[दीवान],'वतन के डाकू' का किस्सा
balvinder singh
baliwrites at gmail.com
Tue Feb 26 18:33:04 IST 2008
dear
yeh lekh navbharat times me hi pada tha .pahali line padte hi underwear me
khada main poora ant tak padha. baad me pata chala ki thand lag rahi
thi.sari baten thode me kah dali. mazaaa aaa gayaaa.
ajkal m.a. ke exams ki taiyari kar raha hun isliye ek mahine ke liye net
par batcheet band.
love
balvinder
On Wed, Feb 20, 2008 at 6:35 PM, bhagwati at sarai.net <bhagwati at sarai.net>
wrote:
> भाई आलोक पोराणिक द्वारा लिखित ,नवभारत टाइम्स मैं छापा यह व्यंग
>
> मज़ा आया
>
> भगवती
>
>
>
>
> आलोक पुराणिक
> नोट : - इस लेख का जोधा-अकबर फिल्म पर हुए विवाद से कोई कनेक्शन नहीं है।
> पिछले कुछ
> दिनों लिख नहीं पाया जी, बिजी था एक फिल्म लिखने में, फिल्म का नाम है -वतन
> के डाकू।
> फिल्म पूरी हो गई तो दिखाने ले गया सेंसर अफसरों के पास। उन्होंने कहा -अब
> पहले सेंसर करने
> का काम हमने छोड़ दिया है। हम सेंसर करके भेज देते हैं फिल्म, तो वह आगे कहीं
> ना कहीं रुक
> जाती है। इसलिए पहले औरों से सेंसर करा लाओ। उन्होंने एक सूची थमा दी, जिसमें
> तमाम
> जातियों, धर्मों की महासभाओं, पुलिस असोसिएशनों, अफसर असोसिएशनों, तमाम
> कारोबारों
> की असोसिएशनों के पते थे। बताया गया कि पहले ये सेंसर करेंगे। इनके बाद अगर
> फिल्म बच गई,
> तो सेंसर बोर्ड सेंसर करेगा।
>
> सबसे पहले मैं गया -राष्ट्रीय नेता असोसिएशन के पास। फिल्म का डिब्बा खुलने
> से पहले एक
> नेताजी बोल पडे़, हमें नाम पर ही आपत्ति है -वतन के डाकू। ये आप हमारी
> मानहानि कर रहे
> हैं। हमारी भावनाओं को ठेस पहुंचा रहे हैं। मैंने कहा -महाराज, फिल्म तो
> डाकुओं पर हैं, आप
> तो नेता हैं। असोसिएशन चीफ बोले -ना पब्लिक सब समझती है। पब्लिक समझ जाएगी कि
> फिल्म
> किन पर बनी है। नाम चेंज करो। इसे करो- वतन के पुजारी।
>
> साहब जी! मैंने फिल्म का नाम चेंज कर दिया। अब दारू असोसिएशन को दिखाने की
> बारी आई।
> दारू चेयरमैन उखड़ गए और बोले -ये क्या फिलिम है। तुमको पता है कितने लोगों
> को इंप्लायमेंट
> मिलता दारू इंडस्ट्री से। फिलिम का नाम करो, वतन की दारू। अब फिलिम हो गई वतन
> की
> दारू।
>
> वतन की दारू अब पहुंची पुलिस असोसिएशन के पास। पुलिस चीफ बोले -क्यों सिर्फ
> दारू ही
> होती है देश में। हमारे बंदे कित्ती जोखिम से काम करके पकड़ते हैं चरस, हशीश,
> गांजा वगैरह।
> फिल्म का नाम करो वतन की चरस, नहीं तो हमारी भावनाएं आहत हो जाएंगी। मैंने
> कहा
> -महाराज, जानता हूं घणा जोखिम का काम करते हैं आप। दिल्ली में किडनीखोर
> डॉक्टर अमित
> को सिर्फ उन्नीस लाख में छोड़ दिया, कितना जोखिम का काम था। कोर्ट केस,
> सीबीआई
> इनक्वायरी सब कुछ का खतरा था, फिर भी आप जोखिम वाले काम करते हैं। कहें तो
> फिल्म का
> नाम रख दूं -देश के जोखिम। पुलिस चीफ हंसने लगे।
>
> फिल्म का नाम हो लिया -देश के जोखिम। अब अफसर असोसिएशन ने देखी फिल्म। कस्टम
> के एक
> अफसर ने फिल्म देखते हुए एक तस्कर से रिश्वत ली। एक्साइज वाले ने पान मसाले
> वाले से रिश्वत
> ली। फिर अफसर लोग बोले -ये फिल्म का नाम आपने हम पर क्यों रखा है जी। हमारी
> भावनाओं
> को इससे ठेस पहुंचती हैं। मैंने फिर कहा -सर जी! फिल्म तो है -देश के जोखिम,
> इसमें आप कहां
> से आ गए? अफसर लोग बोले -शटअप, पब्लिक सब समझती है कि देश का जोखिम कौन है।
> मैंने
> उखड़कर कहा -तो क्या फिल्म का नाम रख दूं देश की रिश्वत। कस्टम वाले बोले
> -बिल्कुल ठीक,
> यही रख दो, सब समझेंगे पुलिस पर बनी है। फिल्म का नाम हो गया -देश की रिश्वत।
>
> अब फिल्म गई राष्ट्रीय शुद्ध हिंदी बचाओ समिति के पास। शुद्ध हिंदी विद्वान
> उखड़ गए और
> बोले -रिश्वत भारतीय नहीं है। मैंने कहा -रिश्वत से ज्यादा अखिल भारतीय तो
> कुछ भी ना है
> जी। चेन्नई से चंडीगढ़ तक, मुंबई से लेकर मुरादाबाद तक भाषाएं भले ही अलग
> हों, पर रिश्वत
> तो एक जैसी है। शुद्ध हिंदी विद्वान उखड़ गए और बोले -नहीं रिश्वत फारसी अथवा
> उर्दू शब्द
> है। इसकी जगह हिंदी शब्द लेकर आओ। मैंने कहा -आप ही इसकी हिंदी बता दीजिये।
>
> वो बोले -मुझे पता नहीं है। अभी मैं उर्दू और फारसी का विरोध कर रहा हूं।
> हिंदी के शब्द
> बाद में तलाशूंगा। आप पता करके रख लें। खैर, शुद्ध हिंदी में अब फिल्म का नाम
> हुआ -राष्ट्र
> का उत्कोच। फिल्म फाइनल करके जब फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर के पास पहुंचा, तो वह
> बोला
> -राष्ट्र का उत्कोच, अबे हम इंग्लिश फिल्म डिस्ट्रीब्यूट ना करते। हिंदी
> फिल्म लाओ। अब आप
> बताओ, मैं हिंदी फिल्म कहां से लाऊं।
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