[दीवान], 'वतन के डाकू' का किस्सा
Ravikant
ravikant at sarai.net
Thu Feb 21 15:20:28 IST 2008
शुक्रिया भगवती, आलोक पुराणिक साहब
मुझे याद आया कि कोई आदमी जब हमारे गाँव में बाहर से पहुँचता था और हिन्दी बोलता पाया जाता
था, तो लोग टोकते थे कि इंगलिस मत झाड़ो, जिसपर हम तमीज़दार लोगों को बहुत हँसी आती थी!
वैसे चालू रचनात्मक चलन के मुताबिक़ इस फ़िल्म के दो नाम होने चाहिएँ - राष्ट्र द नेशन और उत्कोच
द ब्राइब. मेरी सेंसरदृष्टि में पहला नाम फ़ालतू है, क्योंकि राष्ट्र तो वैसे भी हर जगह मौजूद है
भगवान की तरह, हवा की तरह. ग़ौर कीजिए कि किसी ने उसके साथ छेड़खानी करने की कोशिश नहीं
की. वही एकमात्र सेफ़ शब्द है - अप्रश्नांकित परम ब्रह्म!
बहुत ख़ूब
रविकान्त
बुधवार 20 फरवरी 2008 18:35 को, bhagwati at sarai.net ने लिखा था:
> भाई आलोक पोराणिक द्वारा लिखित ,नवभारत टाइम्स मैं छापा यह व्यंग
>
> मज़ा आया
>
> भगवती
>
>
>
>
> आलोक पुराणिक
> नोट : - इस लेख का जोधा-अकबर फिल्म पर हुए विवाद से कोई कनेक्शन नहीं है।
> पिछले कुछ दिनों लिख नहीं पाया जी, बिजी था एक फिल्म लिखने में, फिल्म का नाम
> है -वतन के डाकू।
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