वह भी खत्म हो जाता। कोयले के चूरे में डालती औऱ पानी के साथ
> मिलाकर
> > गुल बनाती। मां का कहना था कि इससे चूल्हा ठीक से जलता है और ताव ज्यादा आते
> > हैं। खैर,रेडियो लेकर सीधे राकेश सर के घर पहुंचा। चन्द्रा दीदी ने देखते ही
> > कहा, मेरा भी बहुत दिन से मन हो रहा है कि एक रेडियो खरीदूं। मैंने उन्हें
> कई
> > बार कहा-आप इसे रख लीजिए, मैं दूसरा खरीद लूंगा। मेरे बार-बार कहने पर भी
> > राकेश सर ने ऐसा नहीं करने दिया। मैं चाहता था कि दीदी वो रेडियो रख ले, भले
> > ही बदले में पैसे दे दे। इसलिए नहीं कि उनका मन हो रहा था, बल्कि भीतर कुछ
> ऐसा
> > है कि लगता है, ज्यादा से ज्यादा लोग रेडियो खरीदें और सुनें।बार-बार लगता
> है
> > कि रेडियो से देश का कुछ तो जरुर भला हो सकता है। यह एक संभाव्य माध्यम है।
> > हॉस्टल पहुंचते ही स्टडी टेबल पर रेडियो को रखा और लोहे के एरियल को पूरा
> खींच
> > दिया, बहुत लम्बा एरियल। गांव के लोग सिग्नल अच्छी आने के साथ-साथ जान-बूझकर
> > अकड़ में एरियल खींचे होते हैं। लेकिन आज रेडियो कोई ऐसी चीज नहीं है कि कोई
> > अकड़ दिखाए। आज अगर कोई रेडियो को लेकर अकड़ता है तो या तो वो चंपक है या
> फिर
> > एब्नार्मल। मैंने तीन दिनों तक पूरा एरियल खींचकर रेडियो बजाया। इस बीच कमरे
> > में कई लोग आए और रेडियो के बारे में इतना पूछा जितना कि किसी के लैपटॉप या
> > फिर मेरे टीवी खरीदने पर भी नहीं पूछा था। लैपटॉप, टीवी और आइपॉड खरीदना आज
> के
> > लिए कॉमन है लेकिन रेडियो खरीदना आज के लिए कॉमन नहीं है। सालों बाद
> आकाशवाणी
> > सुन रहा था, मीडियम बेब सुन रहा था.
> > करीब छ-साल का यह अंतराल ऐसा लग रहा था कि इस बीच बहुत कुछ बदला ही नहीं है।
> > बीए पार्ट वन और उसके बाद सीधे पीएच।डी। इसके बीच का कुछ अता-पता ही नहीं।
> > अतीत ऐसे भी पिघल जाते हैं, मुझे पता ही नहीं चला। एफ.एम की क्लीयरिटी के
> बीच
> > मीडियम बेब की घरघराहट और दो स्टेशनों के बीच की हीहहीहीही... की आवाज से अब
> > खुन्नस नहीं देशीपन का एहसास हो रहा है, बचपन में लौट आने का एहसास हो रहा
> है,
> > एफ.एम की लोकप्रियता की वजह से अब लोग रेडियो को एफ.एम कहने लगे है, अब
> सचमुच
> > रेडियो का एहसास होने लगा है. मोबाइल के आने के बाद तो रेडियो शब्द भी गायब
> > होने लग गए। लोग सीधे एफ.एम वाला मोबाइल कहने लगे हैं। एक ही साथ लग रहा था
> कि
> > कई चीजें लौट आयीं है.
> > अच्छा, मजे की बात देखिए कि मेरे रेडियो खरीदते ही हॉस्टल के कई लोगों मे
> > रेडियो को लेकर एक बार फिर से जोश चढ़ा है। मुन्ना ने बूफर लगाकर रेडियो
> बजाना
> > शुरु कर दिया है। दिवाकर जिस टू इन वन को कबाड़ा समझकर फेंक दिया था, अब
> हमसे
> > पूछ रहा है कि इसका टेप काम कर रहा है, रेडियो नहीं, कहां बनेगा। मैंने
> > तिमारपुर के उस मिस्त्री का पता बताया जो हीटर से लेकर मेरे सोनी और नोकिया
> का
> > इयरफोन कई बार बना चुका है और वो भी बीस से तीस रुपये में। नीरजजी जल्द ही
> घर
> > जानेवाले हैं और गोरखपुर में पड़े रेडियो को लेकर आएंगे। उनका रुमी भास्करजी
> > ने सीडी के साथ-साथ आकाशवाणी का इन्द्रप्रस्थ चैनल भी सुनना शुरु कर दिया
> है।
> > ये देखा-देखी करने का काम बचपन में खूब हुआ करता था। मां इसे देखाहिस्की में
> > जुंगार छूटना कहती। अचानक कोई व्यापारी या लूडो या स्टोर में पड़ा कैरमबोर्ड
> > उठा लाता और एक-दो दिन खेलने लग जाता तो फिर से मरा हुआ ट्रेंड जिंदा हो
> जाता।
> > आनन-फानन में बिलटुआ के दूकान के सारे पेंडिंग माल निकल जाते। रेडियो को
> लेकर
> > काश ऐसा हो तो मजा आ जाए।
> >
> > कोई बंदा दुनियाभर की चीजों से मजे करने के बजाय रेडियो सुनने लगता है तो
> मुझे
> > लगता है उसकी जिंदगी में कुछ बेहतर होने वाला है और मुझे इसके लिए उकसाने
> में
> > उतना सुख मिलता है जितना किसी को किसी का धर्मांतरण करने पर भी शायद ही
> मिलता
> > हो।
> _______________________________________________
> Deewan mailing list
> Deewan at mail.sarai.net
> http://mail.sarai.net/cgi-bin/mailman/listinfo/deewan
>
-------------- next part --------------
An HTML attachment was scrubbed...
URL: http://mail.sarai.net/pipermail/deewan/attachments/20080823/280df649/attachment-0001.html 


More information about the Deewan mailing list