[दीवान]ससुरे बाजे ( रेडियो) पर भी रिसर्च होने लगा है
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Sun Aug 24 17:02:14 IST 2008
लाइफ में पहली बार मैंने डीयू के हिन्दी विभाग के सारे टीचरों को एक साथ
मुस्कराते हुए देखा था। वो भी तब जब मैंने बोर्ड में बैठे सारे लोगों को सामने
एम।फिल् का अपना विषय बताया था। उसके बाद से अब तक सारे लोगों को एक साथ
मुस्कराते नहीं देखा। एक ने कहा-जरा जोर से बताओ भाई कि किस विषय पर काम करना
चाहते हो। मैंने कहा कि- एफ.एम चैनलों में भाषा का बदलता स्वरुप। दूसरे ने कहा-
इसमें हिन्दी कहां है. हिन्दी विभाग में हो तो विषय भी उसी के हिसाब से होनी
चाहिए न. इसमें हिन्दी जोड़ना बहुत जरुरी है औऱ फिर मुस्कराने लगे. उनके
साथ-साथ बाकी लोग भी मुस्कराने लगे और जो कुछ पहले से मुस्करा रहे थे वे उनके
साथ कॉन्टीन्यू हो लिए।
मैं सारे लोगों के मुस्कराने पर थोड़ा सकपका गया था लेकिन किसी से कुछ बोल तो
सकता नहीं था। विभाग के मैडमों के बारे में मेरी राय रही है कि वो पुरुष
शिक्षकों के मुकाबले थोड़ी कोमल हैं. सो साइड से बड़ी धीमी आवाज में पूछा- गंदा
टॉपिक है क्या मैम. मैम ने अंगरेजी में कहा- नो इट्स ओके। गंदा नहीं है, हां
थोड़ा नया जरुर है। तभी एक पुरुष टीचर ने कहा- बेटा लेकिन इसमें कौन-कौन से
चैनल रखोगे। मैंने कहा- सर रेडियो सिटी और रेडियो मिर्ची। एक बार फिर सबको
मुस्कराने का मौका मिला। भई यही दोनों क्यों, बाकी क्यों नहीं। मैं बहस में
पड़ना नहीं चाहता था, सो एकदम से बोल गया. सर आप जो-जो चैनल कहेंगे उस पर कर
लूंगा। उन्होंने कहा- नहीं बेटे, मैं तो बस ऐसे ही कह रहा था। एक और टीचर की
उत्सुकता बढ़ी- लेकिन तुम्हें तो इसका टेक्टस तैयार करने होंगे. हां सर- मैं
कार्यक्रमों की रिकार्डिंग करुंगा और फिर इसकी स्क्रिप्टिंग करके विश्लेषण
करुंगा। सबने हां में हां मिलाया और थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ तय हो गया कि
मैं एफ. एम चैनलों की भाषा पर काम कर सकता हूं। हां, भाषा की जगह हिन्दी रखना
होगा।चलते-चलते एक बुजुर्ग टीचर ने पूछ ही लिया- रेडियो और रिकार्डर तो है न
बेटा। मैंने कहा- हां सर दोनों है। मेरे कहने का अंदाज कुछ इस तरह से था कि
रिसर्च के नाम पर ही दोनों चीजें अभी खरीद कर आ रहा हूं और अगर विषय नहीं मिला
तो जाकर लौटा दूंगा।.... मुझे अपने विषय के हिसाब से काम करने का मौका मिल गया
था और मैं खुश था।
काम के दौरान में मेरे अलग अनुभव रहे। इसी दौरान मैंने आकाशवाणी के खूब चक्कर
लगाए। बाकी जगहों पर जाकर रेडियों से जुडे लोगों से बात करने की कोशिश की।
धीरे-धीरे लोगों का पता चल गया था कि मैं एफ।एम चैनलों की हिन्दी पर रिसर्च कर
रहा हूं. लोगों की मुझे लेकर अलग-अलग राय बनती. कुछ लोगों का कहना था कि- दिन
काटने के लिए ले लिया है, दिनभर एफ.एम सुनो और रिसर्च के नाम पर चुतियापा करो,
ये भी कोई रिसर्च है। साहित्य से बचना चाहता है। अपने को हिन्दी में रहकर भी
डिफरेंट दिखाना चाहता है। कुछ लोग मुझे पोमो यानि पोस्टमॉर्डनिस्ट कहने लग गए
थे। एम. ए. के दौरान जो लोग मुझे नजदीक से जानते थे और जिन्हें मालूम था कि
मैंने लिटरेचर पढ़ने में भी अच्छा-खासा समय लगाया है, हरियाणा और दिल्ली के
लोगों को मैला आंचल की भाषा समझने में मदद की है वे कहते- कितना जीनियस था
विनीत, ये विषय लेकर अपना करियर डूबा लिया। कुछ रहम खाकर कहते-अरे दोस्त,
बीच-बीच में लिटरेचर पढ़ लेना, यूजीसी में यही काम देगा, तुम्हारा एफ.एम काम
नहीं देगा। जितने मुंह, उतनी बातें। शुक्र है, मैंने इस दौरान लेक्चरशिप के लिए
कोई इंटरव्यू नहीं दिए- नहीं तो शायद लोग कहते- यहां बजाने की नहीं पढ़ाने की
भर्ती होनी है। हिन्दी समाज के हिसाब से ये विषय नया था, उटपटांग था और इसमें
बदचलन साबित करने की पूरी संभावना थी।
जेएनयू में रिसर्च कर रहा मेरे बचपन का दोस्त बार-बार कहता- यार, तुमने विषय तो
हल्का ले लिया है लेकिन काम हल्के ढंग से नहीं करना, नहीं तो मजाक बन जाओगे,
लोगों को तो तुम जानते ही हो। एक बार वहां के एक टीचर से मिलवाया और कहा- ये
मेरा दोस्त है विनीत, डीयू से एम.फिल कर रहा है। उन्होंने मेरा विषय पूछा और
कहा- ससुरे बाजे पर भी रिसर्च होने लगा है। मैं मुसकराकर रह गया।
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